पटना के बाबर इमाम से पूछिये ग़ालिब कौन हैं

पुष्यमित्र

पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या।

ग़ालिब का यह शेर काफी मशहूर है. मगर मियां ग़ालिब को उसके ही मुल्क में कितने लोग जानते समझते हैं. उर्दू के चार हजार और फ़ारसी के दस हजार शेरों में से बमुश्किल छंटाक भर शेर ऐसे हैं, जिन्हें समझते-बूझते और दुहराते रहते हैं. ग़ालिब के दीवान में कुछ शब्दों के मायने फुटनोट्स में लिखे रहते हैं, उनकी मदद से हम थोड़ा आगे बढ़ते हैं. मगर कितना, उनके 90 फीसदी शेर आज भी हमारे लिये अजनबी हैं. हम जानते हैं कि उन शेरों में भी वही शीरनी घुली है, मगर हम उसे चखें कैसे. बहरहाल फिक्र की कोई बात नहीं है.

एक सज्जन इस दुनिया में हैं, जो इस काम में लोगों की मदद कर रहे हैं. फेसबुक पर ग़ालिब को समझने का ट्यूटोरियल चला रहे हैं. उनका नाम बाबर इमाम है. 40-42 साल के तकरीबन नौजवान बाबर से दुनिया भर के लोग ग़ालिब के शेरों के मायने पूछते हैं और वे भी बड़े इत्मीनान से उन्हें बताते हैं. वे फेसबुक पर मिर्जा गालिब के नाम से एक पेज चलाते हैं, जिसके आज साढ़े तीन लाख फॉलोवर हैं. अगर आप भी ग़ालिब की शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखते हैं तो इस पेज को फॉलो कीजिये. जहां वे रोज ग़ालिब के एक शेर को पेश करते हैं, उसके मायने लोगों से पूछते हैं और आखिर में खुद उसके मायने बताते हैं.

पटना शहर के सब्ज़ीबाग इलाक़े में रहने वाले करीब 40 वर्षीय बाबर कहते हैं, ‘‘मैं चाहता हूं कि आम आदमी भी ग़ालिब को पसंद करे, उन्हें समझ सके.’’

मिर्जा गालिब के नाम का फेसबुक पेज

यह बड़ा दिलचस्प मामला है कि आखिर पेशे से सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल बाबर को ग़ालिब के शेरों की उस्तादी कैसे हासिल हुई. इन सबकी शुरुआत 2007 में हुई जब वे शौक ही शौक में मिर्जा गालिब पर बने एक क्लोज्ड फेसबुक ग्रुप से जुड़ गए, जिसमें दुनिया भर के 7-8 हजार ग़ालिब के फैन उनके शेरों पर बातें करते थे. वहां ग़ालिब से इनका जुड़ाव ऐसा बना कि इन्होंने फ़ारसी सीखना शुरू कर दिया. 2011 में इन्हें उस ग्रुप का मॉडरेटर बना दिया गया. फिर उन्होंने मिर्जा गालिब के नाम से अलग फेसबुक पेज बनाया, जहां आज साढ़े तीन लाख लोग इनसे जुड़कर ग़ालिब को सीखते समझते हैं.

इसके अलावा जो एक बेहतरीन काम इन्होंने किया है वह है ग़ालिब की एक गुमनाम किताब कादिरनामा को रोशनी में लाने का. कादिरनामा हिंदी-फ़ारसी डिक्शनरी है, जिसे ग़ालिब ने अपने बच्चों के लिये तैयार किया था. बाबर ने उस डिक्शनरी को अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया है. अब वह किताब ग़ालिब को समझने की ख्वाहिश रखने वालों के बीच काफी मकबूल हो रही है. पाकिस्तान के एक प्राइवेट स्कूल ग्रुप ने तो इसे अपने स्कूली सिलेबस में शामिल करने का फैसला कर लिया है.

बाबर से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई, मैंने इन्हें अपने सीनियर अजय कुमार की लिखी रिपोर्ट के जरिये जाना है, जो उन्होंने दो साल पहले लिखी थी और प्रभात खबर में छपी थी. बाद में मनीष शांडिल्य जी ने भी बीबीसी के लिये उनपर अच्छी रिपोर्ट लिखी. बहरहाल अगर आपको मौका मिलता है तो बाबर से मिलें, फेसबुक पर उनसे जुड़े और ग़ालिब के उन शेरों के भी मजा लें जिन्हें आप भाषाई बाध्यताओं की वजह से समझ नहीं पाते.

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