रोजगार, सिंचाई और बेहतर इलाज, क्या सचमुच यही बिहार के वोटरों की चुनावी प्राथमिकताएं हैं?

एडीआर का सर्वे

चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता पर पैनी नजर रखने वाली संस्था एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म(एडीआर) ने आज एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के वोटरों के लिए तीन प्रमुख मुद्दे रोजगार, सिंचाई और बेहतर इलाज हैं. एडीआर की यह रिपोर्ट बिहार के सभी 40 लोकसभा सीटों के 20 हजार वोटरों के बीच कराये गये सर्वेक्षण पर आधारित है. इसके मुताबिक 49.95 फीसदी वोटरों ने रोजगार के बेहतर अवसर को अपनी पहली प्राथमिकता बताया, 41.43 फीसदी मतदाताओं ने खेती के लिए जल की उपलब्धता को जरूरी प्राथमिकता बताया और 39.09 मतदाताओं ने कहा कि उनके लिए बेहतर इलाज की सुविधा अधिक जरूरी है. मगर क्या सचमुच बिहार के चुनाव के दौरान सबसे बड़े मुद्दे के रूप में उभर कर आयेंगे? क्या बिहार के वोटर इन सवालों को ध्यान में रख कर ही इस बार मतदान करेंगे?

य़ह बड़ा अजीब सवाल है और पिछले एक महीने से बिहार के अलग-अलग इलाकों में घूमने के बाद मुझे समझ में आया कि भले ही ये मुद्दे मतदाताओं के जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करते हों, मगर वोट डालते वक्त वे इन मुद्दों का बिल्कुल ख्याल नहीं करते. किशनगंज-अररिया के बाढ़ग्रस्त इलाकों जहां लोग आज भी चचरी पुल से रास्ता तय करते हैं से लेकर कैमूर की पहाड़ियों तक जहां पानी आज भी सपना है, ज्यादातर लोग वोट डालने का फैसला जाति और धर्म और दूसरी प्राथमिकताओं के आधार पर ही करते हैं. हां, कुछ वोटर ऐसे भी मिले जो अंत तक इंतजार करते हैं कि कौन सी पार्टी अधिक पैसे देगी, वोट डालने के लिए.

भारतीय राजनीति की यह दुखद त्रासदी है कि तकरीबन सत्तर साल की चुनावी राजनीति के बाद भी लोग अपने उन मुद्दों के बारे में नेताओं से सवाल करने के अभ्यस्त नहीं हुए हैं, जो मुद्दे साल के 365 दिन उनके जीवन को प्रभावित करते हैं.

दिलचस्प है कि एडीआर ने इस बार इन बातों का भी अध्ययन किया है कि बिहार के मतदाताओं का मतदान के वक्त व्यवहार किन बातों पर आधारित होता है. इस सर्वे में लोगों ने बताया कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री प्रत्याशी उनके लिए वोट डालते वक्त सबसे महत्वपूर्ण 39-44 फीसदी कारक होता है. इसके बाद उम्मीदवार की पार्टी और फिर प्रत्याशी की अपनी छवि. यानी वोट किसे देना है, इस मामले में प्रत्याशी तीसरे नंबर पर आता है.

दिलचस्प है कि 10 फीसदी वोटरों ने यह भी स्वीकार किया कि वे पैसे, शराब या उपहार के आधार पर वोट डालते हैं. दिलचस्प जानकारी यह भी निकल कर आयी है कि 98 फीसदी वोटर यह मानते हैं कि विधानसभा या लोकसभा में अपराधी प्रवृत्ति के प्रतिनिधि नहीं होने चाहिए, इसके बावजूद ऐसे लोगों की संख्या सदन में कम नहीं होती. इसकी वजह 37 फीसदी लोग बताते हैं कि उन्हें प्रत्याशी के आपराधिक रिकार्ड की जानकारी नहीं होती, 35 फीसदी लोग यह भी कहते हैं कि ऐसे अपराधी छवि वाले लोग कई बार अच्छा काम करते हैं, इसलिए उन्हें वोट दे दिया जाता है. 35 फीसदी मतदाता ऐसे लोगों को इसलिए भी वोट दे देते हैं, क्योंकि वे उनकी जाति या धर्म के नेता होते हैं. ये निष्कर्ष अपने आप बिहार के मतदाताओं के चरित्र को स्पष्ट कर देते हैं.

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