‘सौ साल में ही क्यों कूड़ाघर में बदल गया आर्किटेक्ट मूनिंग्स का रचा हुआ पटना’

जब बिहार बंगाल से अलग होकर नया राज्य बना तो एक आस्ट्रेलियाई आर्किटेक्ट जोसेफ फेरिस मूनिंग्स ने इसकी नयी राजधानी पटना के सत्ता प्रतिष्ठानों का डिजाइन किया. इनमें पटना सचिवालय, जीपीओ और संभवतः राजभवन, विधानसभा वगैरह का पूरा इलाका है. यह सचमुच बहुत खूबसूरत है. आज भी है. मगर जिस तरह दिल्ली के लोग इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन को लटियन जोन के रूप में याद करते हैं, चंडीगढ़ शहर के लोगों के मन में ला काबूजियर को लेकर एक सम्मान का भाव है, पटना वासी न मूनिंग्स को याद करते हैं, न हमने राजभवन और विधानसभा वाले इलाके का नाम मूनिंग्स जोन रखा है. हमारी निगाह में पटना की छवि कुछ वैसी ही है जो लेखक अमितावा कुमार ने लिखा है, खदबदाते चूहों का शहर, गांधी मैदान और कालीदास रंगालय के बीच का सूअरबाड़ा, अशोक राजपथ की भीड़-भाड़, बोरिंग रोड का अनियंत्रित जाम, नाला रोड की दुर्गम सड़कें. आज म्य़ूनिंग्स को याद करते हुए जाने माने पत्रकार रवीश कुमार एक बड़ा सा पीस लिखा है और कई चीजों का उल्लेख किया है, तो इसे हम भी यहां शेयर कर रहे हैं. ताकि इसी बहाने आप पटना को जानें तो…

रवीश कुमार

रवीश कुमार

बहुत कम लोगों को पता होगा कि आस्ट्रेलिया के एक आर्किटेक्ट ने बिहार की राजधानी नया पटना का निर्माण किया था जो उस समय लटियन और बेकर की बनाई दिल्ली से भी बेहतरीन माना गया था. सर्दी में धूपोस्वादन के दौरान इतिहासकार विश्वमोहन झा की इस बात पर चौंक गया. उन्होंने बताया कि 1912-18 के बीच बिहार झारखंड के पीडबल्यू डिपार्टमेंट में आस्ट्रेलिया से आया एक आर्किटेक्ट था जिसका नाम था जोसेफ एफ मुनिंग्स ने किया था.
सुनते ही मेरा दिमाग़ पटना के सारे हिस्से को स्कैन करने लगा. मुझे तो कभी वो पटना दिखा ही नहीं जिसकी तुलना लटियन की दिल्ली से की जाती होगी. पटना के विस्तार में यूरोपियन नियोक्लासिकल डिज़ाइन के मूल तत्व भी देख जा सकते हैं. विश्वमोहन जी ने मुझे एक किताब के बारे में बताया. Houlton‘s Bihar, the heart of India.

इस किताब का परिचय लिखते वक्त विश्वमोहन झा ने किताबों के नाम में heart के रूपक के इस्तमाल के चलन की बहुत अच्छी जानकारी दी है. बताते हैं कि कैसे 1889 की एक किताब में Heart of Asia का रुपक 1995 में आई मार्क टली की किताब The Heart of India तक के सफर में कई बार बदलता है. काफी बदलता है.

बहरहाल, एक दिलचस्प किताब हाथ में थी तो सोचा पढ़ने के बाद कुछ आपसे साझा कर लूं. मेरी बात मान लीजिए, जिस तरह से आप बीच बीच में स्मार्ट फोन, सोशल मीडिया से ख़ुद को ज़बरन दूर करते हैं, इनकी आदतों के ज़हर से मुक्त होने के लिए, वैसे ही टीवी और रोज़ रोज़ कूड़ा अख़बार पढ़ने से दूर होने के लिए कीजिए और कुछ अच्छा पढ़िए. कोई ज़रूरी नही है घड़ी घड़ी न्यूज़ जानना. आपको अच्छा लगेगा. टीवी के पांच एंकर आपकी ज़िंदगी में जानकारी के तमाम अनुभवों को गटर की दुर्गंध में बदल रहे हैं.

ख़ैर इतिहासकार हेतुकर झा जब ज़िंदा थे तो वे बिहार पर एक सीरीज़ निकाल रहे थे. यह सीरीज़ बिहार के इतिहास को समझने के लिए लिखित दस्तावेज़ों का परिचय और संकलन है. इसका नाम है कामेश्वर सिंह बिहार हेरिटेज सीरीज़. इसी के 21 वें अंक का संपादन विश्वमोहन झा ने किया है. 600 रुपये की किताब है. किताब पर प्रकाशक का एक फोन नंबर दिया हुआ है 0612- 2521958. J W HOULTON 1930 से 1948 तक इंडियन सिविल सर्विस की सेवा से जुड़े रहे. आप इसे पढ़ते हुए देख सकते हैं कि एक अफसर बिहार के बारे में यूरोपीय आगंतुकों का परिचय किस तरह से कराना चाहता है. वह बिहार को अपने समय में किस तरह से जानता है. मेरी तरह कभी भी और कुछ भी पढ़ने की दिलचस्पी हो तभी यह किताब ख़रीदें.

हॉल्टन ने लिखा है कि डॉ स्पूनर ने कुम्हरार में प्राचीन पटना की खुदाई की थी. 17 फीट तक खुदाई करने के बाद कुछ खंभों की कतार तो मिली मगर ज़्यादातर ग़ायब हो चुके थे. शायद अपनी भार की वजह से इतनी गहराई तक जा धंसे थे कि कोई बोरिंग वहां तक नहीं पहुंच सकता था. फिर भी उस वक्त जो मिला वो आर्कियोलॉजी की एक बड़ी त्रासदी भी थी और रोमांच भी था. ये खंभे 2500 साल पुराने थे. एक और पुरात्तववेत्ता का ज़िक्र है जिनका नाम है सर रतन टाटा! आज वाले नहीं. पटना का गोलघर अब 231 साल का हो चुका है! हॉल्टन की किताब 1948 में आई थी.
हॉल्टन ने लिखा है कि कमिश्नर और बाकी अफसरों की पुरानी इमारतें भूकंप में ध्वस्त हो गई थीं. नदी के किनारे सिविल सर्जन की इमारत बच गई थी. बांकीपुर क्लब के पास ज़िला जज का घर है. ईस्ट इंडिया कंपनी ने सबसे पहले इसी मकान के लिए ज़मीन ख़रीदी थी. इस इमारत का इस्तमाल मुंसिफ कोर्ट के रूप में होने लगा था.

पटना सचिवालय

गंगा नदी के किनारे रैंडफ्यूरिल नॉक्स का एक मकबरा बना हुआ है जो 1764 में मर गया था. नॉक्स की सेना ने सिताब राय के 300 लोगों के साथ हाजीपुर में बादशाह अली गौहर और JEAN LAW की 6000 की सेना को मात दे दिया था. नॉक्स बड़ा ही चरित्रवान था जिसे यूरोपीय भी पसंद करते थे और भारतीय भी. बिरपुर युद्ध के बाद सिताब राय भी हीरो बन गए. वो तो ठीक है अली गौहर और ज़ीन लॉ की सेना क्या है जी!
जानते रहिए, मज़ा आएगा. पटना में कोई पादरी की हवेली थी. अब का पता नहीं. अफीम की फैक्ट्रियां तो ग़ायब ही गई हैं. इन फैक्ट्रियों का इतिहास अमितावा कुमार ने अपनी किताब A MATTER OF RATS में किया है. ALEPH से छपी यह किताब 295 रुपये की है. इस किताब में मेरा भी ज़िक्र है! वाकई अमितावा का पटना पढ़ते हुए आपको अच्छा लगेगा.

Houlton और अमितावा कुमार करीब करीब एक जैसे लगते हैं. बहुत ज़्यादा नहीं भी तो दोनों पटना के प्राचीन हो चुके आधुनिक इतिहास और वर्तमान का परिचय अपनी किताब में देते हैं. इसी कड़ी में एक और किताब का ज़िक्र कर देना चाहता हूं. आईन-ए-तिरहुत. मिथिला के इतिहास की यह दिलचस्प किताब है. बहुत काम की बातें नहीं हैं मगर उस दौरान के लोगों का ज़िक्र है. इस लिहाज़ से मस्त है. पेशेवर इतिहासकारों के लिए तो मज़ेदार किताब है. इसकी तस्वीर अलग से लगाऊंगा. मेरी एक आदत है. मैं किताब का पूरा नाम बताता हूं, प्रकाशक और दाम भी बताता हूं.

हॉल्टन भूंकप में गंगा किनारे बनी कई पुरानी इमारतों के ग़ायब हो जाने का ज़िक्र करते हैं. इसी से ध्यान आया कि क्या आप किसी ऐसी किताब के बारे में जानते हैं जो भूकंप के पहले और बाद के पटना का सूक्ष्म विश्लेषण करता हो? लिखते हैं कि कुछ इमारतों को बदलकर दूसरे इस्तमाल में लाया जाने लगा. ऐसी ही एक इमारत में पटना जनरल अस्पताल चलने लगा और एक में पटना कालेज. पटना कालेज की इमारत की वास्तुकला के बारे में हल्का सा ज़िक्र है. हॉल्टन की किताब में आईं कुछ इमारतें लगता है आज भी हैं. बिहार चुनाव के दौरान मैंने कुछ इमारतों को देखा था. गंगा के किनारे ही शेरशाह ने पटना किला बनवाया था. उसके अवशेष हैं.

हॉल्टन ने लिखा है कि नया पटना मिस्टर मूनिंग्स ने बनाया. काफी खुला विस्तार था जिसकी तुलना दिल्ली से की जा सकती थी. किंग जार्ज एवेन्यु 200 फीट चौड़ा था जिसके दोनों तरफ अमलतास और गुलमोहर के पेड़ लगे थे. बस इतना ही लिखा है. काश और भी लिखा होता. यह पढ़ने के बाद मन कर रहा है कि मूनिंग्स का नक्शा देखा जाए. उस पटना की तलाश की जाए जिसकी तुलना लटियन दिल्ली से होती थी और वो लटियन की दिल्ली से बेहतर था.
विश्वमोहन जी ने बताया कि मुनिंग्स 1912-18 के बीच बिहार और झारखंड सरकार के सलाहकार आर्किटेक्ट थे. मुनिंग्स के पटना बनाए जाने के बाद पुराना पटना पटना सिटी कहलाया जाने लगा. पुराना पटना और नया पटना का अंतर हुआ. पटना सिटी पुराने पटना गया रोड पर साढ़े सात वर्ग किमी इलाके में फैला था. औपनिवेशिक भारत के आर्किटेक्चरल इतिहास के हालिया सर्वे में इस बात की तस्दीक भी की गई है.

आज का पटना वैसे किसी लायक शहर नहीं है. हमारे मित्र रंजन पटना की दुर्दशा पर फेसबुक पेज पर लगातार लिखते रहते हैं. किसी का भी राज हो, सबने पटना को कूड़ाघर बनने दिया है. पटना एक मरा हुआ शहर है. जहां लोग दिल्ली न जा सकने के कारण रुके हुए हैं या फिर दिल्ली से आने वालों को रिसीव करने के लिए.

पटना जीपीओ, जो इस साल सौ साल का हुआ है

फेसबुक की दुनिया अजीब इत्तेफाक़ रच देती है. आज सुबह मैंने अपने इस फेसबुक पेज न्यूज़ीलैंड में पैदा हुए, आस्ट्रेलिया से भारत आकर न्यू पटना बसाने वाले मूनिंग्स के बारे में लिखा तो पटना से न्यूज़ीलैंड पढ़ने गए और वहां नौकरी कर रहे विशाल शरण ने मूनिंग्स पर एक रिसर्च ही भेज दिया. थेसिस में कई शानदार जानकारियां हैं जिन्हें पढ़ते हुए आप आज के पटना को देख समझ सकते हैं.

इस थीसिस से पता चला कि पटना पर विवेक कुमार सिंह ने एक किताब लिखी है. A Monumental History of Patna, जिसका इस रिसर्च पेपर में कई बार इस्तमाल हुआ है.

सन 2000 में पटना को 1900 से 2000 के दौरान के विश्व आर्किटेक्ट में शामिल किया गया. A Critical Mosaic by Kenneth Frampton

मूनिंग्स को आगे चल कर इस बात का भी अफसोस था कि नदी के मैदान में पटना को नहीं बसाना चाहिए था . मूनिंग्स ने सोन नदी के छोड़े हुए मैदान पर नया पटना बसाया. गर्वमेंट हाउस, अंग्रेज़ी के E आकार का सचिवालय, डाक घर सहित कई इमारतों का नक्शा और निर्माण मूनिग्स ने करवाया. उस वक्त लटियन और बेकर की दिल्ली को लेकर खूब धूम थी मगर मूनिंग्स अकेले अपना काम कर रहे थे. 1931 तक लटियन दिल्ली नहीं बन पाई थी मगर मूनिंग्स ने 1912-16 के बीच पटना बसाने का काम पूरा कर लिया था.

एक अप्रैल 1912 को विभाजन के बाद सर चार्ल्स स्टुअर्ट बेली बिहार उड़ीसा के पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर बने थे. उन्होंने ही ढाका में काम कर रहे मूनिंग्स को एक नया पटना बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी. तब राजधानी अस्थायी रूप से रांची में थी. मूनिंग्स रांची के डोरांडा में रहते थे. पटना आकर काम करते थे मगर इतना प्यार हो गया कि वहीं बस गए.

करीब करीब सारी इमारतों का नक्शा मूनिंग्स ने अकेले बनाया मगर हाईकोर्ट का नक्शा Frank Lishman ने बनाया. इन्होंने ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का नक्शा बनाया था. दोनों में काफी समानता है और दोनों पर न्यूज़ीलैंड के सरकारी वास्तुकला का असर है. आप मूनिंग्स पर प्रकाशित रिसर्च पेपर में और ज़्यादा पढ़ सकते हैं.

पटना रेलवे स्टेशन के पास का बाज़ार मूनिंग्स का बसाया हुआ है. 1925 में मूनिंग्स ने कहा था कि पटना को लेकर उन्होंने जो जलनिकासी का प्लान बनाया था उस पर पूरी तरह से अमल नहीं हुआ है.

2013 में University of Canterbury के Heulwan Mary Robert ने मूनिंग्स पर पूरी थीसीस प्रकाशित किया है. इसमें मूनिंग्स की पढ़ाई, उनकी यात्रा, उनके काम, काम पर प्रभाव, पटना के इमारतों की मौलिकता, उन पर अंतर्राष्ट्रीय छाप, मुगल वास्तुकला की निरंतरता इन सबका विस्तार से वर्णन है. विश्वमोहन झा अगर नहीं बताते तो इतना सब कुछ जानने का रास्ता नहीं खुलता. विशाल शरण का भी शुक्रिया. उन्होंने तो पूरा मैदान ही उपलब्ध करा दिया. आप ir.cantebury.ac.nz पर मूनिंग्स के पटना के बारे में विस्तार से पढ़ सकते हैं.

आप सभी का शुक्रिया. पटनावासियों के बीच इस पोस्ट को पहुंचा दीजिए.

(रवीश कुमार के फेसबुक पेज से साभार)

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