सुशील मोदी ने पटना में नये बस स्टैंड बनने की घोषणा की तो क्यों भड़क उठे ट्विटर यूजर?

P.M.

आज सवेरे बिहार के डिप्टी सीएम ने ट्विटर पर घोषणा की कि पटना में 302 करो़ड़ की लागत से देश का बेहतरीन बस स्टैंड बनना शुरू हो गया है. 2018 के दिसम्बर में राजधानीवासियों को मिलेगी आधुनिक सुविधाओं से युक्त बस स्टैंड की सुविधा. आम तौर पर सुशील मोदी की इस घोषणा का लोगों को उत्साह के साथ स्वागत करना चाहिए था. मगर लोगों ने उनके ट्विटर पर जो कमेंट किये हैं, उससे समझ आता है कि लोगों का सरकारी व्यवस्था पर से किस कदर भरोसा उठ गया है.

पहला कमेंट संजीव झा का है, जो कहते हैं, महोदय यह काम तो आप अच्छा कर रहे हैं, मगर पटना शहर, स्टेशन औऱ मीठापुर के इलाके में भीषण गंदगी है, उसका निबटारा कराइये. मधेपुरा की एक महिला रिंकी देवी एक वीडियो टैग करते हुए कहती है कि मधेपुरा बस स्टैंड पर बैठने के लिए बेंच भी नहीं है. एक युवती उर्मिला राय कहती है, बिहार के पास पैसा बहुत हो गया है, वैसे ठेका किसे दे रहे हैं. वैसे सबसे खतरनाक कमेंट एक वकील साहब रामनाथ सिंह का है, जो कहते हैं कि शर्म आनी चाहिए, मीठापुर बस स्टैंड बनते समय भी यही बोला गया था. इसकी हालत देख लें.

यह बिल्कुल सही बात है कि बिहार के सभी शहरों में बस स्टैंडों की हालत बिल्कुल खस्ता है और इसकी बेहतरी के लिए काम होना चाहिए. मीठापुर बस स्टैंड पर आप चले जायें तो गंदगी और शोर-शराबे से पागल हो जायेंगे. बैठने की जगह वहां भी नहीं है. मगर इसका इलाज यह नहीं है कि 302 करोड़ से एक नया वडोदरा मॉडल बस अड्डा बनाया जाये. ताकि उसे शान की चीज बताई जा सके. अगर इसमें थोड़े से पैसे और जोड़ दिये जाते तो पूरे राज्य के बस अड्डों की दशा सुधारी जा सकती थी. मगर सरकारें इस तरह से नहीं सोचती. उर्मिला राय का इशारा बिल्कुल सही है. 302 करोड़ का प्रोजेक्ट मतलब सौ करोड़ की कमाई. ठेका कंपनी से लेकर मंत्री और अधिकारियों तक.

बहरहाल हमें अपनी बात रामनाथ सिंह के कमेंट के इर्द-गिर्द रखनी चाहिए. महज 12-13 साल पहले यही बातें कही गयी थी, जब हार्डिंग पार्क से बस पड़ाव को उठाकर मीठापुर ले जाया गया था. मगर 12 साल में ही मीठापुर की हालत कंडम हो गयी और हम एक नयी जगह पर जा रहे हैं. यह नयी जगह कितने सालों तक हमारा साथ देगी. क्या इसका जवाब सरकार के पास है? और क्या सरकार को बताना नहीं चाहिए कि उसी बस अड्डे का जीर्णौद्धार क्यों नहीं कराया जाता. उसमें तो 20 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं होंगे. फिर जनता पर 302 करोड़ का बोझ क्यों डाल रहे हैं?

पिछले दिनों मैं मीठापुर बस अड्डा गया था. वहां नगर निगम के कर्मियों से बातचीत की. जब बस अड्डा बना था तो कई बेहतर चीजें बनी थी. यह बस अड्डा बना भर ही राबड़ी राज में था इसकी बरबादी सुशासन राज में ही हुई. वजह सिर्फ इतनी थी कि सालाना डेढ़ करोड़ कमाने वाले इस बस अड्डे के मेंटेनेंस पर पटना नगर निगम ने कभी एक पैसा खर्च नहीं किया. न साफ-सफाई के नाम पर. न अंदर में सड़कों के मेंटेनेंस पर, न पेयजल, शौचालय और लोगों के बैठने की जगह की मरम्मत के नाम पर. धीरे-धीरे चीजें बरबाद होती चली गयी.

वहां एक भवन भी है, जहां लोगों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. बस अड्डे का दफ्तर था. शौचालय और पेयजल की व्यवस्था थी. मगर अब वह जगह सामान ठोने वालों का डंपिंग यार्ड बन गया है. उस पूरी बिल्डिंग में आपको एक भी कुरसी नहीं मिलेगी, जहां यात्री कुछ देर बैठ कर सुस्ता सके. यहां तक कि बस अड्डे के कार्यालय में भी एक भी सरकारी कुरसी नहीं है, वहां के स्टाफ ने अपने बैठने के लिए प्लास्टिक की कुछ कुरसियों का इंतजाम करके बैठते हैं. बस स्टैंड के केयर टेकर उमेश चंद्र शर्मा के जिम्मे पूरे बस स्टैंड के प्रबंधन की जिम्मेदारी है. पटना नगर निगम उसे इस महती भूमिका के बदले 250 रुपये प्रति दिन के हिसाब से मेहनताना देता है.

उन्होंने बताया कि उनके अलावा 37 और कर्मचारी इसी दैनिक वेतन पर यहां कार्यरत हैं. इनमें टोल कलेक्टर, गेट मैन, अनुसेवी और कुल मिलाकर तीन सफाई कर्मी है. इन तीन सफाई कर्मी के जिम्मे पूरे बस स्टैंड की साफ सफाई का काम है. इनमें एक महिला है और एक बुजुर्ग. यहां से बसों से 45, 60, 75 रुपये की तीन अलग-अलग दरों से अलग-अलग बसों से टोल वसूला जाता है, एक दिन की दर से. हालांकि यहां से खुलने वाली अधिकांश बसें रोजाना औसतन पांच हजार रुपये जरूरी कमाती होंगी. इसके बावजूद यहां से हर साल औसतन 1.32 करोड़ रुपये के टोल की वसूली होती है, जिनमें से नगर निगम बमुश्किल 32 लाख रुपये ही खर्च करता है, वह भी इन 38 कर्मियों के वेतन पर. इसके अलावा 2004 से लेकर आज तक यहां एक पाई खर्च नहीं हुई है. उमेश चंद्र शर्मा ने बताया कि पिछले माह नगर निगम के आयुक्त अभिषेक सिंह ने आकर उनसे यहां की समस्याओं के बारे में बातचीत की और ठोस समाधान का आश्वासन दिया था. मगर कहीं-कहीं मिट्टी भराने के अलावा कोई काम नहीं हुआ.

यह सब इसलिए बता रहा हूं कि बस अड्डे या किसी भवन या सरकारी संसाधन का जब निर्माण होता है तो कितनी बड़ी-बड़ी बातें होती हैं. मगर मेंटेनेंस के नाम पर सरकार एक पाई खर्च नहीं करती. लिहाजा हर चीज कुछ सालों में बरबाद हो जाती है. फिर सरकार उसे रिजेक्ट करके अगली परियोजना में जुट जाती है. मगर क्या यह करदाताओं के पैसे की बरबादी नहीं है. क्यों सरकार नया बनाने के बदले पुराने को दुरुस्त कराने में रुचि नहीं लेती. इसकी वजह वही है जो उर्मिला जी बताती हैं. कमीशनखोरी.

इसी तरह बारहो महीने पानी में डूबा रहता है मीठापुर बस अड्डा

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