भंसाली है कलप्रिट नंबर वन, करनी सेना तो चौथे नंबर की गुनहगार है

पुष्यमित्र

आज जब पद्मावत फिल्म रिलीज हो रही है और पूरा देश करनी सेना की करनी से तबाह है. ऐसे में अगर मुझसे पूछा जाये तो इस तबाही के दोषियों में करनी सेना को चौथे नंबर पर रखूंगा. पहले नंबर पर इस फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली होंगे, दूसरे पर केंद्र और राज्यों की सरकार है, तीसरे नंबर पर हमलोग मीडिया वाले हैं. करनी सेना तो मूर्खताओं का एक वायसर है, जो महज पब्लिसिटी की ख्वाहिश में रक्तबीज की तरह पूरे देश में बेवजह फैल रहा है. अगर मुझे इस मामले का इनवेस्टिगेंटिग अधिकारी बनाया जाये तो मैं दोषियों की फेहरिस्त इसी तरह बनाऊंगा. अब आगे मैं बताता हूं कि मैं ऐसे क्यों सोचता हूं.

1. क्यों संजय लीला भंसाली है कलप्रिट नंबर वन-

क्योंकि भंसाली ने बड़ी चतुराई से इस फिल्म की ऐसी पब्लिसिटी करायी कि करनी सेना या ऐसी कोई सेना इसके विरोध में उतर जाये. उसने बिना सामने आये, इस बात को हवा दी कि इस फिल्म में वे अलाउद्दीन खिलजी के किरदार को नायक की तरह ट्रीट कर सकते हैं. यही वजह है कि उसने खिलजी के ड्रीम सिक्वेंस वाले गानों का वीडियो जारी किया.

हम कह सकते हैं कि उन्हें उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, मगर इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल अगर कोई अपने व्यावसायिक हित में इस तरह करे कि पूरा देश उसकी आग में झुलसने लगे तो यह आपराधिक षडयंत्र ही है. निश्चित तौर पर इस आपराधिक षडयंत्र को हवा देने और पूरे देश में फैलाने में देश की एनडीए सरकारों की भी बड़ी भूमिका है. क्योंकि इस बहाने देश में हिंदुत्व का कट्टरपंथी उभार तेज हो रहा है और इस उभार में वह लगातार वोट की फसल काट रहा है. गुजरात की जीत के पीछे पद्मावत विवाद की कम बड़ी भूमिका नहीं. मगर इस विवाद की जड़ में भंसाली की वह साजिश है. वह पीआर स्ट्रैटेजी है, जिसने पूरे देश को आग में झोंक दिया.

आज भले हमें बाहरी तौर पर भंसाली इस विवाद का शिकार और पीड़ित नजर आ रहा हो. मगर यह अमूमन तय है कि उसकी फिल्म रिलीज होगी और भरपूर कमाई करेगी. अगर किसी वजह से ऐसा नहीं हो पाया तो इसकी वजह वे रक्तबीज होंगे, जिन्हें खुद भंसाली ने अपने मतलब से पैदा किया है.
एक संवेदनशील निर्देशक के तौर पर उसे इस फिल्म को सामान्य तरीके से रिलीज करना चाहिए था, जैसे बिना किसी शोर के मुक्काबाज फिल्म रिलीज हुई और जाति के विवादित मसलों के बावजूद वह लोगों द्वारा सराही जा रही है. मगर इस फिल्म का मकसद तीन सौ करोड़ कमाना और एनडीए को उग्र हिंदुत्व की आग गिफ्ट करना था. वह वसूल किया जा रहा है. चाहे देश भांड में जाये.

2. केंद्र और राज्य की सरकारें-

पढिये राजस्थान सरकार का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे दिया है कि पद्मावत फिल्म की रिलीज में कोई बाधा न हो यह सरकारें सुनिश्चित करें. मगर केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक सभी निष्क्रिय मोड में हैं. जगह-जगह करनी सेनाओं को पैदा होने और आग उगलने की खुली छूट है. यह आश्चर्य है कि महज दो-तीन महीने में पूरे देश में करनी सेना की शाखाएं खुल गयी हैं और लोग प्रदर्शन कर रहे हैं. और उन्हें कोई कुछ कर भी नहीं रहा.

कल दानापुर के एक सिनेमा हॉल वालों ने फिल्म रिलीज करने का साहस दिखाया, मगर कल शाम जाकर इन लोगों ने फिल्म के पोस्टर उतरवा लिये. जगह-जगह स्कूलों में नोटिस जारी किये जा रहे हैं कि गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों में घूमर वाला गाना नहीं बजे, नृत्य नहीं हो. आखिर क्यों. सरकार इतनी लाचार क्यों है कि दो टके की एक सेना के सामने नतमस्तक नजर आ रही है.

यह बीजेपी की घटिया स्ट्रेटेजी है. उसे लगता है कि इस तरह से पूरे देश में हिंदुत्व समर्थक माहौल बन रहा है, जिसका अंततः फायदा उसे ही होगा. इसलिए वह अनर्गल बयान देने वाली साध्वियों और पागल नेताओं के घटिया बयानों का विरोध नहीं करती. वह करनी सेना को रक्तबीज के तरह पसरने का मौका दे रही है. भले देश आग में भस्म हो जाये, मगर उसके वोट तो बढ़ेंगे, यही उसकी स्ट्रैटजी है. गुजरात में ताजा-तरीन लाभ उसे मिला है.

3. मीडिया

हमलोग तीसरे नंबर के दोषी हैं. क्योंकि इस रक्तबीज को पूरे देश में पसरने का मौका हमने ही दिया है. हमने तमाम जरूरी मसलों ताक पर रखकर इस दो कौड़ी के मसले को राष्ट्रीय महत्व का विषय बना दिया. अगर आज देश भर में करनी सेना की शाखाएं हैं तो उसके जिम्मेदार हमलोग हैं.

हम भंसाली की फिल्म की प्रोमोशन स्ट्रैटेजी का हिस्सा बने. कुछ लोगों ने पैसे लिये होंगे, ज्यादातर लोग तो मुफ्त में, महज भेड़चाल की वजह से, इस वजह से भी कि कहीं पीछे न छूट जायें. करनी सेना के उत्पातों को बढ़ा-चढ़ा कर छापा. फिल्म की बातों को जरूरत से अधिक जगह दी. दिलचस्प है कि कल चाईबासा ट्रेजरी से जुड़ा चारा घोटाले का फैसला आया है, मगर वह मसला भी बहस से गायब है. गरीबी, किसानी, बेरोजगारी, कहीं बहस में नहीं है.

आज की सबसे बड़ी बहस पद्मावत है. अगर हम चाहते तो यह बहस हाशिये पर होती. मगर हम ऐसा नहीं कर पाये. हम आज भी बहस पैदा नहीं कर पाते. हम सरकारों से और भंसाली जैसे पीआर स्ट्रेटेजिस्ट से गाइड होते हैं. हमें वह जहां चाहे बहा कर ले जाते हैं. हम अपनी बात नहीं रख पाते. यह मीडिया की विफलता है.

4. करनी सेना, क्षत्रिय सेना

मैं इन्हें चौथे नंबर पर इसलिए रख रहा हूं, क्योंकि इस विवाद में वे भले सबसे सक्रिय नजर आ रहे हैं, मगर उनका इस विवाद से कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं है. वे इतने मूर्ख हैं कि इतना भी तय नहीं कर पाते कि फिल्म में राजपूतों का अपमान हुआ है या उनकी कीर्ति को बढ़ा चढ़ा कर कहा गया है. वे यह भी समझ नहीं पाते कि उनकी छवि लगातार विलेन वाली बनती जा रही है.

अंत में जब भंसाली का काम हो जायेगा, सरकार अपना अधिकतम लाभ उठा लेगी. उसे दूध की मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया जायेगा. कुछ लोगों को पुलिस की लाठी की मार झेलनी पड़ेगी. कुछ लोगों को जेल में डाल दिया जायेगा, यह मूर्खतापूर्ण एडवंचरिज्म उनके जीवन को बरबाद कर देगा. जैसा कार सेवकों, दंगाईयों और बजरंग सेना के लोगों के साथ होता रहा. बाद में वे पछताते हैं.

ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें भ्रम होता है कि वे समाज को बचा रहे हैं, वे हीरो हैं और वे अपना जीवन दाव पर लगा सकते हैं. मगर क्यों. इसका हासिल क्या है. क्या राजपूतों का गौरव बचा लेने से उनका जीवन चल जायेगा. समाज बेहतर हो जायेगा. ये दरअसल ऐसे लोग हैं, जिनके जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है. उनके पास करने के लिए कोई काम नहीं है. उनके लिए यह अवसर खुद को साबित करने का मौका है. दिलचस्प है कि आप इन्हीं लोगों को बाढ के वक्त में पीडितों को राहत पहुंचाते, दुर्घटना होने पर किसी को खून देते, चौक पर बैठकर भाषण देते, मानव श्रृंखला में खड़े होते, सरस्वती पूजा या दुर्गापूजा करते देखेंगे. अब ऐसा कोई काम नहीं है तो ये राजपूतों का गौरव, हिंदुओं की शान बचा रहे हैं.

आज अगर इनके पास जीवन का लक्ष्य होता, सही शिक्षा मिली होती, रोजगार होता तो पिता की दी हुई मोटरसाइकिल पर बैठ कर दिन-दिन भर पोस्टर उखाड़ने और आग लगाने में नहीं जुटे होते. दुःखद यह है कि अपनी नासमझी की वजह से ये उन्हीं लोगों के औजार बनते हैं, जो इनकी बदकिस्मती की वजह हैं.
……….
इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां पक्ष भी वही है और विपक्ष भी वही. राजपूती शान और जौहर को महिमा मंडित करने वाली एक जेवर-साड़ी वाली भव्य मगर बेकार फिल्म बनाने वाले भंसाली आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार नजर आ रहे हैं. कानून-व्यवस्था के नाम पर पद्मावत को बैन कराने की कोशिश में जुटी राज्य सरकारें भंसाली की इस कृति से अपने वोटरों के एकजुट होने का लाभ बैठे-बिठाये उठा रही है. एनडीए की स्ट्रेटेजी का यही नया तीर है. यहां हर बहस में दोनों तरफ उन्हीं के लोग हैं. और जनता को अपना अमन चैन इसी तरह खोते रहना है.

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