क्यों 1996 का ‘चारा’ ट्रेंड कर रहा है और 2017 का ‘सृजन’ डिबेट से भी बाहर है?

P.M.

इन दिनों हमलोग 20 साल पुराने चारा घोटाले की बहसों में बिजी हैं. पुराने अखबारों की कतरनें शेयर की जा रही हैं. पुराने पत्रकार उन दिनों की कहानियां सुना रहे हैं कि किस तरह स्कूटर पर गायों का चारा ढोया गया था. उस कलेक्टर का इंटरव्यू शेयर हो रहा है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसने इस घोटाले का भंडाफोड़ किया था. वहीं, यह बहस भी है कि घोटाले के अदालती फैसले भी क्या जातीय नजरिये से हो रहे हैं. कुल मिलाकर बिहारी पब्लिक को बीस साल पुराने इस घपले में इन दिनों गजब की दिलचस्पी है.

इस दौर में खबरें तलाशते हुए मैं सोचता हूं कि आखिर हमारी दिलचस्पी इस बीस साल पुराने घपले में जितनी है, उतनी इस बीत रहे साल में हुए अजीबो-गरीब और अपनी तरह के अनूठे घपले में क्यों नहीं है, जो बिहार के ऐतिहासिक शहर भागलपुर में घटा. जिसकी फाइलें हाल-हाल में ही सीबीआई द्वारा समेटी गयी है. लोगों की दिलचस्पी इस बात में क्यों नहीं है कि कैसे सरकारी खाते का पैसा एक प्राइवेट एनजीओ के बैंक अकाउंट में चला जाता था और पटना में पिछले दस साल से बैठी सुशासनी सरकार को पता तक नहीं चलता था?

कैसे, यह भी होता था कि जब सरकारी खाते से लाभुकों को पैसा दिया जाना होता तो एनजीओ के खाते से पैसा वापस सरकारी खाते में चला जाता?  कैसे महज एक एनजीओ का पासबुक अपडेट करने के लिए अलग से जाली सॉफ्टवेयर तैयार कर लिया गया. कैसे, एक एनजीओ ने सरकारी पैसों से अपना सूदखोरी का अरबों का साम्राज्य खड़ा कर लिया. कैसे इस एक एनजीओ के खाते में भागलपुर ही नहीं, बांका और सहरसा जिले के सरकारी खातों का पैसा भी ट्रांसफर होता रहा. और आज इस घोटाले की राशि 1700 करोड़ तक पहुंच गयी है.

हमारी दिलचस्पी इस घोटाले में, इसके षडयंत्रकारी सूत्रधारों में क्यों नहीं है. तीन-तीन डीएम जिस घोटाले के संरक्षक हैं. एनजीओ की वर्तमान संचालिका का रिश्ता झारखंड के एक बड़े कांग्रेसी नेता से जुड़ता है. बिहार के कई बड़े भाजपाई नेता इसका संरक्षण देने के संदिग्ध माने जाने रहे हैं. जिस घोटाले की नींव राबड़ी देवी के शासन के आखिरी सालों में पड़ी और सबसे अधिक पैसा उस दौर में हेरा-फेरी का शिकार हुआ जब राज्य में महागठबंधन की सरकार थी.

क्यों इस घोटाले का पैसा राज्य से छपने वाले कुछ अखबारों को भी मिलने की बात कही जा रही है और आठ पत्रकारों के नाम भी इस घपले में आ रहे हैं. और क्या यह इकलौता इस तरह का घोटाला है, सृजन इकलौता ऐसा एनजीओ है, जिसके खाते में सरकारी पैसा इस तरह ट्रांसफर हुआ होगा. क्यों एक ऐसे राज्य में जहां कई विभागों का तीन चौथाई पैसा हर साल बिना खर्ज हुए वापस हो जाता है, वहां ऐसे दसियों मामले होने की संभावना पर गौर नहीं किया जा रहा. यह तो हमारे राज्य के लोगों की मनोवृत्ति का हिस्सा है, हमारे अधिकारी-कर्मचारी तो पोस्टऑफिस के पैसों से भी सूद का कारोबार करते रहे हैं. तो हम आज क्यों यह नहीं सोच रहे कि ऐसा घोटाल सिर्फ भागलपुर में नहीं हुआ होगा, सिर्फ सृजन ने नहीं किया होगा. क्यों हम आज उस गुस्से के साथ सोशल मीडिया पर नहीं हैं कि ऐ सरकार, इस घोटाले की ठीक से जांच कराओ. हर जिले की फाइलें चेक कराओ. इस घोटाले में शामिल और इसे संरक्षण देने वाले हर नेता-अफसर-एनजीओ वाले को स्पीडी ट्राइल चलवाकर सख्त सजा दी जाये.

क्या ऐसा सिर्फ इसलिए है कि इसमें किसी लालू यादव का नाम नहीं है, जिसके खिलाफ हमें पोलिटकल गुस्सा सेटल करना है? क्या ऐसा इसलिए है कि हमें ऐसे भ्रष्टाचारों से कोई फर्क नहीं पड़ता जिसमें कोई बड़ा पोलिटिकल लीडर शामिल न हो? क्या इस 17 सौ करोड़ के घपले के खिलाफ गुस्सा उभारने के लिए हमें किसी सुशील मोदी को इसमें फंसाना पड़ेगा, जैसा राजद वाले कोशिश कर रहे हैं? हम यह क्यों नहीं मान लेते कि 2004 से 2015 के बीच घटे इस घोटाले का हर राजनीतिक दल समान भावना से संरक्षण कर रहा था. यह व्यवस्था की लूट है, इसलिए हर सजावार को सजा दिलाने के लिए सरकार पर प्रेशर बनाना हमारा काम है. और साथ ही हमें यह भी पता करवाना है कि क्या यह सब दूसरे इलाके में भी तो उसी तरह नहीं चल रहा. मगर शायद नहीं, क्योंकि हमारी पोलिटिकल ट्रेनिंग उस तरह से नहीं हुई है. हमारे लिए हर घोटाला किसी पोलिटिकल बिग फिश को निबटाने का उपाय है, किसी भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को खत्म करने का नहीं.

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