बसंत सबका है, खुसरो ने औलिया को पीले फूल देकर ही शोक से उबारा था

उपासना झा

Upasna Jha
उपासना झा

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
[ हे परम चेतना, सरस्वती के रूप में आप हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार आप ही हैं. आपकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है.]

ऋग्वेद में देवी की स्तुति इस प्रकार की गई है. माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को विद्या की अधिष्ठात्री देवी की पूजा की जाती है.

तिथि के अनुसार आज ही हिंदी के सबसे बड़े कवि महाप्राण का जन्मदिन भी है. ‘मैं ही बसंत का अग्रदूत’ का उद्घोष करने वाले निराला ने देवी की सुंदर प्रार्थना लिखी.

वर दे, वीणावादिनि वर दे !
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे !
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे !
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
वर दे, वीणावादिनि वर दे।

[आज सुबह ही यह ख़बर पढ़ने को मिली कि उनके पैतृक आवास की एक दीवाल ढह गई और कुछ सम्बन्धी घायल हो गये, यह देश अपने कवियों को ऐसे ही सम्मान देता है, ऐसे ही संरक्षित रखता है]

बसंत का आगमन सूफ़ी भी बहुत उल्लास से मनाते हैं. हज़रत अमीर ख़ुसरो ने अपने औलिया को उनके भांजे की मृत्युशोक से पीले फूल समर्पित कर अवसाद से बाहर निकाला था. कुछ हिन्दू पथिकों को देवीमन्दिर में पीले फूल ले जाते देखकर ख़ुसरो को यह ख़याल आया था.

वहीं लाहौर में आज पतंगोसत्व होता है. लोककथा है कि वीर हकीकत को झूठे मुकदमे में फंसा कर प्राणदण्ड सुना दिया गया. लेकिन जल्लाद उनका भोला मुख देखकर तलवार चला नहीं पा रहा था. तब वीर हकीकत ने कहा ‘जब मैंने अपना धर्म नहीं छोड़ा तो तुम भी अपना धर्म मत छोड़ो’. उनका शीश कटकर पृथ्वी पर नहीं गिरा बल्कि आकाशमार्ग से स्वर्ग चला गया.

बिहार में जितनी धूम रहती है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं दिखा. हर गली-मोहल्ले, छोटे-बड़े शिक्षण संस्थानों में मूर्ति की प्रतिष्ठा की जाती है. मेले लगते हैं. चारों तरफ उल्लास रहता है. बचपन के दिनों की बहुत सुंदर स्मृतियाँ इस दिन से जुड़ी हैं. चन्दा इक्कट्ठा करने से लेकर, सजावट, पूजा, प्रसाद वितरण और विसर्जन बहुत मनोयोग और निष्ठा से पूरा करते थे। यह पूजा अन्य राज्यो में इतने धूम से क्यों नहीं होती, नहीं पता.

इसका क्या आर्थिक-मनोवैज्ञानिक कारण है, नहीं जानती. यही समझ आया है कि बिहार एक गरीब प्रदेश है और गरीब को मेधा का ही सहारा रहता है.

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