शैलेंद्र उर्फ बोस्की की कमीज और सिगरेट का डब्बा- गुलजार

आज गीतकार शंकर शैलेंद्र (पूरा नाम- शंकरदास केसरीलाल शैलेंद्र) की पुण्यतिथी है. हम बिहार वाले अक्सर भूल जाया करते हैं कि शैलेंद्र हमारे अपने थे. भले ही वे रावलपिंडी में पैदा हुए और मथुरा में पढ़े-लिखे. मगर उनकी जड़ें बिहार के आरा के अख्तियारपुर में थी. तभी उन्होंने जो इकलौती फिल्म बनायी वह बिहार के कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी तीसरी कसम थी. बहरहाल, आज उनकी पुण्यतिथि पर यह आलेख पढ़िये, जो उनके ठीक जूनियर गीतकार गुलजार ने लिखा है, जो उनके बाद गीत पसंद करने वालों के दिलों पर एकछत्र राज करते हैं. गुलजार का लिखा यह गद्य, यह समृति लेख, जो नया ज्ञानोदय के जून, 2011 के अंक में छपा था, इसे पढ़ना एक रेयर अनुभव से गुजरना है. इसमें शैलेंद्र के किस्से तो हैं ही, गुलजार के गद्य की तंदूर वाली खुशबू भी है. लेख का आनंद लीजिये.

गुलजार

मक्खन जीन की पैंट, जिसे आर-52 कहते थे, बोस्की की कमीज, और गोल्ड फ्लैक का डिब्बा, पांच सिगरेटों का, ये शैलेंद्र के अच्छे दिनों की तसवीर है. पांव में चप्पल, शायद कोल्हापुरी. ज्यादा याद नहीं- शायद गहरा सांवला रंग और उस पर चमकती मुस्कुराहट उनके अपने ही किसी मिसरे की तरह!

उनकी ट्रेड यूनियन की बैकग्राउंड के बारे में राजकपूर साहब से सुना था. लेकिन उन्हीं दिनों मैं मिला जब वे फिल्मों के लिए लिख रहे थे. रेडियो पर शैलेंद्र और लता मंगेश्कर, शंकर-जयकिशन ऐसे नाम थे जो सारा दिन तसबीह के दानों की तरह दोहराये जाते थे. लगता था ‘माला का जाप’ हो रहा है. हसरत जयपुरी के साथ जोड़ी थी उनकी. लेकिन महसूस होता था, शंकर-जयकिशन के यहां, ज्यादातर वही लिख रहे थे.

मेरी एक मुलाकात, पता नहीं पहली थी या नहीं, लेकिन पहले पहल की थी. जो बापू निवास पर हुई.

एक छोटी सी जगह, एक कमरा, एक किचन और एक बरमदा- जहां बासू, दीबू और हिमाद्री, एक पेंटर थे, ये तीनो रहते थे.

जगह शैलेंद्र ने किराये पर ली थी. एकांत में बैठकर लिखने के लिए. बासू और दीबू, बिमल दा के असिस्टेंट थे. रहने के लिए जगह नहीं थी इसलिए शैलेंद्र ने आरजी तौर पर इन तीनों को रहने के लिए दे दी थी.

वहां, सलिल चौधरी वक्त बिताने के लिए आया करते थे (या दारू पीने) या शैलेंद्र को ढूंढने के लिए. कुछ स्ट्रग्लर थे. मुकुल दत्त, बिमल दत्त. वे भी अक्सर वहीं पड़े रहते थे. और जो खाना बनता था, सब खाते थे. उसके गांव से आये हुए लोगों की चड्ढी-बनियान से लेकर धोती-कुर्ते, बेड कवर और दरियां तक सूखने के लिए लटकी रहती थी.

सलिल दा के Bombay youth choire की मीटिंग भी अक्सर वहीं हुआ करती थी. रोमा गांगुली, किशोर कुमरा की वाइफ, उसकी प्रेसिडेंट या सेक्रेटरी कुछ थीं. चाय-दूध-शक्कर की स्टॉक जो अक्सर जल्द खत्म हो जाया करती थी, इसलिए यह जिम्मेदारी पड़ोसियों पर आयद रहती थीं.

ये वह एकांत की जगह थी जहां शैलेंद्र लिखने आया करते थे. वहां सब रहते थे, शैलेंद्र किराया दिया करते थे. सेकेंड वर्ल्ड वार और आइएनए से लेकर, रूस, चीन सब पर बहस होती थी. महादेवी वर्मा, सुभाष मुखोपाध्याय, फैज, नेरूदा, हावर्ड फास्ट, महाश्वेता देवी, यशपाल, मंटो- इन सब की नज्मों, अफसानों पर जंगें हुआ करती थी.

शैलेंद्र अपने परिवार के साथ

फिल्म के गाने शैलेंद्र कब और कैसे लिखते थे, यह अब तक राज है. एक बार मुझे यह कहा था, सुबह से लेकर लंच तक का वक्त शंकर-जयकिशन के लिए है. वो डिसिप्लिन नहीं टूट सकता. वो टूट गया तो मुश्किल हो जायेगी.

‘परख’ के डॉयलॉग लिखे थे, फिर ‘पिंजरे के पंछी’ में तय हुआ कि वे स्क्रिप्ट लिखेंगे, मैं गाने लिखूंगा. लैकिन वक्त की किल्लत ने फैसला बदल दिया. मैंने स्क्रिप्ट लिखी और शैलेंद्र ने गाने लिखे.

फिर एक फिल्म बनायी शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’. रेणु जी की वो कहानी, एक बार शायद ‘मारे गये गुलफाम’ के नाम से ‘बापू निवास’ में पढ़ी गयी थी.

फिल्मों के माहौल में रहते हुए भी, शैलेंद्र के माहौल में लिटरेचर मुसलसल महकता रहा. एक आम और मामूली किस्म की सिचुएशन में, गाने को लिटरेचर का दर्जा दे देना, शैलेंद्र का हिस्सा था. मैं कई जगह कह चुका हूं…

Shailendra is the best lyricist, which ever happened tothe Hindi Film Industry.

नज्म और नगमे का फर्क वो जानते थे. नज्म कैसे नगमा बनती है, उन्हें उसकी खबर थी. उसके लिए लोगों के साथ और लोककलाओं के साथ जुड़ा रहना बहुत जरूरी है. मामूली सी सिचुएशन में, मामूली से शब्दों में बड़ी बात कह जाना शैलेंद्र की खासियत थी. एक कॉमन मैन, आम आदमी की पहचान तो देखिये-

होंगे राजे-राजकुंवर
हम बिगड़े दिल शहजादे
हम सिंहासन पर जा बैठें
जब-जब करें इरादे

सूरत है जानी-पहचानी
दुनिया वालों को हैरानी
सर पे लाल टोपी रूसी
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

उनकी अपनी आइडियोलॉजी, हाथ में हाथ डालकर उनके साथ चलती है. तंज विंग ह्यूमर.

सीधी सी बात न मिर्च मसाला
कह के रहेगा कहने वाला

उनकी इमेजरी, उनका जबान

– चिठिया हो तो हर कोई बांचे, भाग न बांचे कोए
– ओ पंछी प्यारे, सांझ सकारे, बोले तू कौन सी बोली
– अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे…

सचिन दा, एसडी बर्मन से एक बार रुठाई हो गयी. सचिन दा किसी बात पर रूठ गये शैलेंद्र से. दीबू ने मुझे कहा कि, ‘बिमल दा से चल कर मिलो. एक गाना लिखाना है.’ मैंने इनकार कर दिया.

शैलेंद्र ने तकरीबन धकेल कर मुझे भेजा. जाओ-जाओ तुम्हारा मोटर-गैराज नहीं छूट जायेगा. मैं उन दिनों एक मोटर-गैराज में काम कर रहा था.

मैंने फिल्मों में अपना पहला गाना लिखा
मेरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे…

मेरे पहले गाने की जगह शैलेंद्र ने थोड़ी देर को खाली की थी और कहा था, जरा इस सीट पर बैठो, मैं अभी आता हूं.
शैलेंद्र उस फिल्म में वापस भी आये और चले भी गये.

मैं अभी तक उस सीट के पास खड़ा इंतजार कर रहा हूं. किसी की मजाल नहीं शैलेंद्र की जगह कोई पूरी कर सके. कोई और उस सीट पर नहीं बैठ सकता.

बोस्कियाना, पाली हिल, बांद्रा पश्चिम, मुंबई 400050
फोन- 022-26461957

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