एक ‘हींग की थैली’ की वजह से मिली थी लालू को पहली सजा

बिहार कवरेज

नलिन वर्मा एक पूर्व पत्रकार हैं और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, जलंधर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.

आज चारा घोटाला की एक दूसरे मामले में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को सजा का ऐलान होना है, मगर क्या आप जानते हैं कि लालू को पहली सजा हींग की वजह से मिली थी. वही हींग जो दाल और आलू-गोभी जैसी सब्जियों में खास तौर पर इस्तेमाल होता है. उसी हींग की वजह से किशोर लालू को उनके अपने गांव फुलवरिया से बेदखल करने का फैसला सुना दिया गया था. और यह फैसला कोई और नहीं उनकी मां मरछिया देवी ने सुनाया था. यह 1950 के दशक की बात है.

यह खुलासा पूर्व पत्रकार नलिन वर्मा ने बिहार टाइम्स में लिखे एक लेख में किया है. उन्होंने इस पूरे प्रसंग को बड़े रोचक अंदाज में लिखा है. वे लिखते हैं कि एक रोज उनके गांव में एक हींग बेचने वाला आया था. लालूजी उस वक्त किशोर थे, उन्होंने उस हींग बेचने वाले के थैले को अपने घर के सामने वाले कुआं में डाल दिया. यह पता चलने पर हींग बेचने वाले ने शोर मचाना शुरू कर दिया और जल्द ही लालूजी के दरवाजे पर गांव के लोगों की भीड़ जमा हो गयी. और लोगों ने उनकी मां मरछिया देवा से कहना शुरू कर दिया कि अपने बेटे को संभाल कर रखें, उसे दंडित करें.

लालू जी की मां मरछिया देवी ने नलिन वर्मा को 1990 में फुलवरिया गांव में मुलाकात के दौरान यह सब बताया था. उस वक्त नलिन हिंदुस्तान टाइम्स में थे और लालू की पृष्ठभूमि का पता लगाने उनके पैतृक गांव गये हुए थे. उस वक्त मरछिया देवी ने नलिन से कहा था, हम लालू की शैतानी की वजह से रोज-रोज आने वाली शिकायतों से तंग आ चुके थे. अक्सर उसको डांटते-फटकारते थे. लालू में बचपना बहुत रहे(लालू में बचपना बहुत था). हमलोग गरीब थे. हमको डर लगता था कि गांव का दबंग लोग जरूर किसी दिन इसके साथ जोर-जबरदस्ती करेगा, इसको नुकसान पहुंचायेगा. इसलिए हम अगले ही रोज इसको इसके बड़े भाई के पास पटना भेज दिये.

लालूजी की जवानी की तसवीर

लालू जी की मां ने उस वक्त नलिन से कहा था कि जब लालू को पता चला कि उसको पटना भेजा जा रहा है वह फूट-फूट कर रोने लगा, कहने लगा- हमको पटना मत भेजा, अब बदमाशी ना करब( मुझे पटना मत भेजो, अब बदमाशी नहीं करूंगा.) मगर लालू को आखिर गांव बदर कर ही दिया गया.

बाद में मरछिया देवी ने उस कुएं पर कपड़े से ढक दिया और बांस से दबा दिया, जिसमें लालू ने हींग का थैला गिराया था.

नलिन आजकल लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, जलंधर में फेकल्टी मेंबर के रूप में कार्यरत हैं. वे आगे लिखते हैं कि एलपीयू ज्वाइन करने से पहले एक रोज उन्होंने यह किस्सा लालू को सुनाया था. सुनकर लालू काफी हंसे थे. उनके साथ शिवानंद तिवारी और मनोज झा भी थे. लालू ने उस वक्त बताया कि उन दिनों वे गांव के पीपल पेड़ के नीचे सो जाया करते थे और उनकी मां उन्हें ढूंढती रहती थी.

नलिन आगे लिखते हैं, 60-70 के दशक में बिहार में हींग बेचने का अलग ही तरीका था. इसके विक्रेता यह कहते हुए घूमते कि ‘ले हींग बैशाख करारे’ मतलब हींग अभी ले लो और पैसे बैशाख महीने में देना. हींग बेचने वाले ठंड के मौसम में घूम-घूम कर हींग बेचते और मई के महीने में आकर पैसे वसूलते. कई बार अनाज भी, क्योंकि उस वक्त बिहार में बार्टर सिस्टम था.

फुलवरिया में मरछिया देवी की प्रतिमा

यह कहना मुश्किल है कि लालू कब गांव से बहिया दिये गये, कुएं में हींग का थैला गिराने के अपराध में. क्योंकि मरछिया देवी अनपढ़ महिला थी और उन्हें दिन-महीने-साल का हिसाब ठीक से नहीं मालूम रहता था. मेरा अनुमान है कि यह पचास के दशक की बात रही होगी, जब वे अपने भाई के पास रहने पटना चले आये थे.

पटना आकर लालू क्या बन गये यह पूरे देश को और पूरी दुनिया को पता है. पिछले पांच दशकों में सबकुछ बदल गया है. लालू की मां काफी पहले गुजर गयीं. हींग बेचने वाले अब केवल लोककथाओं में रह गये हैं. जिस कुएं में लालू ने हींग का थैला गिराया था, वहां हैंडपंप लग गया है, लालू की झोपड़ी की जगह पर मरछिया देवी की विशाल प्रतिमा खड़ी हो गयी है. जब लालू रेलमंत्री बने तो उन्होंने अपने गांव फुलवरिया में एक रेलवे स्टेशन बनवा दिया. गांव चारो तरफ से सड़क से जुड़ गयी, वहां बिजली, अस्पताल और बैंक खुल गये.

मैं सोचता हूं कि इतनी सुविधाओं से युक्त फुलवरिया क्या कभी किसी लालू को जन्म दे पायेगा, जिसे उस पुराने फुलवरिया ने जन्म दिया था.

 

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