आनंद मोहन की शरण में राजद का सामाजिक न्याय, क्या यह दांव चलेगा?

कहते हैं राजनीति एक शतरंज की बिसात होती है और कई दफा लंबे समय से एक जगह रखा हुआ प्यादा जो अमूमन किसी काम का नजर नहीं आता, मौका पड़ने पर बाजी पलट सकता है. और आनंद मोहन तो कोई प्यादा नहीं है. वजीर नहीं तो उसकी हैसियत हाथी या घोड़े से कम नहीं. खबर है कि राजद के चाणक्य उनसे मिलने जेल पहुंच गये हैं. बिहार में विपक्षी राजनीति की धुरी तैयार की जा रही है. जिसमें केंद्र में लालू को रख कर एक तरफ मांझी और कुशवाहा को जोड़ने की कोशिश है तो दूसरी तरफ आनंद मोहन के जरिये सवर्णों की एक बड़ी जाति को लुभाने की. मगर क्या बरसों से जेल में रहने के बाद भी आनंद मोहन में वह धार बची है कि वह राजद के लिए उपयोगी साबित हो सकें. निराला जी ने इस मसले पर तफ्तीश से लिखा है. हां, इस बीच राजद के धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांत का क्या होगा, यह कहना मुश्किल है.

निराला

राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी अपने समय के चर्चित रहे आनंद मोहन से जेल में मिले हैं. बात चल रही है कि नये तरीके के समीकरण बनेंगे बिहार में. इसे एक भूचाल की तरह भी बताया जा रहा है. बिहार का ठीक से मरम जाननेवाले ऐसे भरम में नहीं ही रहेंगे कि अब आनंद मोहन में इतनी क्षमता या ताकत बची रही गयी है कि वे आकर कुछ कर सकें. आनंद मोहन लंबे समय से जेल में हैं. वह तो एक बात है, बिहार पीपुल्स पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने के बाद से ही आनंद मोहन बिहार की राजनीति में अपनी ही जाति में अविश्वसनीय नेता बन चुके थे. बाद में यह हल्ला उ़ड़ गया था कि आनंद मोहन लालू प्रसाद से सेटिंग कर के चुनाव लड़े थे.

राजनीति में जो हल्ला उउ़ता है और लोगों तक पहुंच जाता है, उससे बने धुंध का छांटना इतना आसान नहीं होता. ऐसा कई मामलों में देख सकते हैं कि कई भ्रांतियां ऐसी बना दी गयी हैं, जिसका सच से वास्ता नहीं रहा लेकिन वह जड़ता के साथ लोकमानस में स्थापित है तो है. आनंद मोहन क्लोज्ड चैप्टर के नेता हैं अब. राजपूतों का वोट राजद के पक्ष में पोलराइज होना होगा तो जगतानंद सिंह, रघुवंश सिंह राजद के चेहरा हैं. उनका मान सम्मान मिलता है पार्टी में. लंबे समय से हैं.

एक समय में प्रभुनाथ सिंह, उमाशंकर सिंह भी साथ ही थे. राजपूत के कई धाकड़ नेता लालू प्रसाद के साथ सदा रहे हैं. उसका असर भी पड़ते रहा है लेकिन आनंद मोहन जैसे नेता के पास असर करवाने की क्षमता पहले भी नहीं थी, अब भी नहीं है. हां, अगर राजद को नये सियासी समीकरण से फायदा होना होगा तो वह जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा से जरूर मिलेगा.

अगर वाम पार्टिंयां भी लालू प्रसाद के साथ आ जाती हैं और कांग्रेस साथ ही बने रहती है अगले चुनाव तक, तब यह और मल्टीविटामीन की तरह फायदाकारी होगा राजद के लिए. वैसे राजपूतों की राजनीति जाननेवाले जानते हैं कि उन्हें लालू प्रसाद से हमदर्दी है या लगाव है इसलिए वे राजद के साथ नहीं रहते बल्कि नीतीश कुमार और भाजपा द्वारा भूमिहारों को ज्यादा महत्व देने के कारण वे कई जगहों पर, कई रूपों में लालू प्रसाद के साथ दिखते हैं.
बिहार की राजनीति का रग—रग समझनेवाले लालू प्रसाद यादव इसे शुरू से ही अच्छे से जानते रहे हैं इसलिए वे चुनाव में डंके की चोट पर, एलानिया भूमिहारों का टिकट काटने लगे. वैसे सच यह भी है कि अनुग्रह नारायण सिंह ही पूरे बिहार के राजपूतों पर प्रभाव रखनेवाले पहले और आखिरी नेता थे. उनके ही बेटा सत्येंद्र नारायण सिंह, जो छोटे सरकार कहलाते थे, उनका ही असर नहीं हुआ. राजपूतों में सबसे बड़ा सियासी परिवार बिहार में इन्हीं का है.

अनुग्रह बाबू, सत्येंद्र सिन्हा, निखिल कुमार, किशोरी सिन्हा, श्यामा सिन्हा, फिर इनके ही रिश्तेदार हुए पप्पू सिंह, एनके सिंह आदि—आदि. सब प्रभावशाली लेकिन राजपूतों के बीच सर्वमान्य पहले और आखिरी चेहरा अनुग्रह बाबू ही हुए.उनके बाद कोई दूसरा ऐसा नेता बिहार में नहीं हआ जो इस जाति का पूरे बिहार में सर्वमान्य नेता हो. सब अपने अपने पॉकेट में असर रखते हैं. यह विडंबना सिर्फ राजपूतों के साथ नहीं, कई जातियों के साथ है. एक जाति—एक पार्टी— एक नेता की स्थिति बिहार में कमोबेश सिर्फ तीन नेताओं के पास ही है. लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान.

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