32 तरह की ड्यूटी के बावजूद सरकार की नजर में नाकारा हैं हम नियोजित शिक्षक

आलोक आनंद

(लेखक एक नियोजित शिक्षक हैं और सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं.)

मंत्री महोदय का शुक्रिया कि उन्होंने खुले में शौच करने वालों को देखकर सीटी बजाने और उनके साथ सेल्फी लेने वाली ड्यूटी से हमें निजात दिला दिया है, हालांकि साथ में उन्होंने यह बात जो़ड़ ही दिया कि हमें सुबह-शाम लोगों को स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूक करना है. मगर क्या इससे हमारे दुःखों का अंत हो गया? हम तो ऐसे शिक्षक हैं जो पठन-पाठन की अपनी मूल ड्यूटी के अलावा सरकार की 32 तरह की जिम्मेदारियों को संभालते हैं, मगर यह सरकार अपनी बस एक जिम्मेदारी को संभाल नहीं पा रही कि हमें वेतन के नाम पर जो भी देती है, वह वक्त से दे दे. ताकि हमारा घर-परिवार चले, दुकानदारों के उधार पर निर्भर न रहना पड़े.

मंत्री जी, पठन-पाठन के अलावा दर्जनों प्रकार के कार्यों में लगे रहने के बावजूद हम नियोजित शिक्षक सरकार और समाज की नजर में अयोग्य ही हैं. राज्य सरकार न तो हमें अपना कर्मचारी मानती हैं, न ही सहायक शिक्षक का दर्जा देती है. नियमित विद्यालय आने पर भी शिक्षकों को आज अपने लिए नियोजित शब्द सुनने की मजबूरी है. अब जरा एक बार हमारे कार्यों पर गौर करिये –

आदि जैसे कम से कम 10-12 और प्रपत्र हैं. जिन्हें भरने का काम शिक्षक ही भरते हैं. फिर भी शिक्षक सरकार कि नज़र में बेकार और नकार हैं जबकि शिक्षक आज अपने हालात पर रोने को खुद मजबूर हैं. हमारे लिए यह नौकरी उस गर्म खाने जैसे हो गई है, जिसे तेज भूख की वजह से लोग बिना कुछ सोचे-समझे मुंह में डाल लेते हैं और फिर अब वह उसे निगले तो कैसे, या फिर उगले तो कैसे समझ नहीं आता.

शिक्षक शब्द सुनते ही हमारे जेहन में एक छवि उभरती है, अपने-अपने गुरूजनों की. एक आदर्शवादी मार्गदर्शक की, एक भविष्य निर्माता की. लेकिन प्राचीन काल के गुरुजी, कालांतर में शिक्षक, शिक्षक से टीचर, टीचर से मास्टर साहब और अब मास्टरवा में बदलते जा रहे है. सिर्फ़ संबोधन ही नहीं हालात भी बिगड़ ही जा रहे हैं. क्या एक शिक्षक का यह हक नहीं बनता कि वह एक अच्छा जीवन जीये. अपने बच्चों की ठीक ढंग से परवरिश करे, उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाये. अपने बूढे माता-पिता के स्वास्थ्य का ख्याल रखे. उन्हें समय पर दवाई दे सके. सबसे बड़ी बात खुद का जीवन बचा सकें?

लेकिन अगर आप बिहार सरकार की निगाह से देखें तो लगेगा शिक्षकों को इन चीजों को पाने का कोई हक नहीं बनता है. या फिर शिक्षक वह जीवट प्राणी हैं जिनके मन में न तो कोई इच्छाएं हैं, न ही उनकी कोई जरूरतें. शिक्षकों ने संतोष नाम का वस्त्र धारण कर लिया है, जिसका त्याग शायद अंतिम श्वास के साथ ही हो.

आज कैरियर के लिहाज़ से शिक्षक ‘बैक गियर’ वाला माना जाता है. मतलब जो कुछ न बन पाया वह शिक्षक बन बन जाता है. यूं तो आज शिक्षकों के सामने कई तरह कि समस्याएं हैं. लेकिन सबके मूल में है वेतन की समस्या. शिक्षकों का वेतन पहले भी वर्ष में 3-4 महीनों पर ही कभी-कभार पर्व-त्योहारों पर आता था. लेकिन वर्तमान सरकार ने इस बार तो हद ही कर दी. पिछले 6 महीनों से शिक्षकों को उनका बकाया वेतन ही नहीं मिला. इस बीच मुहर्रम, दशहरा, दीवाली, छठ जैसे महत्वपूर्ण पर्व भी बीत गए. हमें मुहर्रम से ही आश्वासन मिलता रहा कि जल्द ही शिक्षकों के खाते में उनका पैसा चला जायेगा. सूबे के मुख्यमंत्री ने खुद शिक्षा दिवस पर सार्वजनिक मंच से कहा कि शिक्षक खुद कि चिंता न करें, उन्हें खुद उनकी चिंता है. लेकिन उनकी चिंता फलीभूत नहीं हो पायी.

हम न तो इन त्योहारों पर अपने बच्चों की चंद खुशियां ही खरीद पाये और न ही अपने बूढ़े माँ-बाप की दवाई. हमनें अपने हाथों से दोनों का दम घोंट दिया. अकेले बिहार में आज करीब 4 लाख से अधिक संख्या में नियोजित शिक्षक हैं. अगर एक शिक्षक के ऊपर उनके दो बूढ़े मां-बाप, एक पत्नी और सिर्फ़ 2 बच्चों कि जिम्मेदारी ही मानी जाये तो 20 लाख लोग हर महीने इस दंश को झेलने को विवश हैं. ये आंकड़े किसी आपदा में प्रभावित लोगों से कतई कम नहीं है और आप यकीन मानिए शिक्षक वर्षों से ये झेलते आ रहे हैं. आगे पता नहीं कब तक झेलेंगे. सरकार की नजर में शायद आज शिक्षक सिर्फ वोट-बैंक बनकर रह गया है.

2015 के जुलाई से सरकार अपनी तरह का जोड़-तोड़ वाला वेतनमान पेश कर नियोजित शिक्षकों को वेतन देने लगी. आमतौर पर कभी केन्द्रांश का न होना, तो कभी राज्यांश के पचड़े में आज शिक्षक वैसे ही पिस से रहे हैं, मानों दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय. शिक्षकों के सेवा शर्त को लेकर सरकार ने जीएस कंग की अध्यक्षता वाली एक कमेटी का गठन 2015 में किया था, जिसे तीन महीने के अंदर रिपोर्ट देनी थी. लेकिन आज तीन साल होने को हैं, कमिटी की रिपोर्ट का कोई अता-पता नहीं है.

दूसरी बात, जब सरकार हमारा बकाया वेतन जारी करती है, तो प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसे नियोजित शिक्षकों के लिए खुशखबरी, बड़ी खबर-सरकार ने इतना अरब/करोड़ नियोजित शिक्षकों के वेतन के लिए जारी किए, आदि शीर्षक से इन ख़बरों को ऐसे छापती है, मानों ये शिक्षकों का बकाया वेतन न होकर बोनस हो या कुछ और. ताकि समाज एवं आम लोगों कि नजर में यह छवि उभरे कि अरे! देखिये तो सरकार शिक्षकों के वेतन में कितना खर्च करती है और फिर भी शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं. यानी समाज कि नजर में हम खलनायक बने रहें.

क्या आपने कभी किसी दूसरे विभागों के कर्मियों के साथ ऐसा होते देखा-सुना है? शायद आपका जवाब ‘न’ होगा. जब भी नियमित वेतन भुगतान की बात सामने आती है, राज्य सरकार सर्वशिक्षा मद की राशि का केंद्रांश ससमय नहीं मिल पाने और केंद्र सरकार दी गयी राशियों की उपयोगिता समय नहीं मिलने का रोना रोती हैं. यानी एक आम शिक्षक केंद्र -राज्य के बीच पिसता रहता है.

शिक्षा समवर्ती सूची का विषय था. लेकिन जब से शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए इसे पंचायती राज के अंतर्गत लाया गया है और इसे कई स्तरीय नियोजन इकाइयों में बांटा गया है. तबसे यह और गर्त में चली जा रही है. आज एक ही विद्यालय में इतने प्रकार के शिक्षक हैं कि उन्हें खुद नहीं पता कि दूसरे शिक्षक किस कोटि के हैं.

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