क्या पटना सीखेगा रोहतास के इस गांव से साफ-सफाई का सबक?

आनंद कुमार रोहतास आबादी के लिहाज से इसलिए भी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यहाँ प्रति हज़ार पुरुषों की तुलना में महिलाओं की गिनती ज्यादा है। औसत हर 1000 पुरुषों पर यहाँ 1036 महिलाऐं हैं। सिर्फ आंकड़ों के लिहाज से देखें तो कुछ चीज़ें अजीब भी लगेंगी। जैसे महिलाओं की गिनती ज्यादा होने के वाबजूद बाल विवाह की दर 15-19 वर्ष की स्त्रियों में 38% के आस पास है और परिवार नियोजन के उपाय अपनाने वाले करीब 45% लोगों में पुरुष भागीदारी ना के बराबर है। 40% के लगभग स्त्री-बंध्याकरण पर…

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आखिर कब तक जमीन सवालों से मुंह चुरायेगी राजनीति

हरेश कुमार सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह की बातें तो ठीक है, लेकिन बिहार की चीनी मिलों, किसानों की बकाया राशि और वर्तमान स्थिति के बारे में भी कुछ कहना चाहेंगे? ओलावृष्टि से शिवहर जिला समेत बिहार के लाखों किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा है इसपर कोई एक शब्द नहीं बोल रहा. हवा-हवाई मुद्दों से आप ज्यादा तक राजनीति नहीं कर सकते. वास्तविक समस्याओं से कब तक मुंह चुराएंगे. शिवहर अकेला जिला है जो रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ा है. शिवहर के नागरिकों को कहीं भी जाना हो तो रेल सेवा…

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नीलहे गये-मिलहे आये #चंपारण-गांधी के बाद -3

  हालांकि यह क्षणिक मामला था. सिर्फ बदला लेने के लिये नील प्लांटर सालों तक खेती नहीं कर सकते थे. तमाम कोशिशों के बावजूद नील प्लांटरों के घाटे की भरपाई नहीं हो सकी. 1920 के बाद धीरे-धीरे नील प्लांटरों ने अपनी कोठियों को बेचकर यहां से जाना शुरू कर दिया. चंपारण के किसानों की असली परेशानी इसके बाद शुरू हुई. इसका जिक्र 1950 की लोहिया आयोग रिपोर्ट में मिलता है. लोहिया आयोग रिपोर्ट एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट है, जिसे प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की अध्यक्षता में 1950 में…

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तिनकठिया बंद हो गयी मगर कम नहीं हुआ अत्याचार #चंपारण-गांधी के बाद-2

चंपारण सत्याग्रह के बाद जब तिनकठिया प्रथा को खत्म करने का एक कानून बन गया और महात्मा गांधी को अहमदाबाद मिल मजदूरों के आंदोलन की वजह से यहां से जाना पड़ा तो शायद वे मन में एक संतुष्टि का भाव लेकर गये होंगे कि अब कम से कम नील किसानों को शोषण की उस संवेदनहीन प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ेगा. मगर जब आप गांधी के चंपारण से जाने के बाद के दिनों पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि यह खुशी बहुत अधिक दिनों तक बरकरार नहीं रही. इस बात के…

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ताऊ देवीलाल: भारतीय सियासत का अद्भुत चेहरा

जयन्त जिज्ञासु दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री (77-79 & 87-89) और दो बार भारत के उपप्रधानमंत्री (वीपी सिंह और चंद्रशेखर के कार्यकाल में, 89-91) रहे देश के बड़े किसान नेता ताऊ देवीलाल जी (25 सितंबर 1915 – 6 अप्रैल 2001) की आज 17वीं पुण्यतिथि है। आपकी तुनकमिजाजी के बावजूद बिहार आपका सदा ऋणी रहेगा कि आपने 90 के दशक में बिहार को एक ऐसा मुख्यमंत्री दिया जिन्होंने वंचितों को उच्च शिक्षा से जोड़ने के लिए पांच विश्वविद्यालय खोला। आप शरद जी को बहुत मानते थे और पहली बार केंद्र में…

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क्या चंपारण सत्याग्रह आधा-अधूरा किसान आंदोलन था? चंपारण-गांधी के बाद-1

बेतिया के किसान नेता राजकुमार शुक्ल की जिद पर नील किसानों की समस्या को समझने के लिए 10 अप्रैल, 1917 को गांधी पहली बार बिहार आये थे. उन्होंने शुक्लजी से कह रखा था कि वे महज तीन-चार रोज रुकेंगे और किसानों से बात कर उनकी समस्या को समझने की कोशिश करेंगे. मगर पहले तिरहुत के कमिश्नर मोरशेड की बेरुखी और फिर मोतिहारी कचहरी में पेशी के आदेश के बाद उन्हें समझ में आ गया कि वे समस्या को जितनी छोटी समझते हैं, उतनी छोटी है नहीं. उन्होंने तय कर लिया…

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आंबेडकर की काट भर नहीं थे जगजीवन राम

पुष्यमित्र इमरजेंसी का आखिरी दौर था. चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. दिल्ली के मशहूर रामलीला मैदान में बाबू जगजीवन राम की सभा होने वाली थी. जबरदस्त भीड़ होने की उम्मीद थी. इस सभा को असफल करने के लिए इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर राजकपूर की मशहूर फिल्म बॉबी दिखाये जाने की घोषणा कर दी, उसी वक्त यह फिल्म दिखायी जानी थी, जब जगजीवन राम की सभा थी. उनदिनों दिल्ली में टीवी का नया-नया क्रेज था और टीवी पर ऐसी फिल्म को कोई मिस नहीं करना चाहता था. यह सरकार…

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