चेत जाओ लड़कियों, सौ रुपये की नोटरी पर नहीं होती है शादी

पत्रकार अनुपम कुमारी ने आज प्रभात खबर में एक जरूरी रपट लिखी है. इस रपट को पढ़ने की जरूरत बिहार के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की उन लड़कियों को है जो प्रेम के नाम पर लगातार छली जा रही हैं. प्रेम करने में कोई बुराई नहीं, प्रेम से बेहतर तो कोई चीज ही नहीं. मगर प्रेम विवाह करते वक्त आपको कानूनी रूप से भी सजग रहना चाहिए और यह देखना चाहिए कि आपके अधिकार सुरक्षित तो हैं. पढ़िये यह रिपोर्ट…

अनुपम कुमारी

जिया ने पांच साल पहले वैशाली के पप्पू से शादी की थी. सौ रुपये की नोटरी पर इसे दर्ज भी कराया था. जिया को इस बात का पता तक नहीं था कि शादी के मामले में नोटरी की कोई कानूनी हैसियत नहीं है. कुछ साल तो उसके अच्छे गुजरे. उसके बाद पप्पू को कोई दूसरा भा गया. बिना किसी खास वजह से पति ने उसे साथ रखने से मना कर दिया. तब तक जिया गर्भवती भी हो चुकी थी.

पति से धोखा खायी जिया ने नोटरी के आधार पर अपनी शादी के रिश्ते की दुहाई दी, तब उसे बताया गया कि नोटरी की शादी का कोई कानूनी मान्यता नहीं है, इसके बाद वह निराशा के भंवर में ऐसी खोयी कि उसे अपना जीवन बोझ लगने लगा. हालांकि वह अब हिम्मत जुटाकर महिला हेल्पलाइन की शरण में पहुंची है. उसे उम्मीद है कि उसे ब्याहता का हक मिले या नहीं मिले, उसके बच्चे को उसका हक जरूर मिलना चाहिए. घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत लिव इन रिलेशनशिप को मान्यता है. ऐसा सिर्फ जिया के साथ नहीं हुआ, कई और ऐसे मामले हैं.

राजाबाजार निवासी, परिवर्तित नाम कुसुम ने भी 2012 में प्रेम विवाह रचाया था. उसने दरभंगा कोर्ट में 100 रुपये के नोटरी पर साथ जीने और मरने की कसमें खायीं. पर शादी के कुछ सालों बाद कुसुम को पता चला कि उसके पति का संबंध किसी अन्य महिला के साथ है. जब कुसुम ने इसका विरोध किया, तो पति ने उसे पत्नी मानने से भी इन्कार कर दिया. बाद में जब उसने महिला हेल्पलाइन में केस दर्ज कराया तो, पता चला कि उसकी शादी महज सौ रुपये की नोटरी पर की गयी है. जिसका कोई मूल्य नहीं है.

शिवहर जिला निवासी, परिवर्तित नाम प्रिया ने अपने चार साल से चल रहे प्रेम-संबंधों को मुक्कमल जहां देने के लिए पहले तो मंदिर में शादी रचा ली, इसके बाद उसने नादानी में 100 रुपये की नोटरी पेपर पर शादी कर डाली. पर अब अपनी सुरक्षा को लेकर कभी दोस्तों के घर तो कभी रिश्तेदारों के यहां शरण ले रही है. इससे बचने के लिए अब उसने महिला आयोग में शरण ली है. जहां, उसकी नोटरी की शादी को सबूत मानने से इन्कार कर दिया है. अब वह मंदिर के रशीद जुटाने में लगी है. ताकि, वह अपनी शादी का सबूत दे सकें.

महीने में आठ से दस ऐसे मामले होते हैं दर्ज

महिला हेल्पलाइन की मानें, तो महीने में 35 से 40 मामले दर्ज होते हैं. इनमें आठ से दस मामले प्रेम विवाह के होते हैं. इनमें ज्यादातर शादियां मंदिर और नोटरी पेपर पर हुई रहती हैं. लेकिन, जब वह उसे बचाने के लिए कानून का सहारा लेती हैं, तो फिर उनकी नोटरी की शादी मान्य नहीं होने से उन्हें न्याय से वंचित रहना पड़ता है.

केस रिपोर्ट बताती हैं कि शपथपत्र के आधार पर लव मैरिज रचानेवालों के लिए प्यार का बंधन टिकाऊ साबित नहीं हो रहा है. समाज से परे इन शादियों को कानूनी मान्यता नहीं मिल पा रही है. सच्चाई यह है कि सौ रुपये के जिस शपथपत्र पर प्रेमी युगल पवित्र बंधन को मजबूती देते हैं, उसकी कानूनी हैसियत रद्दी के टुकड़े से ज्यादा नहीं है. दरअसल दिक्कत तब आती है, जब इन युगलों के जीवन में कोई तीसरा आ जाता है.

निराशा के इस दौर में वे अपना हक और शादी को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए महिला हेल्पलाइन के सामने पहुंच रही हैं. दरअसल शपथपत्र के आधार पर ये लड़कियां अपने को ब्याहता साबित नहीं कर पाती. अधिकतर मामले में प्रेम विवाह रचानेवाले लड़के दूसरी शादी कर लेते हैं.

तो फिर कैसे करें कोर्ट मैरिज

विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत कोर्ट मैरिज का प्रावधान है, जो रजिस्टार के समक्ष की जाती है. इसके लिए रजिस्ट्री कार्यालय में एज और एड्रेस प्रूफ और लड़का-लड़की को चार-चार पासपोर्ट साइज फोटो के साथ विवाह के लिए आवेदन करना होता है. आवेदन जमा करने के बाद कार्यालय द्वारा उसे नोटिस बोर्ड में 30 दिनों तक आपत्ति ली जाती है.

30 दिन बाद वह रजिस्टार के समक्ष उनकी शादी कर दी जाती है. वहीं, जिनकी शादियां परिवार के सदस्यों के साथ सामाजिक रूप से या किसी मंदिर में की जाती है. उनके लिए भी कोर्ट से निबंधन कराने का प्रावधान बनाया गया है. जहां, वह अपनी शादी का निबंधन करा का कानूनी रूप से मुहर लगवा सकती है.

वकील सीमा कुमारी कहती हैं, हिंदू मैरिज एक्ट के तहत दो तरह से की गयी शादियों को कानूनी रूप से वैध माना गया है. हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार यदि निबंधित मंदिर में अग्नि के साथ सात फेरे लिये गये हों. साथ ही मंदिर का रसीद हो. मंदिर रजिस्ट्रेशन एक्ट और धार्मिक न्यास बोर्ड के तहत रजिस्ट्रड होना जरूरी है. वहीं, दूसरी ओर कोर्ट मैरिज जो रजिस्टार के समक्ष किया गया हो.

महिला हेल्पलाइन की परियोजना प्रबंधक प्रमिला कुमारी कहती हैं, महिलाओं को जागरूक होने की जरूरत है. मंदिर और नोटरी पेपर पर की गयी शादियों को कानूनी रूप से मान्यता नहीं होने से जब रिश्तों में खटास आती है, तो ऐसी स्थिति में महिलाएं न्याय प्रक्रिया से वंचित रह जाती हैं. उनके पास उनकी शादी तक का कोई प्रूफ नहीं होता है. यहां तक ऐसी स्थिति में प्रेम विवाह करनेवाली लड़कियों को परिवारवालों का साथ भी नहीं मिल पाता है. इससे वे कई बार आत्महत्या तक कदम उठा लेती हैं.

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