24 संग्रहालय, सात क्यूरेटर, बंद रहते हैं बिना स्टाफ वाले छह म्यूजियम, सुरक्षा भगवान भरोसे

एक तरफ जगमग करता नया नवेला, नीतीश जी का दुलारा बिहार म्यूजियम तो दूसरी तरफ बिना कर्मचारियों के धूल-धक्कड़ खाते और विरासत की आभा लुटाते राज्य के दूसरे 25 म्यूजियम. यह कहानी उस राजा के राज्य की है, जो खुद को समावेशी विकास का पैरोकार बताता है. मगर हकीकत यह है कि राज्य के दूसरे म्यूजियम स्टाफ की भारी कमी झेल रहे हैं. छह म्यूजियम तो खुलते भी नहीं हैं, क्योंकि वहां कोई स्टाफ नहीं. सात क्यूरेटरों के जिम्मे है 24 म्यूजियम का प्रभार और इनकी देखरेख के लिए कुल 39 स्टाफ ही हैं. ऐसे में राज्य की धरोहरों का क्या हाल है, यह जगजाहिर है.

पुष्यमित्र

पिछले दिनों शिवकुमार मिश्र जी से मुलाकात हुई. वे दरभंगा के लक्ष्मेश्वर संग्रहालय के क्यूरेटर हैं. हालांकि यह उनका अधूरा परिचय है, इसके साथ-साथ वे भितिहरवा के गांधी स्मारक संग्रहालय के भी क्यूरेटर के प्रभार में हैं, बेतिया संग्रहालय के भी यही क्यूरेटर हैं और पटना म्यूजियम में शोध एवं प्रकाशन प्रभाग में भी सेवाएं देते हैं. मतलब ये एक साथ चार संग्रहालयों को अपनी सेवाएं देते हैं. हफ्ते में किस रोज कहां रहते हैं, यह पूछना मैंने उचित नहीं समझा, मगर उन्होंने एक जानकारी दी कि उन्होंने सरकार पर एक मुकदमा किया हुआ है कि उन्हें चार जगह सेवाएं देने के एवज में यात्रा भत्ता उपलब्ध कराया जाये.

यह कहानी सिर्फ शिवकुमार मिश्र की नहीं है. ऐसे कम से कम चार क्यूरेटर जरूर हैं जिनके जिम्मे चार-चार संग्रहालयों का प्रभार है. बांकी तीन के जिम्मे चीन-तीन संग्रहालय हैं. यानी सात क्यूरेटर मिलकर 24 संग्रहालयों को संभालते हैं. वे हफ्ते में तीन से चार जगह दौड़ते होंगे और उन्हें इसके लिए कोई भत्ता नहीं मिलता है.

मसला अगर सिर्फ इतना ही होता कि कई संग्रहालयों को पूर्णकालिक क्यूरेटर नहीं है, तब भी एक अलग बात होती. जूनियर स्टाफ ही संग्रहालय संभाल रहे होते. मगर दिक्कत यह है कि इन 24 संग्रहालयों में स्टाफ भी गिने-चुने ही हैं. सिर्फ 39 स्टाफ मिलकर 24 संग्रहालयों का संचालन करते हैं.
ऐसे में स्थिति यह है कि राज्य के छह संग्रहालय में आज की तारीख में कोई स्टाफ नहीं है. ये हैं, सूर्यनारायण सिंह म्यूजिम, ब्रजबिहारी सिंह म्यूजिम, चेचर संग्रहालय (यहां कुछ कांट्रैक्ट वाले स्टाफ हैं), मुंगेर संग्रहालय, लखीसराय संग्रहालय और कारू खिरहर संग्रहालय, सहरसा (यहां कुछ साल पहले एक दुलर्भ प्रतिमा की चोरी हो गयी थी.) लिहाजा इनमें से कई खुलते ही नहीं हैं.

पांच संग्रहालय में एक-एक ही स्टाफ हैं. सात संग्रहालय में दो-दो स्टाफ हैं, इनमें जहां क्यूरेटर हैं, वे भी शामिल हैं. पटना म्यूजियम में कुल 31 स्टाफ कार्यरत हैं और दरभंगा के चंद्रधारी म्यूजियम में नौ, क्यूरेटर समेत. शेष किसी म्यूजियम में पांच स्टाफ भी नहीं हैं. जबकि इन 25 संग्रहालयों को संभालने के लिए 258 पद सृजित हैं.

इन आंकड़ों को पढ़िये और विरासत के संरक्षण की बिहार की चेतना का अंदाजा लगाइये. खबर इतनी ही नहीं है. इन संग्रहालयों की सुरक्षा का जिम्मा जिस प्राइवेट एजेंसी को दिया गया है उन्हें भी कई महीने से पेमेंट नहीं मिला है. वेतन के अभाव में सिक्योरिटी गार्ड ड्यूटी नहीं के बराबर करते हैं.
और हां, इस रिपोर्ट के आधार पर आप मुझे राष्ट्रविरोधी मान सकते हैं, क्योंकि जैसे ही मूर्तियों के तस्कर को इस खबर की मालूमात होगी वे संग्रहालयों को निशाना बनाना शुरू कर देंगे…

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