बनारस के घाट पर खुली आर्ट गैलरी सजती है सासाराम के मुन्ना की

शशांक मुकुट शेखर

शशांक पटना के संवेदनशील युवकों में से एक हैं. अच्छे फोटोग्राफर हैं. पत्रकार बनते-बनते सोशल मीडिया एक्सपर्ट बन गये हैं.

आप कभी बनारस के चेत सिंह घाट से होकर गुजरे होंगे तो आपने वहां की सीढियों पर अपनी पेंटिंग्स के साथ बैठे इस शख्स जो जरूर देखा होगा. यह मुन्ना शाह नामक इस चित्रकार की खुली आर्ट गैलरी है. ज्यादातर विदेशी पर्यटक और कभी-कभार देशी पर्यटक को कोई पेंटिंग पसंद आ गई तो इनकी कमाई हो जाती है. क्या आप जानते हैं कि इस औघड़ से दिखने वाले चित्रकार की कथा क्या है. 65 साल के मुन्ना बताते हैं कि वे मूलतः बिहार के सासाराम जिले के रहने वाले हैं.

मुन्ना शाह बचपन से ही चित्रकारी के शौक़ीन थे. स्कूल में किसी भी विषय की पढाई हो रही हो, छोटा मुन्ना बस चित्रकारी करता रहता था. मास्टर साहब से हर रोज मार पड़ती और घर आने पर पिताजी की झाड़ अलग. कई दफा मास्टरजी के साथ-साथ पिताजी ने भी इनके ड्राइंग किए हुए पन्ने फाड़ डाले. मगर मुन्ना के मन में बसे कलाकार रूपी शीशे को स्पर्श तक नहीं कर सके.

उम्र यही कोई 12-13 साल की रही होगी, जब वे घर से भागे थे.भागकर सीधे बनारस जा पहुंचे. पिताजी ने किसी तरह ढूंढा और वापस घर ले गए. मगर जल्द ही फिर इनके पैरों ने बनारस का रास्ता पकड़ लिया. तब से बनारस को ही इन्होंने अपनी प्रेरणा बना ली और यहीं बस गए. लड़कपन में ही कलाकार मुन्ना ने कलाकारी की नगरी बनारस की ओर कूच किया तथा माँ गंगा की गोद में आकर अपनी चित्रकारी को निखारने में लग गए.

अगर आप इनकी पेंटिंग को गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि इनके हाथ कितने सधे हुए हैं. इतने निपुण होने के बावजूद भी कभी कैनवास पेंटिंग की तरफ ध्यान नहीं दिया. कोरे कागज पर पेन्सिल और रंग उकेरने की बचपन की आदत आज भी बनी हुई है. इसलिए इनके ज्यादातर पेंटिंग्स इसी तरह की होती है.

चेत सिंह घाट पर मुन्ना की ओपन आर्ट गैलरी

बनारस के साथ-साथ उन्हें सासाराम से भी उतना ही प्यार है. इसलिए जब याद सताती है तो निकल पड़ते हैं घर सासाराम की ओर. मगर दिल, दिमाग और आत्मा तो उसी घाट की उन्हीं सीढियों पर बसती है.अगर कभी बनारस जाएं तो मुन्ना शाह की पेंटिंग्स पर एक नजर जरुर दौडाएं.

इनके द्वारा बनाई गए चित्र बनारस के कई घाटों की शोभा बढ़ा रहे हैं. इनको विभिन्न जगहों से काम करने के ऑफर मिलते रहते हैं. उसमें पैसा भी अच्छा मिलता है. मगर मुन्ना शाह को बनारस के चेत सिंह घाट की सीढियों से अथाह प्यार है. सो उनको छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते.

वे कहते हैं कि, “पेंटिंग इनका पेशा नहीं बल्कि इनका प्यार है.इसी कारण इन्होंने शादी भी नहीं की.अपनी आत्मा की ख़ुशी के लिए पेंटिंग्स बनाते हैं और उन्हें लेकर चेत सिंह घाट की सीढियों पर बैठ जाते हैं.जिन्दगी बहुत सिंपल है तो थोड़ी कमाई में भी गुजारा हो जाता है.”

एक कलाकार को बांध कर रखना समुंद्र को एक स्थान पर स्थिर कर सकने जितना मुश्किल है. कलाकार गगन के पंछियों जैसा स्वछंद होता है. कला के प्रति उनका प्रेम व समर्पण से कला खुद उसे अपने पास बुला लेती है. और यदि कलाकार को स्वयं बनारस आवाज दे रहा हो तो उसे हनुमान की पूंछ में लपेटकर भी नहीं रोका जा सकता है. ऐसे ही एक कलाकार हैं सासाराम के मुन्ना शाह.

Spread the love

Related posts