मुंबई में भी एक बिहारी किसान जिंदा था नरेंद्र झा के भीतर

आज सवेरे नरेंद्र झा के नहीं रहने की खबर आयी. फिर तफ्तीश शुरू हुई तो पता चला कि शानदार व्यक्तित्व वाला यह फिल्म अभिनेता 55 साल का था और दो बार पहले भी दिल के दौरे झेल चुका था. तीसरा दौरा झेल नहीं पाया. कल ही नरेंद्र झा ने एक रिवरवॉक की तसवीर पोस्ट की थी. मुंबई में वार्सोवा में उनका एक फार्म हाउस भी है, संभवतः कल वहीं थे, वहीं उनकी मौत हुई. पिछले दिनों वे जब पटना आये थे तो प्रभात खबर के दफ्तर भी आये थे, वहीं हमारे साथी गौरव ने उनसे लंबी बातचीत की थी. कई मसलों पर… तभी उन्होंने कहा था, मैं आज भी खुद को एक किसान के रूप में देखता हूं. पढिये यह बातचीत…

गौरव

प्रतिभा के मामले में बिहारी जमीन हमेशा से उर्वरक रही है. मधूबनी के कोयलख मे जन्में नरेंद्र झा उसी जमीन की कामयाब प्रतिभा हैं. अभिनय के जरिये हिंदी सिनेमा के रजत पटल पर चमकते नरेंद्र का संगीत से भी खास लगाव रहा है. कई सारे वाद्य यंत्र पर हाथ आजमा चुके नरेंद्र ने गौरव से खास बातचीत में और भी कई बातें साझा की.

6 फीट 3 इंच, कद जितना ऊंचा, शख्सियत उससे कहीं ज्यादा ऊंची. हैदर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और घायल वंस अगेन जैसी फिल्मों के जरिये फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचने वाले नरेंद्र झा का सिने सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा. व्यक्तित्व ऐसा कि मिलने वालों को चंद पलों में अपने मोहपाश में बांध ले. पहली मुलाकात में ही गर्मजोशी से शुरू हुआ बातों का सिलसिला कला, संस्कृति, अभिनय व संभावनाओं के गलियारे होता हुआ ऐसे सफर पर निकला कि कब घंटों बीत गए पता ही नहीं चला.

  • सबसे पहले तो अपनी बूलंद आवाज का राज बताएं.
  • (हंसते हुए), राज तो कोई नहीं है बस ऊपरवाले का आशीर्वाद है जिसने ऐसी आवाज बख्शी और मेरी खुशकिस्मती है कि आप सब इस आवाज के कायल हैं. (घायल वंस अगेन की बात चलने पर एक डायलॉग भी सुनाते हैं, ‘राज बंसल हूं मैं, समझता क्या है वो अपने आप को’)
  • कोयलख (मधुबनी) से सफर की शुरुआत करते हैं.
    जी, कोयलख मेरा जन्म स्थान है. इत्तेफाक से ये एक ऐसा गांव है जिसकी सांस्कृतिक विरासत और लिट्रेसी रेट शत-प्रतिशत रही है. आपको जानकर आश्चर्य होगा वहां हर परिवार से एक प्रोफेसर, डॉक्टर और इंजीनियर है और हर तीसरे या चौथे परिवार से एक आइएएस या आइपीएस है. पिताजी गांव के ही हाईस्कूल के हेडमास्टर थे (दुर्भाग्य से इसी वर्ष 92 की अवस्था में उनका देहांत हो गया). खैर पिताजी के सिद्धांत और आर्थिक कारण से मेरी शुरुआती पढ़ाई भी उन्हीं के स्कूल में हुई. हाईस्कूल के बाद बीएन कॉलेज पटना आ गया. संगीत में रुचि की वजह से फाइनआर्ट्स से एडमिशन हुआ. फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक साल रहा. उसके बाद जब घर में अभिनय के क्षेत्र में जाने की बात की तो पिताजी ने सबसे पहले सपोर्ट किया. वहां से मॉडलिंग का सफर शुरू हुआ, जो टेलीविजन के रास्ते सिनेमा की ओर ले गया.
  • सांस्कृतिक बैकग्राउंड का आप पर कितना असर रहा.
  • यही तो है जिसने मुङो सबसे ज्यादा प्रभावित किया. मैं ही क्यों, मेरा तो मानना है कि हर इंसान अपने सांस्कृतिक परिवेशों का ही प्रतिफल होता है. हमारे अंदर जो भी विचार आते हैं, उन सब विचारों का दायरा भी वही परिवेश तय करते हैं. जितना धनी सांस्कृतिक परिवेश होगा उतने मजबूत आपके विचार होंगे.
  • आपने संगीत में रुचि की बात की तो जरा उस शौक की बातों को विस्तार दें.
  • गाने के प्रति शुरू से ही लगाव रहा. गाने की वजह से ही मुझे कॉलेज में एडमिशन मिला. हैदर में भी आप मेरी आवाज में कुछ लाइनें सून सकते हैं. साथ ही माउथऑर्गन, गिटार, पियानो और बांसुरी के साथ भी मस्ती कर लेता हूं. रेगूलर ध्यान नहीं दिया पर जब भी मौका मिलता है हाथ आजमा लेता हूं.
  • कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग भी ली.
  • ट्रेनिंग तो नहीं ली. माऊथऑर्गन, पियानो और बांसूरी खुद से सीखा. हां, गिटार के लिए कुछ दिनों तक एक ट्रेनर रखा था. मेरा एक छोटा सा फार्महाऊस है मुंबई में. जब भी खुद के साथ वक्त बिताना होता है, वहां जाकर गिटार वगैरह बजा लेता हूं. प्रोफेशनली नहीं बल्कि ये सब मै खुद को खुश रहने के लिए करता हूं.
  • सिनेमा के शुरुआती सफर की कुछ बात बताएं.
  • काम की कमी कभी नहीं रही. मॉडलिंग के बाद ऊपरवाले की कृपा से काम मिलते चले गये. इसका असर ये हुआ कि मुझे खुद पर जितनी मेहनत करनी चाहिए वक्त की कमी से उतना कर नहीं पाया. श्याम बाबू (श्याम बेनेगल) के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस की. साऊथ की कुछ फिल्में की. नेशनल के साथ कई इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स (इंडोनेशिया, बेल्जियम, आस्ट्रेलिया, मॉरीशस और श्रीलंका की कंपनी के साथ) भी किया. इतने सारे प्रोजेक्ट्स करने के बाद अनुभव के साथ-साथ मुझमें एक कॉन्फिडेंस भी आ गया. फिर हैदर मिली. विशाल भारद्वाज की. हैदर ने मुझे संजीदगी से फिल्मकारों की नजरों में ला दिया. उसके बाद से लगातार फिल्में कर रहा हूं. नये साल की शुरुआत में भी आप मुझे काबिल और रईस में देखेंगे.
  • आपने काफी साहित्य का अध्ययन किया है. सिनेमा से साहित्य के दूराव की क्या वजह मानते हैं?
  • ये तो पूरी तरह कॉमर्स आधारित है. सिनेमा को आर्ट न समझकर बाजार की तरह इस्तेमाल करने वाले फिल्मकारों के लिए साहित्य कभी अट्रैक्टिव नहीं रही है. जो इक्के-दुक्के फिल्मकार अभी भी साहित्य से जुड़ें हैं वो केवल और केवल खुद की क्रेडिबिलीटी के दम पर ये चुनौती स्वीकार कर रहे हैं. नये फिल्मकारों को ये काफी रिस्की लगता है क्योंकि बाजार उनकी इस कोशिश में शामिल होने से हमेशा कतराता है. और बाजार के दबाव में वो एक्सपेरिमेंटल सिनेमा की ओर रुख करने का जोखिम नहीं लेना चाहते.
  • स्टार और कलाकार के बीच दर्शकों के बड़े गैप की क्या वजह मानते हैं?
  • मेरे ख्याल से फिल्मों का प्रमोशन इसकी सबसे बड़ी वजह है. कलाकार की फिल्में क्रिटिकली अप्रीशियेट तो हो जाती हैं, अवार्ड भी ले आते हैं पर प्रमोशन के अभाव में दर्शकों के दायरे तक नहीं पहुंच पाती. आप देखिये स्टार ओरियेंटेड फिल्मों के प्रमोशन पर जितना खर्च होता है कलाकार की एक पूरी फिल्म उस बजट में बन जाती है. दूसरी बात जहां तक मेरी समझ जाती है कि हम इंडियन ऑडियंस जो हैं शुरू से स्टार की ओर अट्रैक्ट रहे हैं. स्टार्स का अट्रैक्शन हमारे अंदर ऐसा है कि हम उनसे बाहर की फिल्मों को जल्दी अपना ही नहीं पाते. और ऐसी स्थिति जब तक रहेगी ये गैप बना रहेगा.
  • अभिनय से इतर नरेंद्र अपने आप को किस रूप में देखते हैं?
  • सच बताऊं तो अभिनय से इतर मैं खुद की कल्पना भी नहीं कर पाता. पर वाकई अगर ऐसा होता तो आज मैं खुद को एक किसान के रूप में देखता. क्योंकि मुझे इतना पता है कि नौकरी मैं कभी कर ही नहीं सकता था. ऊपरवाले के करम से गांव में खेती-किसानी की अच्छी जमीन है. अपना फार्म हाऊस है. इस वजह से फार्मिंग हमेशा मुङो अट्रेक्ट करती है.
  • नरेंद्र झा के अंदर बिहार किस स्वरूप में है?
  • सच पूछिए तो जहां माता-पिता ने जन्म दिया, जहां मेरा आधार है आपको क्या लगता है मुंबई या बाहर की दुनिया मुझे उससे अलग कर सकती है. मेरे अंदर आज भी पूरा बिहार है. मेरे अंदर मंडन मिश्र, विद्यापति ठाकुर, महात्मा बुद्ध, महावीर का बिहार है. आप उम्मीद नहीं कर सकते बाहर रहते हुए भी मैं बिहार के साथ जिस ईमानदारी और संबंधों की गहराई के साथ जी रहा हूं वो कभी पीछे छूट ही नहीं सकता. ये एलिमेंट्स मुझमें जिंदा है इसीलिए मैं हूं यहां पर.
  • अपने समय के बिहार और अब के बिहार में कितना अंतर पाते हैं.
  • अंतर कुछ नहीं हुआ है, अंतर अगर कहीं है तो मेरे खुद के परसेप्शन में. तब मैं जिस नजरिये से बिहार या यहां की चीजों को देखता था उस लिहाज से बस यही बदलाव हुआ कि आज सड़कों पर गाड़ियां थोड़ी ज्यादा हो गयी हैं और स्पेस संकुचित हो गये हैं. हां परिवर्तन को अगर तरक्की के नजरिये से देखना चाहें तो आज हर हाथ में लैपटॉप, मोबाइल और हरेका का वेल इन्फॉर्म्ड होना भी एक बदलाव है.
  • हाल में आपने बिहार में पहला फिल्म फेस्टिवल अटेंड किया. बिहार में फिल्म कल्चर के इम्प्रोवाइजेशन के लिए और क्या किया जा सकता है?
  • मेरा मानना है कि सबसे पहले तो बिहार के हरेक यूनिवर्सिटी में अभिनय या फिल्म से जुड़े बेसिक कोर्स शुरू किये जाएं. आपको भी पता है कि आज हर दूसरा व्यक्ति अभिनेता बनना चाहता है. तो इसी मेंटिलिटी को अगर आधार मानें तो क्यूं नहीं इसे कोर्स का रूप दे दें. और जहां तक फिल्म कल्चर की बात है तो इसके लिए हमें सबसे पहले यहां इंफ्रास्ट्रर तैयार करना होगा. इसके लिए यहां के पैशनेट लोगों को, सरकारी तंत्र और कुछ कॉरपोरेट्स को मिलकर एक सेटअप बनाना होगा. और मैं बता रहा हूं एक बार ये सब हो फिर यहां इतने लोग शूटिंग के लिए आएंगे कि यहां के लोगों के लिए संभावनाओं और रोजगार के द्वार खुल जाएंगे.
  • सिनेमा की फील्ड में संभावना तलाशते यूथ्स के लिए खास टिप्स.
  • मैं तो इतना ही कहूंगा कि स्वागत है. आपकी च्वाइस है जरूर आयें लेकिन केवल आने के लिए मत आयें. ये फील्ड ऐसा है जहां काम कम है लोग ज्यादा. तो खुद को पहले पॉलिश करें. क्योंकि हो सकता है एक्सीलेंसी ना होने के बावजूद आपको काम मिल जाए पर थोड़े वक्त बाद आपकी मेहनत और खुद की पॉलिशनेस(भाषा, एटीच्यूड, क्राफ्ट, आवाज की पॉलिश) ही आपके काम आयेगी. वरना दौड़ से बाहर होते देर नहीं लगेगी. हां काम मिलने तक के इंतजार के पलों में खुद को स्ट्रांग रखें, सफलता जरूर मिलेगी.

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