सीआरपीएफ जवान जो संसद से बस्तर तक हर जगह लड़ता-मरता है, मगर न तो फौजी है, न शहीद

आपको यह जानकर हैरत होगी कि पुलवामा में मारे गए 42 सीआरपीएफ जवान सरकारी नियम के मुताबिक शहीद नहीं हैं। वे सेना के अंग भी नहीं हैं। वे बस खास किस्म के पुलिस बल हैं और उनका नियंत्रण रक्षा मंत्रालय नहीं, गृह मंत्रालय के अधीन है। इसके बावजूद आपके बस्तर में माओवादी हमले में और कश्मीर के आतंकी हमले में सबसे ज्यादा यही लोग मरते नजर आयेंगे। कल 42 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए, इससे पहले इससे भी बड़ा हमला 2010 में दंतेवाड़ा में हुआ था वहां भी सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। इस दौरान और इससे भी पहले कभी ओड़िशा में तो कभी झारखंड में, कभी बिहार में सीआरपीएफ के जवान माओवादी हमले में शहीद होते रहे हैं। कश्मीर में भी हाल के वर्षों में सीआरपीएफ के जवान ही सबसे अधिक निशाने पर रहे हैं।

हालांकि दुखद और शर्मसार कर देने वाला तथ्य यह भी है कि सरकारी भाषा में हम इन्हें शहीद नहीं कह सकते। क्योंकि ये सेना के अंग नहीं हैं, तकनीकी तौर पर ये पारा मिलिट्री फोर्स भी नहीं हैं। ये गृह मंत्री के तहत आने वाले स्पेशल पुलिस हैं, जो सेंट्रल आर्म पुलिस फोर्स का हिस्सा हैं।

आज की तारीख में आर्मी की नौकरी में और सीआरपीएफ की नौकरी में बहुत फर्क है। इसी फर्क को दो साल पहले राजस्थान के माउंटआबू में सीआरपीएफ की बटालियन में तैनात सीआरपीएफ के एक जवान जीत सिंह ने उजागर किया था। जिसने पीएम के नाम एक वीडियो अपलोड किया था। उस वीडियो में मथुरा के रहने वाले जीत सिंह ने कहा था, हम लोग सीआरपीएफ वाले इस देश के अंदर कौन सी ड्यूटी है, जो नहीं करते. लोकसभा चुनाव, राज्यसभा चुनाव, यहां तक कि छोटे-मोटे ग्राम पंचायत चुनाव में काम करते हैं। इसके अलावा, वीआईपी सिक्योरिटी, वीवीआईपी सिक्योरिटी, संसद भवन, एयरपोर्ट, मंदिर, मस्जिद कोई भी ऐसी जगह नहीं, जहां सीआरपीएफ के जवान अपना योगदान न देते हों।’

‘इतना कुछ करने के बावजूद भी भारतीय आर्मी, सीआरपीएफ और बाकी अर्धसैनिक बलों के बीच फैसिलिटीज के बीच इतना अंतर है कि आप लोग सुनोगे तो हैरान रह जाओगे। इतनी ड्यूटियां करने के बावजूद आर्मी को पेंशन भी है. हम लोगों की पेंशन थी, मगर बंद हो गई। 20 साल बाद जब हम नौकरी छोड़कर जाएंगे तो क्या करेंगे? एक्स सर्विसमैन का कोटा भी हमको नहीं, कैंटीन की सुविधा हमको नहीं, मेडिकल की सुविधा हमको नहीं। ड्यूटी सबसे ज्यादा हमारी। आर्मी को जितनी फैसिलिटी मिलती है, हमें उससे कोई ऐतराज नहीं, मिलनी चाहिए। लेकिन हमारे साथ इतना भेदभाव क्यों? हमको भी तो मिलनी चाहिए।

इनकी बातों से जाहिर है कि सेना वालों और सीआरपीएफ वालों की नौकरी में कितना फर्क है। सेना ने शहीद होने वाले अपने यहां के लोगों के परिवार वालों को संभालने, उनकी मदद करने के लिए एक बेहतरीन व्यवस्था विकसित की है। मगर सीआरपीएफ वाले जो रोज शहीद होते हैं(मरते हैं) उनके परिवार को संभालने वाला कोई नहीं होता।

हालांकि पिछले साल गृह मंत्रालय ने इस फर्क को खत्म करने के लिए कुछ कवायदें शुरू की थीं, मगर वे कितनी कामयाब हो पायीं, यह कहना मुश्किल है। सबसे दुखद बात यह है कि सेना की सुरक्षा के लिए तमाम तरह के इंतजाम हैं, इंटेलिजेंस इनपुट हैं, ऑपरेशन प्रोसीजर है। मगर सीआरपीएफ वाले ऐसे ही कहीं भी तैनात कर दिये जाते हैं, कहीं भेज दिये जाते हैं। इसलिए वे सबसे अधिक मरते हैं। आज की तारीख में आंतरिक सुरक्षा का सारा जिम्मा सीआरपीएफ के हवाले है, मगर उनकी वास्तविक स्थिति क्या है, वे आप इस आलेख से समझ ही सकते हैं।

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