दशकों बाद हो रहे छात्रसंघ चुनाव से क्या बदलेगी बिहार के कॉलेज कैंपसों की सूरत?

आदित्य मोहन झा

आदित्य मोहन झा

मौजूदा बिहार के राजनीति के सभी बड़े नेता छात्र राजनीति के उपज हैं. चाहे वो लालू प्रसाद यादव हों या नीतीश कुमार, सुशील मोदी हों या रामविलास पासवान. ये सभी कद्दावर नेता अपने छात्र जीवन मे जेपी आंदोलन से राजनीति में प्रवेश किए और फिर दशकों तक बिहार की राजनीति इन्हीं के आस-पास घूमती रही. शायद इसलिए इन्होंने सुनियोजित ढंग से छात्रसंघ चुनावों को विश्वविद्यालयों में बंद ही करवा दिया ताकि भविष्य में इन्हें ललकारने और इनसे टकराने के लिए कोई नई पौध ही न जड़ जमाए.

कायदे से देखें तो बिहार में 17 स्टेट यूनिवर्सिटी, नौ सेंट्रल यूनिवर्सिटी (सात वर्किंग, दो प्रोपोस्ड), दो डीम्ड और पांच प्रोपोस्ड प्राइवेट यूनिवर्सिटीज हैं जिनमें लगभग 15 लाख बच्चे अध्ययनरत हैं. पूरे भारत मे बिहार प्रति लाख की जनसंख्या पर सबसे कम कॉलेजों (छह) को ढोता है, जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 25 है. उच्च शिक्षा का हाल बिहार में यह है कि एक दो को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ नियमित सत्र या नियमित क्लास चलती हो.

चाहे एलएनएमयू दरभंगा हो या मगध यूनिवर्सिटी, बीआरएयू मुजफ्फरपुर, बीएनएमयू मधेपुरा, टीएमयू भागलपुर, जेपीयू छपरा, वीकेएसयू आरा या राज्य का अन्य कोई भी विश्वविद्यालय लगभग एक जैसे हालात हैं. यहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या लाखों में है, जबकि इन विश्वविद्यालयों में औसतन लगभग 60% से ज्यादा शैक्षणिक पद खाली है. किसी-किसी विश्वविद्यालय में सत्र 2-2 साल पीछे है, ग्रेजुएशन की डिग्री पांच सालों में मिलती है, कभी क्लासेज रेगुलर नहीं चलती. परीक्षाओं और रिजल्ट्स में जबरदस्त धांधली होती है. न कहीं कोई लायब्रेरी, न लेबोरेट्री, न हॉस्टल, न स्पोर्ट्स, न कल्चरल इवेंट्स, न प्लेसमेंट्स और न ही कोई भविष्य.

ऐसी ही कुव्यवस्था के कारण एलएनएमयू में छात्रों का एक आंदोलन हुआ एमएसयू के नेतृत्व में जिसके तुरंत बाद राज्यपाल महोदय ने सभी प्रमुख बेसिक मांगों और छात्रसंघ चुनावों को राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में पूरा करवाने का आदेश दिया था. अब जबकि छात्रसंघ चुनावों के दिन नजदीक आ गए हैं और विभिन्न छात्र संगठन राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में तैयारी में जुट गए हैं तो कुछ सवाल हैं जिनका जवाब चुनाव परिणाम होंगें.

लगभग सभी राजनीतिक दलों की छात्र इकाईयां है, अबतक छात्रसंघों के अभाव में वो सिर्फ दलों के प्रचार करते थे या अपने नेताओं के बैनर-पोस्टर ढोते थे. इसलिए एक सशक्त नेतृत्व और प्रमुख चेहरों का अभाव साफ झलकता है. अचानक आये इस चुनाव में संगठनों के पास प्रत्याशी नहीं हैं. क्योंकि न तो किसी का संगठन मजबूत है और न कैडर. राजनीतिक दलों के इन संगठनों ने कभी विश्वविद्यालयों के कुव्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज नहीं उठाया.
तो महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ये संगठन अपने राजनीतिक दलों की सरकारों और जनप्रतिनिधीयों से खुला सवाल कर पाएंगे. कहीं ये नेताओं के पिछलग्गू बनके तो नहीं रह जाएंगे? यदि छात्र संगठनों के चुनाव में भी धन-बल-और हिंसा-छल-छद्म का प्रवेश हुआ और नेताओं व दलों का इन्हें संरक्षण मिला तो क्या ये राजनीतिक माहौल को और कलुषित नहीं करेंगे?

और इस सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चुनाव छात्रसंघ का है और विश्वविद्यालय के भीतर के मुद्दे प्रमुखता में होने चाहिए. अभी के छात्र संगठनों को इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ना चाहिए. न कि नेताओं, राजनीतिक विचारधाराओं, सरकारों के काम, राष्ट्रवाद, धर्म, जाति आदि के बातों पर छात्रों की लामबन्दी की जाए, यदि ऐसा होगा तो छात्रसंघ चुनाव विश्वविद्यालयों की स्थिति में सुधार के स्थान पर उन्हें और बिगाड़ेगा.

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