सात साल तक बिना पेशी के जेल में पड़े रहे, दो दिन पहले पेश हुए तो अदालत ने कहा इनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं है

बिहार कवरेज

यह पिछले सात साल से जेल में बंद कथित नक्सली नेता विजय आर्य की कहानी है. पुलिस और सरकार कहती है कि वे नक्सली हैं, जबकि उनके परिवार वाले कहते हैं कि वे एक राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता हैं. सामंतों के कुकर्मों के खिलाफ गरीबों के हक की लड़ाई लड़ते रहे हैं. वर्षों से बंद पड़े गुरारू चीनी मिल के मजदूरों के हक की लंबी लड़ाई उन्होंने लड़ी है. इसी संघर्ष की ताकत से घबराकर तत्कालीन बिहार सरकार ने उन्हें नक्सली घोषित कर दिया है. बहरहाल सवाल यह नहीं है कि वे नक्सली हैं या नहीं, सवाल यह है और यह सवाल उनके दामाद जाप नेता श्याम सुंदर ने उठाया है कि अगर उनपर कोई आरोप है तो उसकी कार्रवाई क्यों नहीं होती. सात साल जेल में रहने के बावजूद उन्हें हाल-हाल तक रिमांड पर भी नहीं लिया गया.

उनके सीएम को पत्र लिखने के बाद दो दिन पहले पहली बार उन्हें एक मुकदमे के सिलसिले में पंजाब भेजा गया, मगर वहां से अनुमंडल न्यायिक दंडाधिकारी, खरार ने उन्हें यह कहते हुए वापस भेज दिया कि विजय कुमार आर्य और वाराणासी सुब्रह्णयम पर इस न्यायालय में कोई मुकदमा लंबित नहीं है. विदित हो कि पिछले करीब सात वर्षों से पंजाब के खरार अनुमंडल न्यायालय से प्रोडक्शन वारंट जारी हो रहा था. वहां कांड संख्या-61/11 दर्ज था. इसी मामले में बिहार पुलिस बराबर सुरक्षा का बहाना बनाकर विजय आर्य को वहां भेजने से कतरा रही थी.

दरअसल एक मई, 2011 को बिहार पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त टीम ने विजय आर्य और उनके साथियों की कटिहार जिले के बारसोई अनुमंडल से गिरफ्तारी की थी. उस वक्त पुलिस का आरोप था कि विजय आर्य, वाराणसी सुब्रह्णयम, पुलेंदू शेखर मुखर्जी प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के केंद्रीय कमेटी सदस्य हैं. इनके साथ ही चार अन्य लोगों की भी गिरफ्तारी की गयी थी. इन पर बिहार और संयुक्त आंध्र प्रदेश में कुल 11 मामले दर्ज हैं. मगर उन्हें गिरफ्तार करके पुलिस भूल गये कि इन्हें अदालत में हाजिर भी कराना है और उनके खिलाफ मुकदमा भी चलाना है.

सात साल तक विजय आर्य जेल में पड़े पेशी का इंतजार करते रहे फिर उनके दामाद जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के प्रदेश प्रवक्ता श्याम सुंदर ने बिहार सरकार पर उनकी हत्या की साजिश का आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्हें गैरकानूनी तरीके से जेल में रखा जा रहा है. जातीय दुर्भावना की वजह से उन्हें जेल में रखकर उनकी हत्या की साजिश रची जा रही है. सच में नीतीश कुमार न्याय के साथ विकास के पक्षधर हैं तो विजय कुमार आर्य पर लगाये गये आरोपों की जांच किसी भी उच्च स्तरीय जांच एजेंसी से करवा लें.

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