इस मौसम में मिस मत कीजिये बथुआ का झोर

झोर देसी शब्द है, अगर समझ नहीं आये तो इसे सूप कह सकते हैं. ठंड के मौसम में गरमागरम बथुआ का झोर मिल जाये तो समझिये स्वर्ग में ही हैं. हालांकि यह हम जैसे देहात से उजड़ कर शहर में बसे लोगों का अहसास है. गांव में हाल-हाल तक बथुआ को गरीबों का भोजन ही समझा जाता रहा है. बथुआ वैसे ही खेतों में बिना बीज के उग जाता है, जैसे इस देश में गरीबी. इसलिये गांव के खेतों में अगर कोई गरीब कन्या बथुआ तोड़ने घुस जाए तो कोई मना नहीं करता. क्योंकि बथुआ का क्या मोल. इस सवाल पर लेखक मिथिलेश कुमार राय ने बहुत रोचक गद्य लिखा है, जो आगे आप पढ़ेंगे.

पहले यह समझ लें कि भले गांवों में सम्पन्न तबका आज भी बथुआ को बेकार समझता हो, मगर पूरे देश के शहरों, महानगरों में बथुआ मूल्यवान हो चुका है. उसकी वजह है, इसकी गजब की तासीर. यह पेट भी ठीक रखता है, आंख भी और सर्दियों में शरीर को गर्म भी रखता है. इसलिये घर-घर में बथुआ का झोर काढ़े की तरह प्रेम से पिया जाता है.

बहुत सिंपल है. बथुआ के साथ थोड़ी सी मूंग दाल, ठीक लगे तो थोड़ा बैगन, नमक, हल्दी वगैरह दाल कर पका लीजिये. फिर बाद में इसे लहसन और अजवाइन से छौंक लीजिये. वैसे तो इसकी भाजी भी बनती है, और भी कई रेसिपीज पूरे देश में पकाए जाते हैं. वह सब गूगल और यू ट्यूब पर है ही. अब आईये पढ़ते हैं, मिथिलेश जी का साग महात्म्य.

सरसों पर जैसे टैक्स लगा हो, लेकिन बथुआ बिल्कुल फिरी है

मिथिलेश कुमार राय

गांव से लेकर शहर तक यह सीजन साग का सीजन है. थाली में एक साग न हो तो भोजन प्रेमियों का मन नहीं मानता. शहरों में तो अब मंडी चले जाइये, जो चाहे वही साग उपलब्ध है, मगर गांव में साग हासिल करने के लिए खेत-खेत भटकना पड़ता है. साग का प्रेम सबसे अधिक महिलाओं को होता है, खास तौर पर नवयुवतियों को. वे इस मौसम में पूरे देश में खेतों में भटकती रहती हैं, साग पाने के लिए. इससे उन्हें साग तो मिल ही जाता है, लड़कियों की रंग बिरंगी पोशाकें और उन्मुक्त हंसी की वजह से गांवों में बेमौसम बसंत आ जाता है. कई बार तो मुझे यह भी लगता है कि साग सिर्फ साग भर नहीं बल्कि यह एक तरह की स्वतंत्रता का पर्याय भी है. स्वाद तो है ही, साग एक बहाना भी है.

इन दिनों स्कूलों में छुट्टी के बाद खेतों में लड़कियों का राज हो जाता है. सब्जियों के इस मौसम में गेहूं के खेतों में उगे बथुआ साग और उसके बगल के खेतों में लहलहाते खेसारी साग, सरसों साग उन्हें खूब-खूब आकर्षित करती हैं. स्कूल से आने के बाद लड़कियां खेतों के बीहड़ में उतरने के लिए हड़बड़ाई रहती हैं. कभी-कभी इस झुंड में कोई नव-विवाहिता या कोई बुजुर्ग महिलाएं भी शामिल हो जाती हैं. लेकिन जिस दिन ऐसा होता है उस दिन लड़कियों की मस्ती पर असर पड़ जाता है. पैरों में रस्सी जैसा कुछ उलझ जाता है. क्योंकि वे इन्हें नहर के उस पार नहीं जाने देतीं. चौकीदार बन जाती हैं और आँखें तरेरने लगती हैं. गाँव की भी पाबंदी है. साग ही तो तोड़ने जाना है तो इन खेतों में क्या साग की कमी है कि नहर के पार जाएगी. खबरदार. नहर से इधर ही तोड़कर वापस आ जाएं घर! जबकि लड़कियां पैरों की रस्सी खोल खूब कुलांचे भरना चाहती हैं. नहर के उस पार तक. उस पार जहां तक नजर जाती हैं सिर्फ हरियाली ही हरियाली नजर आती हैं. सुरसरि तक. आँखों को खूब सकून मिलता है. मन को कितनी शांति मिलती है. जोरजोर से हंसो. खूब चिल्लाओ. कोई टोकनेवाला नहीं. अब तो सरसों में भी फूल आने लगे हैं. कितना अच्छा लगता है.

गेहूं के खेतों में दर्जन-दर्जन भर लड़कियां उतरकर बथुआ का साग खोंटने लगी हैं. तभी किसी ने कुछ ऐसा कहा कि हंसी ने बाँध तोड़ दी. वातावरण खिलखिलाने लगा. लेकिन तभी बुढ़िया माई ने टोक दिया तो ठहाकों पर लगाम लग गयी. यही नहीं सुहाता.

बथुआ खोटते-खोटते लड़कियाँ इधर-उधर देखती हैं और बगल के खेसारी के खेत में छलांग लगा देती हैं. हाथ बढ़ाकर थोड़ा सा धनिया नोच लेती हैं. सरसों का पत्ता भी एक-आध मुट्ठी तोड़ लेती हैं. लेकिन तभी दूर से एक आवाज आती है. यह खेत मालिक की आवाज है. जिसे सुनकर लड़कियाँ दौड़कर फिर बथुआ खोंटने बैठ जाती है. बथुआ एकदम फ्री है. खेसारी, धनिया, सरसों पर टैक्स लगा है जैसे! लेकिन आँख बचाकर खोटने से कौन रोक सकता है भला! खोंइछा में नीचे खेसारी और ऊपर बथुआ. पकड़े जाने पर दूर से खोंइछा में पड़ा बथुआ दिखाकर खिलखिलाती हुई घर की ओर दुलक पड़ती हैं.

बथुआ चंगेरा में डालकर घर के छप्पर पर रात भर शीत में और खेसारी पकाकर सुबह तक बासी होने के लिए छोड़ दिया गया है. बासी खेसारी और अदरकवाला बथुआ का कोई जवाब नहीं. ऊपर से धनिया की चटनी. फिर भात हो या रोटी-पेट भर जाता है, मन नहीं भरता !

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