एक अनोखी बस यात्रा, दो संतोषों का असंतोष और बदले बिहार को देखने आये मामू्#बिदेसियाकीचिट्ठी

निराला बिदेसिया

बात थोड़ी पुरानी हो चली है लेकिन जब-तब मानस पटल पर ताजगी के साथ चस्पां हो जाने को बेताब हो जाती है. हम रोहतास जिले के एक बाजार राजपुर से सासाराम पहुंचे. मैं ट्रेन से रांची निकलने के मूड में था. लेकिन साथ में चल रहे मामू ने कहा- बस का आनंद लो बबुआ, मजा आएगा. थोड़ा गाना बजेगा, कुछ देर लाइन होटल पर रूकेंगे, वगैरह-वगैरह. मैं आग्रह करता रहा कि बिना रिजर्वेशन के भी ट्रेन में चलना बस की तुलना में आरामदेह होता है और कुछ हद तक निश्चिंतता का भाव भरनेवाला भी लेकिन जब तक मैं चौराहे की पान दुकान पर एक-दो परिचितों से मिलता रहा, मामू चुपके से बस का टिकट लेकर आ गये और कहने लगे- बबुआ, अब तो टिकट ले लिये. अब भूल जाओ ट्रेन-फ्रेन!

निराला

वे कभी-कभार बिहार आनेवाले मामू ठहरे, सो उनसे एक छोटी-सी यात्रा को लेकर अब आगे जिद दिखाने, सवाल करने का कोई मतलब नहीं था. मामू ने कहा, अभी पांच बजे हैं, सात बजे बस स्टैंड पर आयेगी. पौने सात बजे तक हमलोगों को बस स्टैंड पहुंच जाना होगा. मैंने कहा कि बस एजेंट का नंबर ले लीजिए. एजेंट का फोन नंबर लेकर हम शेष बचे समय को विशेष बनाने के लिए बस स्टैंड से ही सटे बहन के घर चले गये ताकि वहीं खाना-नाश्ता हो और इस बहाने ही सही लगभग एक साल बाद बहन को दो घंटे का समय भी दूं. बहन के यहां हाल-चाल लेने गये थे लेकिन वहां भी मामू पारिवारिक-घरेलू बातों की बजाय बदलते, बनते बिहार का राग ही गाते रहे और उसी में सबको उलझाये रहे. मामू को कइयों ने समझाया कि दूर के ढोल सुहावन टाइप मानसिकता बनाकर आये हैं, इसलिए ऐसी बातें कर रहे हैं. मामू काहे को मानते, वे दूर से दूरबिनिया नजरिये से बिहार को देखते-आंकते और प्रफुल्लित होते थे, सो सबकी बातों को खारिज कर अंग्रेजी के एकाध टर्म और आंकड़ों के जरिय स्पीडी ट्रायल से अपराध कम होने से लेकर कानून-व्यवस्था सुधरने आदि की बात करते रहे. बहन के यहां बतकही का विषय बदल चुका था, मामू ने साढ़े छह बजे बस एजेंट को फोन मिलाया, उसने कहा- 15 मिनट में आइये. हम सात बजने में पांच मिनट पहले वहां पहुंचे. बस, साढ़े सात बजे आयी और वहीं लग गयी. साढ़े सात से आठ बजा, आठ से साढ़े आठ, साढ़े आठ ने नौ और फिर साढ़े नौ. एजेंट-कंडक्टर-ड्राइवर से सवारी बहस करे तो जवाब मिले, अभी रूकिये, जान-परान नहीं दीजिए, हवाई जहाज से सफर नहीं कर रहे हैं कि हड़बड़ा रहे हैं और टाइम की दुहाई दे रहे हैं.

मामू ताव में थे, एजेंट-कंडक्टर से लड़ने को उतारू और मैं मजे लेकर उन्हें और उनके ताव को कभी थोड़ा कम, थोड़ा ज्यादा कर रहा था और हर बार यही कह रहा था- यही है मामू अपना-आपका बिहार. लोगवा नहीं बदला है! खैर! बस खुली. साढ़े नौ बजे. सासाराम से खुलकर सीधे डेहरी ओन सोन में आकर रुकी. वहां एक सवारी थे. तेरह नंबर सीट के सवारी. मालूम चला संतोष बाबू नाम है. वे बस पर सवार हुए, उन्हें बस पर बिठाने दो लोग और साथ में आये थे. तेरह नंबर पर पहले से एक सवारी विराजमान थे. उनका नाम भी संतोष ही. डेहरी वाले संतोष ने सासाराम से आ रहे संतोष को कहा- यह मेरी सीट है. सासाराम वाले संतोष ने कहा- देखिए टिकट, यह मेरी सीट है. कंडक्टर समझ गया, लोचा हो गया है. एक ही सीट पर दो सवारी, दोनों संतोष नाम वाले का टिकट बन गया है. डेहरी से चढ़ने और चलने को तैयार संतोष से आग्रह किया गया- तेरह का फेरा छोड़ें, चार नंबर पर बैठ जायें. उनके साथ आये दो संगियों ने कहा- पगला गये हो का रे, जब इनका तेरह नंबर है तो तेरह पर ही जायेंगे, जो पहले से बैठे हैं, उनको उठाओ. जो सासाराम से संतोष आ रहे थे, उनसे आग्रह किया गया कि आप ही चार नंबर पर चले आये, उन्होंने कहा- सवाल ही नहीं, अब यहां बैठ गये हैं तो बैठ गये हैं, हिलेंगे-डोलेंगे नहीं. दोनो संतोष में से कोई भी संतोष करने को तैयार नहीं. डेहरी वाले संतोष बस से नीचे उतरकर कंडक्टर ड्राइवर को बोले, हम उस सवारी से मुंह नहीं लगायेंगे लेकिन सीट खाली नहीं करवाये तो हम नहीं जायेंगे और नहीं जायेंगे तो बस ले जाकर देख लो. अंदर बैठे संतोष ने कहा- केकर औकात है जो हटा दे. गजब का दृश्य उत्पन्न हुआ. दोनों संतोष अपनी-अपनी क्षमता और हैसियत का बखान करने लगे. रोहतासी अंदाज में. हमारे रोहतास में अब सीमित दायरे में ही सही, आज भी बड़े होने का मतलब चार-पांच तरीके की तरकारी खाना, सिलिक का कपड़ा पहनना, चाय-पान में सौ-दो सौ रोज उड़ाना और अधिक से अधिक मुकदमे लड़ना माना जाता है. अंदर वाले संतोष ने कहा- 20 कित्ता केस लड़िना, साधारण आदमी ना हईं. बाहर वाले संतोष ने कहा- 20 कित्ता केस तो हमार चरवहवा लड़ेला. वाकयुद्ध बस के अंदर और बस के बाहर के संतोष के बीच शुरू हुआ लेकिन प्रत्यक्ष नहीं बल्कि ड्राइवर कंडक्टर को माध्यम बनाकर परोक्ष तरीके से. यह सब डेहरी के मेन रोड पर हो रहा था, जहां से थोड़ी ही दूरी पर पुलिस चौकी भी थी. अंदर सवारी परेशान लेकिन किसी में कुछ बोलने की हिम्मत नहीं. एक महिला उठी, पहले अंदर वाले संतोष से बोली, भइया चले जाइये ना आप ही चार नंबर पर. अंदर वाले संतोष ने कहा- मेहरारू जात से हम बात न करते हैं बहिनजी, आप कुछ ना बोलिये. वह बाहर वाले संतोष के पास गयी, वही आग्रह दुहरायी. बाहरवाले संतोष ने कहा- मैडम, बात सीट का नहीं है, बात हार-जीत का है, आप नहीं समझिएगा. महिला ड्राइवर-कंडक्टर से बोली, भइया, हमें सुबह छह बजे के पहले तक रांची में होना है, ट्रेन से कहीं और जाना है. ड्राइवर-कंडक्टर चुप, सिर्फ इतना ही बोले- हम का करें बहिनजी! इन सबके बीच मेरा संवाद मामू से जारी था. मैं मामू से पूछ रहा था- मामू बदलल बिहार का नमूना है, देख रहे हैं. इतने में बाहर वाले संतोष के कुछ लोग और आ गये. आते ही बोले- अरे स्साला ड्राइवर, बस घुमाव, ले चल, ईहां से ना तो अभिये मार के गोली टायर छेदे-छेद कर देंगे आउर शीशा चूरे-चूर. बस पर ड्राइवर बैठा, बस बैक गीयर में चलने लगी. करीब एक किलोमीटर पीछे तक. मामू ने 100 पर डायल किया. कोई जवाब नहीं मिला. वे बार-बार 100 लगाते रहे, मैं उनसे कहता रहा- बदलल बिहार है मामू! करीब एक किलोमीटर पीछे जाकर बस लग गयी. अंदर के यात्री परेशान. बाहरवाले संतोष ने कहा- अब बस इहें रही. तब तक न जाएगा, जब तक कि 13 नंबर सीट खाली न हो जाए. अंदर बैठी महिलाएं ज्यादा परेशान. एक महिला उतरी, बोली भइया क्या कर रहे हो आपलोग, भूख लगी है, प्यास लगी है, क्यों कर रहे हो आप लोग ऐसे! बाहरवाले संतोष बाबू ने कहा- आप चिंता न कीजिए, हम सभी लोगों को पानी पिलायेंगे, चाय पिलायेंगे, जरूरत हुआ तो खाना खिलायेंगे लेकिन 13 के बिना जायेंगे नहीं. एक आदमी बस के अंदर पानी लेकर पहुंचा, यात्रियों से पूछने लगा- किसी को प्यास लगी है. यात्री इस नौटंकी छाप पानी को क्या पीते. अंदर वाले संतोष जरूर पानी पी लिये. यह कहते हुए-बोलते-बोलते गला दुखा गया है रे, पिलाओ पनिया.

घड़ी की सुई बारह पर पहुंच गयी, बस वहीं लगी रही. पता नहीं क्या हुआ अचानक कि अंदरवाले संतोष ने कहा- अरे कंडक्टर स्साला, बइठाओ तेरह पर दोसरा के लेकिन हम चार पर ना बइठेंगे, हम जमीन पर सुत के जाएंगे लेकिन ओह सीट पर ना बइठेंगे, जेकरा हम पहिले ना कह दिये थे. बाहर वाले संतोष प्रसन्नचित्त आकर तेरह नंबर पर बैठ गये. अंदरवाले संतोष को कंडक्टर ने चादर बिछाकर सीटों के बीच गलियारे में लेट जाने का इंतजाम कर दिया. मामू 100 पर फोन लगाते-लगाते परेशानहाल थे. बस खुली तो फोन किसी ने रीसिव कर लिया. उंघे स्वर में उन्हें हैलो सुनायी पड़ा. मामू ने कहा- कब से फोन लगा रहे हैं, आपलोग रीसिव तक नहीं करते! उधर से फोन रीसिव किये सज्जन का जवाब था- हुआ का, सो तो बताइये. मामू ने कहा- बस दो घंटे तक बंधक बनी रही, आपको फोन मिलाते रहे. उधर से जवाब था- तो बसवा में सब नामरद बइठे हैं का जी, दु गो आदमी बस के बंधक बना लिया था आउर आपलोग मेहरारू लेखा चुड़ी पहिन के बइठे रहे. चलिये, अब तो बस छुट गया न, जाइये आराम से.

बस अब डेहरी से संतोष बाबू के दरवाजे से खुल चुकी थी. हवा से बात करते हुए, तेज गति से. फिर वही महिला बोली- भइया, इतनी तेज भी चलाने की जरूरत नहीं. प्लीज. इस बार जवाब ड्राइवर ने दिया- सब मजा पसिंजरे लोग चाहता है. अभी कह रही थीं कि छह बजे तक पहुंचना जरूरी है तो हमहूं दावा करते हैं- पांच बजे तक ना पहुंचा दिये तो हमरो नाम….! पसिंजर लोग झूठिया हल्ला मचाते रहता है कि ससराम स्टैंड पर दु घंटा लेट हो गया, डेहरी में दु धंटा लेट हो गया. ड्राइवर का अपना चालिसा जारी था- अरे लेट हो गया तो हम हैं न! पांच बजे रोज बस पहुंचती है, आजो पहुंचेगी, चाहे जे हो जाए.
हवा से बात करते हुए, ब्रेकर पर उछाल मारते हुए सरपट बस चलती रही. बस की गति ने मामू का सांस अटका दिया था. वे कलेजे पर हाथ रख रामनामी योग में आ गये थे. मैंने आखिरी टुनकी मारी उनसे- मामू बिहार है, बदलाव है. चलिए लीजिए बस के मजा. अब ना तो लाइन होटल पर गाड़ी रूकेगी, ना गाना सुनने को मिलेगा. मामू निरूत्तर. सासाराम से चले संतोष जो, 20 कित्ता केस लड़ने का तर्क देकर बड़े आदमियों में खुद को शुमार करा चुके थे और जो 13 नंबर छोड़कर, चार नंबर सीट का तिरस्कार अब नीचे लेट चुके थे- जगे और चिल्लाये. अरे कंडेक्टर- जब हम सीट पर जाइये नहीं रहे हैं तो आधा पइसवा तो कम से कम लौटा दो. कंडक्टर बोला- चलिए, ना पूरा दे देंगे. संतोष बाबू बोले- अभिये दो ना. कंडक्टर बोला- अभी चेंज नहीं है, किरिया खा रहे हैं, पूरा दे देंगे सर!

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