इसे पढ़कर कहीं आप प्यार न करने लगें ओल्डएज होम से

पिछले दिनों टीएन शेषण के ओल्डएज होम में पाये जाने पर एक बहस शुरू हुई थी. ज्यादातर लोगों ने इस खबर पर शेषण के लिए अफसोस जताया था. मगर कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने दमदार तरीके से अपनी बात रखी थी कि आज के जमाने में ओल्डएज होम बुजुर्गों के लिए जरूरत बन गयी है और कई दफा वे घरों से बेहतर आनंद ओल्डएज होम में पाते हैं. इसी मसले पर अमेरिका के कैलिफोर्निया शहर में रहने वाली चिकित्सक डॉ. अर्चना पांडे ने बिहार कवरेज के लिए यह आलेख लिखकर भेजा है. आप भी पढ़ें….

अर्चना पांडे

ओल्ड केयर होम! डर गये होगें, आप सब इस नाम को सुनते ही! एक तो ‘बुढ़ापा’ शब्द ही कौन सी ख़ुशी प्रदान करता है, ऊपर से ओल्ड केयर होम, एक डरावना सा नाम हमारे पारंपरिक भारतीय समाज के लिए. लेकिन शायद जब आपको इसकी अन्दरूनी  जानकारी होगी तो शायद आप प्यार न कर बैठें कहीं इससे! आज मैं विदेशी ज़मीन पर अपने बीस साल बिताए गए अनुभवों को आपके साथ शेयर करने की हिम्मत जुटाई हूं. तो सुनिए ग़ौर से हमारी बातें!

पहले तो समझने की एक कोशिश करिए कि ये कोई ‘जेल’ नहीं है, ये ‘होम’ ही है आपका. आप यहाँ भले ही अपने परिवार के साथ चौबीसों घंटे नहीं रह पाएँ, लेकिन एक बात की पुरी गारण्टी है कि आप कभी भी उपेक्षित नहीं महसूस कीजिएगा, अगर वो वैज्ञानिक ढाँचे पर स्थापित हो. आधुनिकता की दौर में आपका अपने घर में ही कौन सा स्वागत है! मैं तो भारत के कई शहरों में हर दूसरे साल जाती रहती हूं. वहाँ के सामाजिक व्यवस्था में काफ़ी बदलाव हमें देखने को मिला है. बूढों की स्थिति बदहाल दिखी. पूछ सकते हैं क्यों?  हम आपसे पूछते है एक सवाल पहले, फिर जबाब मिलेगा आपको आपके सवाल का भी.

पहले घर के बड़े बुज़ुर्गों का घर में कौन ख़याल रखता था? महिलाएँ और बच्चें! क्या आज महिलाएँ ख़ाली बैठी हैं, बूढों के देखरेख के लिए? नहीं! औरतों के रोज़गार से बूढों की ज़िन्दगी पर बहुत बुरा असर पड़ा है. इस बात को मानिए या नहीं मानिए, ये आप पर निर्भर करता है.

दूसरी जो मुख्य बात बची,  उस पर अब हम आपको ले चलते है. वो हैं बच्चे! बच्चें भी तो कम हो रहे हैं एक परिवार में. पहले हमारे समय में औसतन एक खाते-पीते परिवार में छह या आठ बच्चे होते हीं थे, इसलिए घर में एक दो बच्चे अपने माता पिता या दादा-दादी के लिए हमेशा ही उपलब्ध रहते थे. अब तो कुल मिलाकर दो बच्चे ही देखने को मिल रहें हैं ज़्यादातर मध्य वर्गीय परिवारों में.  उनपर भी माँ बाप का इतना दबाब रहता है, कुछ बड़े होकर बनने का कि वो क्या सोच पाएँगे अपने घर के बूढ़ों के बुढ़ापे को पार लगाने के बारे में!

और भी कई कारण हैं. जैसे संयुक्त परिवार का टूटना, ग्रामीण क्षेत्रों से रोज़ी-रोटी के चक्कर में शहर को पलायन होना और शहरों की सामाजिक व्यवस्था का भी अति आधुनिक बदलाव के चपेट में पड़ना, इत्यादि. हमें नहीं लगता है कि किसी भी सामाजिक बदलाव को थोड़ा भी पीछे ढकेलना हमारे हाथों में है. इसलिए बजाय किसी शिकायत के, क्यों नहीं हम नयी सोच के साथ ही चलने की सोचते हैं?

मैं यहाँ अमेरिका के जिस शहर में रहती हूं, वहाँ पुराने घर ही ज़्यादा हैं. जब पुराने घर होगें तो ज़्यादातर लोग भी पुराने ही होगें. मैं अपने आँखों के सामने लोगों को बुढ़ापे का जीवन जीते ही नहीं देखें है केवल, मृत्यु को आलिंगन करते भी पाये हैं, बिना किसी ज़्यादा शोर-शराबा के. मैं अक्सर उनके परिवार वालों से बातचीत भी करती रहती हूं, जानने के लिए कि कैसे लोग यहॉं अपने बूढे माँ-बाप की देखभाल तरते हैं और वृद्धाश्रम या असिस्टेड लिविंग की जरुरत कब पडती है उनको.

बच्चे तो यहाँ साथ नहीं के बराबर ही रहते हैं, लेकिन कोई न कोई आकर देख जाता है नियमित रुप से, बेटा या बेटी. जब तक आपका शरीर ठीक-ठाक चलता है, जीवन की गाड़ी बढ़ती रहती है, लेकिन एक समय जब आपका शरीर बिलकुल ही थकने लगता है, उस समय ही आपको ऐसे होम की जरुरत पडती है, जहाँ कोई आप पर चौबीसों घंटे नज़र रख पाए,

आपकी दवाई और खाना समय पर दे और आपके कपड़े बदलवाए. यहीं नहीं, वहाँ आप अपने हमउम्र के साथ भी थोड़ा समय बिताते हैं, जिससे आपको कम से कम इतना तो अहसास होगा कि इस ‘बुढ़ापे’ नामक बीमारी से सिर्फ़ आप ही नहीं ग्रसित है, बहुत लोग हैं जो झेल रहे हैं इस ‘बीमारी’ को मुस्कुराते हुए. सारे लोग कुछ गेम खेलते हैं एक कॉमन जगह पर, चाय-काफ़ी पर बात-विवाद भी करते हैं. राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर. परिवार वालों को भी कोई बाधा नहीं पड़ती है आपके यहाँ रहने से और वो ख़ुशी-खुशी समय समय पर आपसे मिलने आते ही रहते हैं. इसी तरह धीर-धीरे आप एक दिन ईश्वर के घर में प्रवेश कर जाते हैं, शांतिपर्वक. अब इस जीवन को और क्या चाहिए!

मानते हैं कि इतनी सुव्यवस्था अपने देश के वृद्धाश्रमों में पाना मुश्किल है, लेकिन धीरे-धीरे जब लोग इसे दिल से स्वीकारने लगेंगे,  तो हालात उन ओल्ड केयर होम की सुधरेगी ही. एक बात का और ज़िक्र कर दे कि ये सुविधाएँ मुफ़्त में नहीं मिलती हैं.

यहाँ लोग अपने कच्चे उम्र से ही इन नाज़ुक विषयों को सोचना शुरू कर देते हैं और उसके लिए पैसा इकट्ठा करना भी शुरू कर देते हैं. काफ़ी रेन्ज होती हैं इन घरों की, सुविधाओं के अनुसार.

तो पढ़िए एक बार ठंडे दिमाग से आप भी और अपने विचारों से हमें अवगत कराइए!

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