आखिर कब तक जमीन सवालों से मुंह चुरायेगी राजनीति

हरेश कुमार सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह की बातें तो ठीक है, लेकिन बिहार की चीनी मिलों, किसानों की बकाया राशि और वर्तमान स्थिति के बारे में भी कुछ कहना चाहेंगे? ओलावृष्टि से शिवहर जिला समेत बिहार के लाखों किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा है इसपर कोई एक शब्द नहीं बोल रहा. हवा-हवाई मुद्दों से आप ज्यादा तक राजनीति नहीं कर सकते. वास्तविक समस्याओं से कब तक मुंह चुराएंगे. शिवहर अकेला जिला है जो रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ा है. शिवहर के नागरिकों को कहीं भी जाना हो तो रेल सेवा…

Read More

नीलहे गये-मिलहे आये #चंपारण-गांधी के बाद -3

  हालांकि यह क्षणिक मामला था. सिर्फ बदला लेने के लिये नील प्लांटर सालों तक खेती नहीं कर सकते थे. तमाम कोशिशों के बावजूद नील प्लांटरों के घाटे की भरपाई नहीं हो सकी. 1920 के बाद धीरे-धीरे नील प्लांटरों ने अपनी कोठियों को बेचकर यहां से जाना शुरू कर दिया. चंपारण के किसानों की असली परेशानी इसके बाद शुरू हुई. इसका जिक्र 1950 की लोहिया आयोग रिपोर्ट में मिलता है. लोहिया आयोग रिपोर्ट एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट है, जिसे प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की अध्यक्षता में 1950 में…

Read More

तिनकठिया बंद हो गयी मगर कम नहीं हुआ अत्याचार #चंपारण-गांधी के बाद-2

चंपारण सत्याग्रह के बाद जब तिनकठिया प्रथा को खत्म करने का एक कानून बन गया और महात्मा गांधी को अहमदाबाद मिल मजदूरों के आंदोलन की वजह से यहां से जाना पड़ा तो शायद वे मन में एक संतुष्टि का भाव लेकर गये होंगे कि अब कम से कम नील किसानों को शोषण की उस संवेदनहीन प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ेगा. मगर जब आप गांधी के चंपारण से जाने के बाद के दिनों पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि यह खुशी बहुत अधिक दिनों तक बरकरार नहीं रही. इस बात के…

Read More

ताऊ देवीलाल: भारतीय सियासत का अद्भुत चेहरा

जयन्त जिज्ञासु दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री (77-79 & 87-89) और दो बार भारत के उपप्रधानमंत्री (वीपी सिंह और चंद्रशेखर के कार्यकाल में, 89-91) रहे देश के बड़े किसान नेता ताऊ देवीलाल जी (25 सितंबर 1915 – 6 अप्रैल 2001) की आज 17वीं पुण्यतिथि है। आपकी तुनकमिजाजी के बावजूद बिहार आपका सदा ऋणी रहेगा कि आपने 90 के दशक में बिहार को एक ऐसा मुख्यमंत्री दिया जिन्होंने वंचितों को उच्च शिक्षा से जोड़ने के लिए पांच विश्वविद्यालय खोला। आप शरद जी को बहुत मानते थे और पहली बार केंद्र में…

Read More

क्या चंपारण सत्याग्रह आधा-अधूरा किसान आंदोलन था? चंपारण-गांधी के बाद-1

बेतिया के किसान नेता राजकुमार शुक्ल की जिद पर नील किसानों की समस्या को समझने के लिए 10 अप्रैल, 1917 को गांधी पहली बार बिहार आये थे. उन्होंने शुक्लजी से कह रखा था कि वे महज तीन-चार रोज रुकेंगे और किसानों से बात कर उनकी समस्या को समझने की कोशिश करेंगे. मगर पहले तिरहुत के कमिश्नर मोरशेड की बेरुखी और फिर मोतिहारी कचहरी में पेशी के आदेश के बाद उन्हें समझ में आ गया कि वे समस्या को जितनी छोटी समझते हैं, उतनी छोटी है नहीं. उन्होंने तय कर लिया…

Read More

आंबेडकर की काट भर नहीं थे जगजीवन राम

पुष्यमित्र इमरजेंसी का आखिरी दौर था. चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. दिल्ली के मशहूर रामलीला मैदान में बाबू जगजीवन राम की सभा होने वाली थी. जबरदस्त भीड़ होने की उम्मीद थी. इस सभा को असफल करने के लिए इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर राजकपूर की मशहूर फिल्म बॉबी दिखाये जाने की घोषणा कर दी, उसी वक्त यह फिल्म दिखायी जानी थी, जब जगजीवन राम की सभा थी. उनदिनों दिल्ली में टीवी का नया-नया क्रेज था और टीवी पर ऐसी फिल्म को कोई मिस नहीं करना चाहता था. यह सरकार…

Read More

विशेष दर्जा तो बिहार को चाहिए

इन दिनों विशेष राज्य के मुद्दे पर आंध्र प्रदेश की सरकार केंद्र से नाराज है, वहां के सांसद एकजुट होकर लोक सभा में आंदोलन कर रहे हैं, मगर बिहार की सरकार ने भाजपा से समर्थन लेने के बाद विशेष राज्य की दावेदारी छोड़ दी है और बिहार के सांसद भी इस मसले पर कोई सवाल नहीं कर रहे. इन्हीं मसलों पर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मोहन गुरुस्वामी ने अपने फेसबुक वाल पर यह पोस्ट डाली है और आंकड़ों और ऐतिहासिक परिस्थितियों के जरिये बिहार के विशेष दर्जे की वकालत की है. यह…

Read More

धरती के संरक्षण को प्रेरित करती है ‘धरती कहे पुकार के’

शनिवार 24 मार्च को अर्थ आवर और चैत्र नवरात्र के अवसर पर अनंता एचडी एंटरटेनमेंट और माँ वैष्णवी रानी फिल्म्स के बैनर तले निर्मित फिल्म ‘धरती कहे पुकार के’ को रिलीज कर दिया गया. इस फिल्म का निर्देशन पूजा कुमारी ने किया है. चैत्र नवरात्र के अवसर पर रिलीज इस पूरी फिल्म में महिलाओं की ही सशक्त भूमिका रही है. साथ ही अर्थ आवर के अवसर पर इस फिल्म के रिलीज द्वारा लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति को सहेजने और धरती के संरक्षण के लिए प्रेरित करने का सन्देश…

Read More

उस फकीर उस्ताद की याद में

निराला बिदेसिया सवाल-‘‘कुछ गाते हो?’’ जवाब- नहीं उस्ताद. सवाल- कोई साज बजाने का सउर है? जवाब- ना उस्ताद. पहले थोड़ा मुंह बिचकाये. मेरे चेहरे पर निराशा के भाव छा गये. अगले ही पल वे बच्चों जैसा खिलखिलाते हुए मेरे पीठ पर हाथ फेरते हुए कहने लगे- एका मतलब ई हुआ कि एकदम बेसुरे हो तुम. तब फिर का बात करोगे संगीत पर मुझसे! फिर अगला सवाल—अच्छा ई बताओ कि गीत—संगीत पर कुछ जानते भी हो? मेरा जवाब होता है— रुचि है कला में, गीत—संगीत में, अनुरागी हूं कला का. ठहाका…

Read More

गांधी कहते थे, बिहारियों से बढ़कर बिहारी हैं कृपलानी

आज आचार्य कृपलानी की पुण्यतिथि है. चंपारण सत्याग्रह की कहानियों से गुजरते वक्त मुझे इनके बारे में जानने का मौका मिला था. गांधी जब पहली बार मुजफ्फरपुर जा रहे थे तो कैसे कृपलानी उनके स्वागत के लिए नारियल के पेड़ पर चढ़ गये थे? क्यों महज एक रात कॉलेज के स्टाफ क्वार्टर में गांधी को ठहराने की वजह से उनकी नौकरी चली गयी थी?  क्यों गांधी उन्हें बिहारियों से बढ़कर बिहारी कहते थे? और वह मार्मिक पत्र भी जो गांधी ने उनकी नौकरी जाने के बाद उन्हें लिखा था… पुष्यमित्र…

Read More