रात भर स्टीमर पर ठिठुरते, जान बचने की गुहार लगाते रहे 150 यात्री

सांकेतिक तसवीर

कुछ खबरें ऐसी होती हैं कि अपने शहर के दायरे में ही दम तोड़ देती हैं. ऐसी ही एक खबर कटिहार जिले की है. जब 16 और 17 जनवरी की दरम्यानी रात को झारखंड के साहिबगंज से कटिहार के मनिहारी घाट के लिए चली स्टीमर को कुहासे की वजह से पूरी रात गंगा नदी में ही काटना पड़ा. स्टीमर पर सवार 150 के करीब यात्री इस भीषण ठंड में रात भर ठिठुरते हुए ईश्वर को याद करते रहे कि कोई अनहोनी न हो. यह ईश्वर का शुक्र और नाविक की चतुराई थी कि कुछ हुआ नहीं, वरना यह खबर अखबार के लोकल पन्ने पर दम नहीं तोड़ती. 1988 में इसी घाट पर 300 यात्रियों को लेकर चला स्टीमर गंगा में डूब गया था, कोई बचाया नहीं जा सका था. इस घटना से एक बार फिर बिहार राज्य में नौवहन की लापरवाहियां उजागर हुई हैं. पिछले साल इसी महीने में गंगा में दो नावें पटना में डूबी थी और पतंगोत्सव मना कर लौट रहे तीन दर्जन लोग मौत की आगोश में चले गये थे. उस वक्त नौवहन परिचालन के मानकों को लागू करने की बात हुई थी. अगर यह नियम लागू हो गया होता तो कल कटिहार में यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती. आइये पढ़ते हैं इस रिपोर्ट को और जानते हैं उन मानकों के बारे में जो नौका संचालन के लिए जरूरी हैं और जो राज्य में कानून के रूप में लागू हैं.

बिहार कवरेज

यह 16 जनवरी की शाम की बात है. मनिहारी और साहिबगंज के बीच चलने वाली स्टीमर की आखिरी फेरी वहां से चार बजकर 30 मिनट पर खुली. उस वक्त आसमान में कोहरा काफी था, मगर लोगों के मना करने पर भी ओवर कॉंफिडेंस ने स्टीमर संचालकों ने स्टीमर को खोल दिया. बीच रास्ते में पहुंचने के बाद कोहरे के कारण स्टीमर रास्ता भटक गया. ऐसे में स्टीमर चालक ने एक समझदारी जरूर दिखायी कि पास में गंगा के कुछ किनारे तक स्टीमर को पहुंचा दिया. ताकि अगर स्टीमर डूबे भी तो कोई बड़ा हादसा न हो.

मगर यह समस्या का अंत नहीं था. इस भीषण ठंड में यात्री बिना ओढ़ना-बिछावन के थे. खाने का कोई सामान नहीं था. छोटे-छोटे कई बच्चे भी थे. इस स्टीमर पर सवार मनिहारी निवासी सचिन रजक ने बाद में बताया कि पूरी रात लोग जगे हुए थे, जगह-जगह से गंगा-गंगा, जान बचइहौ की गुहार आ रही थी. लोग भूखे-प्यासे ठिठुर रहे थे. मोबाइल के टॉर्च को जलाकर रोशनी की जा रही थी. लोग अपने घरों में सूचना भी दे रहे थे, मगर सब बेबस थे. स्टीमर चालक बार-बार भरोसा दिलाता कि बस रात गुजारना है, मगर किसी को भरोसा नहीं हो रहा था.

दरअसल 1988 में इसी घाट पर एक भीषण स्टीमर हादसा हुआ था, जिसमें 300 से अधिक लोगों की मौत हो गयी थी. उस घटना की बात कई लोगों के मन में थी, मगर कोई डर से जुबान पर नहीं लाना चाह रहा था. इन यात्रियों को इसी स्थिति में 18 घंटे गुजारने पड़े. अगली सुबह आठ बजे से इनको इस पार लाने के इंतजाम शुरू हुए. उन्हें नावों में भर-भर कर इस पार लाया गया.

यह अच्छा था कि इस पार पूरा प्रशासनिक अमला मौजूद था. डॉक्टरों की टीम थी. घाट पर ही स्वास्थ्य जांच हुई. जिला प्रशासन की तरफ से स्टीमर संचालक से स्पष्टीकरण पूछा गया है. क्योंकि नियमानुसार आंधी, कुहासा और बरसात के दिनों में स्टीमर का परिचालन नहीं करना है. मगर स्पष्टीकरण पूछने की नौबत क्यों आयी, यह जवाब प्रशासन को देना चाहिए. वे पहले से कड़ाई क्यों नहीं करते.

आइये जानते हैं, क्या हैं बिहार में नौका परिचालन के नियम

मॉडल बोट रूल, 2011

बिहार सरकार ने 2011 में मॉडल बोट रूल को लागू किया जो बंगाल नौ-घाट अधिनियम, 1885 पर आधारित था. मगर जमीनी अनुभव बताते हैं कि इनमें से एक भी नियम पूरे राज्य में किसी भी नौका घाट पर लागू नहीं हो पाये.

यहां पढ़ें इस नियम के प्रमुख बिंदू…

  1. कोई भीबोटचाहे सामान ढोता हो या सवारी, नियमित चलता हो या कभी-कभार, किराये पर चल रहा हो या बिना किराये के, नदी, झील, नहर, तालाब, पोखरा या किसी भी अन्य जलीय क्षेत्र में बिना रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस के नहीं चलाया जा सकता.
  2. लाइसेंस एवं रजिस्ट्रेशन के लिए परिवहन विभाग में आवेदन देना होगा और उसके बाद, आवेदन के तीस दिनों के भीतर, बोटसर्वेयर नाव का सर्वे करेगा, तभी उसे लाइसेंस दिया जायेगा और पंजीकृत किया जायेगा. पंजीकरण तीन वर्षों के लिए ही मान्य होगा.
  3. अगर किसीबोटको किसी अन्य व्यक्ति को बेचा या हस्तांतरित किया जाता है तो इसकी सूचना भी 14 दिनों के अंदर विभाग में देनी होगी और रजिस्ट्रेशन ऑफिस में इसका म्यूटेशन होगा.
  4. बोटका नियमित अंतराल पर रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराना पड़ेगा और यह बोट सर्वेयर की जांच के बाद ही होगा. अगर बोट परिचालन के लायक न हो तो रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जायेगा. अगर निर्धारित समय से दो साल की अवधि के बीच रजिस्ट्रेशन रिन्यू न कराया जाये तो रजिस्ट्रेशन खुद बखुद रद्द हो जायेगा.
  5. बोटसर्वेयर की मौजूदगी में हर नाव की लोड लाइन निर्धारित होगी. हर नाव पर सफेद रंग की एक 15 सेमी चौड़ी, 30 सेमी लंबी और 2.5 सेमी गहरी पट्टी बनायी जायेगी. अगर यह पट्टी पानी में डूबने लगे तो उसे ओवरलोड माना जायेगा.
  6. हर नाव में कम से कम दो सुरक्षा ट्यूब और एक फर्स्ट एड बॉक्स होना जरूरी होगा.
  7. अगरबोटमें इंजन लगा हो तो उसमें अग्निशामक लगा रहना आवश्यक होगा.
  8. यात्रीबोटमें किसी ऐसे जगह पर अधिकतम यात्री लोड किये जाने की इजाजत का उल्लेख किया जायेगा जहां से यह यात्रियों को आसानी से नजर आ जाये.
  9. आम तौर पर किसी नाव का परिचालन सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच ही होना चाहिये. अगर नौका का परिवहन रात में होना हो तो उसमें रोशनी की समुचित व्यवस्था है या नहीं यहबोटसर्वेयर को देखना और उसके बाद पंजीकरण की स्वीकृति देना होगा.
  10. नाव चलाने का लाइसेंस हमेशाबोटमें रखना होगा और किसी अधिकारी या यात्री द्वारा मांगे जाने पर इसे नौका चालक को प्रस्तुत करना जरूरी होगा.
  11. अगर कोई नाविक या नाव का मालिक लाइसेंस मांगे जाने पर प्रस्तुत नहीं करता है तो उसे बगैर लाइसेंस वाली नौका मान लिया जायेगा. रजिस्ट्रेशन कार्यालय में उसे रजिस्ट्रेशन फीस की तीन गुना राशि पेनाल्टी के रूप में जमा कराना होगा.
  12. जिलाधिकारी या पंजीकरण अधिकारी किसी भी वक्त किसी भी नौका को पुनः सर्वे कराने का आदेश दे सकते हैं.
  13. हर एक मीटर की जगह में दो से अधिक यात्री को बिठाया नहीं जा सकता है. 30 यात्रियों को ढ़ोने वाली नौका में दो नाविक और उससे अधिक यात्रियों को ढोने वाली नौका में कम से कम तीन नाविक होने चाहिये.
  14. अगर मोटर चालित नौका हो तो पहले यह जांचा जायेगा कि क्या नौका मोटर के परिचालन को सहने लायक है या नहीं. ऐसी नौका में हर यात्री के बैठने का इंतजाम सीट के रूप में होना चाहिये. हर पांच यात्री पर एक लाइफ ट्यूब होनी चाहिये, यह कम से कम दो होना चाहिये. अग्निशामक यंत्र होना चाहिये. पर्याप्त मात्रा में शुद्ध पेयजल होना चाहिये, जो यात्रियों के मांगने पर मुफ्त में उपलब्ध कराया जा सके. फर्स्ट एड बॉक्स होना चाहिये और नेविगेशन लाइट लगी होनी चाहिये.
  15. यात्रियों के लिए नियम- कोई यात्री हानिकारक पदार्थ लेकर यात्रा नहीं कर सकता जैसे, हथियार, बारूद, खराब खाना आदि. वह नाविक या उसके सहकर्मी के काम को बाधित नहीं कर सकता.
  16. नाविकों की योग्यता के बारे में परिवहन विभाग एक साल के अंदर नियम बनायेगा औरबोटसर्वेयर की एक हफ्ते की ट्रेनिंग होगी.

 

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