वे क्या करें, जिनकी थाली दिखाने लायक नहीं है?

इन दिनों सोशल मीडिया में खाने की थाली की तसवीरें पेश करने का चलन बढ़ा है. मैं खुद उस चलन का हिस्सा रहा हूं. कई लोग भोजन की थाली या भोजन सामग्री की तसवीरें इस वजह से पोस्ट करते हैं, क्योंकि इसके पीछे उनकी एक सोच है. जैसे विनीत जी की रेसिपीज महज रेसिपीज नहीं है, इसके पीछे बैचलर किचेन का आइडिया है. एक अकेला पुरुष भी कैसे किचन में रचनाएं कर सकता है, यह विचार वे आगे बढ़ाते हैं. निराला जी और मैं जब पोस्ट करते हैं, तो हम बिहार के फूड कल्चर की विविधता को सामने लाने की कोशिश करते हैं. मगर क्या खाने की थाली की तसवीरें पोस्ट करना भी एक तरह की हिंसा हो सकती है? एक ऐसे समाज में जहां लोगों के लिए दो वक्त की रोटी और रोटी के साथ दाल मिलना मुश्किल है. यह विचार कवि-कथाकार मिथिलेश कुमार राय का है. उन्होंने पहली दफा जब यह आलेख भेजा तो मैंने इन्हीं टिप्पणियों के साथ उन्हें कहा कि चाहें तो कुछ संशोधन कर लें. उन्हें कल संशोधन के साथ दुबारा भेज दिया है. अब मेरा दायित्व है, इसे पोस्ट करना. यह एक विचार है, हम और आप इससे सहमत और असहमत हो सकते हैं. मगर एक सच्चाई यह भी है… पढ़ें और विमर्श करें…

मिथिलेश कुमार राय

कक्का कहते हैं कि भोजन करना मनुष्य की आवश्यक आवश्यकता में शामिल है. मनुष्य को जिन्दा रहने के लिए कुछ भी करके कोई सा भी दो वक्त का भोजन चाहिए ही चाहिए. कक्का कहते हैं बीते ज़माने में भोजन को एकांत में चुपचाप कर लेने की परम्परा थी. वे इसका कारण भी बताते हैं. बताते हैं कि आज जो मड़ुआ कौनी सुथनी अल्हुआ और बाजरा वगैरह लुप्त हो गया है, पचीस तीस साल पहले वही मुख्य भोजन था. लोग मक्के मड़ुआ की रोटी खाया करते थे. खेतों में गेहूं और धान की फसल नहीं के बराबर उपजती थी. लेकिन तब भी यह दुनिया दो फांकों में बंटी हुई थी जैसे आज. पहले फ़ांके के लोगों को तब भी अच्छे भोजन ही नसीब हुआ करते थे. लेकिन तब दूसरे फ़ांके के लोगों की संख्या अधिक थी जिसका जीवन मेहनत करने के बाद भी फाकामस्ती में गुजरता था. यही वे लोग थे जिन्होंने भोजन को छुपाकर करने की परम्परा की नींव डाली थी.

मिथिलेश कुमार राय की पहचान एक संवेदनशील कवि-कथाकार के रूप में है. जीवन में छोटी-छोटी चीजों के बीच खुशियां तलाश लेने की और उसके जाहिर करने की प्रवृत्ति उन्हें समकालीन लेखकों के बीच खास बनाती है.

कक्का जब यह बता रहे थे मुझे यह सब अजीब लग रहा था. क्योंकि मेरे समय का दृश्य कुछ और ही है. हालाँकि कक्का को भी कुछ हद तक यह पता है कि यह समय दरअसल दिखाने का समय है. यह समय किसी का देखने का समय नहीं है. कक्का कभी गुस्से में कह भी देते हैं कि जिसे देखो वही अपना दिखाने के चक्कर में लगे रहते हैं. देखने वाला कोई नहीं. ज्यादातर बार मैं यह समझ भी नहीं पता हूँ कि देखने-दिखाने की बात कक्का किस सन्दर्भ में कहते हैं. लेकिन भोजन की थाली को लेकर उनकी बात मायने रखती है. क्योंकि समय बदल गया है और स्थितियां भी बदली-बदली सी नजर आ जाती है. लेकिन हरेक नगर महानगर गांव और कसबे के पास एक ऐसी आबादी का बसाव जरूर होता है जिनकी थाली की तरफ देखने का मन नहीं करता है. दिखाने की बात तो दूर है.

कई बार मैंने सोचा भी कि इधर की थाली की कुछ तस्वीरें लेकर फेसबुक पर पोस्ट कर दूँ. लेकिन हमेशा ही कुछ सोचकर रुक गया. क्या करता. अब भी समाज में जो चीजें दिखाने लायक समझी जाती हैं उसका सुन्दर होना अनिवार्य होता है. अगर आप अपने भोजन की थाली को किसी को दिखा रहे हैं तो निश्चित ही वह लजीज-व्यंजनों से युक्त होता है. लेकिन कई दिखाने लायक चीजें अब भी एक बड़ी आबादी के लिए दुर्लभ ही हैं. हालाँकि खाने-पहनने और चलने के लिए इन्हें भी लजीज व्यंजन, चमकदार कपड़े और वाहन उपलब्ध हो, इसके लिए ये लगातार जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं. मगर इससे क्या होता है. होता तो ये कई पीढ़ियों से मेहनत करते आ रहे हैं.

मुझे आम जीवन में कुछ, और आभासी संसार में कोई और ही दृश्य देखने को मिलता है. एकदिन की बात है. मुझे किसी काम से मुशहरों की बस्ती में एक बुजुर्ग से मिलना जाना पड़ा. उनके दरवाजे पर रुका तो देखा कि उनका पुत्र नमक मिर्च के साथ बासी भात खा रहा था और नीचे मिट्टी में एक बच्चा रोटी के एक टुकड़े से खेल रहा था. एक पल को यह विचार आया कि मोबाइल से उस स्टील की पुरानी कटोरी का फोटो उतार कर फेसबुक पर चढ़ा दूँ और लिख दूँ कि मेरे गांव के चंदू का सुबह का नाश्ता–क्योंकि आते-आते फेसबुक पर मैंने किसी का सुबह के प्रचुर नाश्ते का फोटो देखा था. लेकिन मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर पाया. क्यों नहीं कर पाया, सोचा तो पाया कि लोग अब भी कम अच्छी चीजों को प्रदर्शन में शामिल करने से बचते रहे हैं.

सदियों से इस देश में भोजन के छप्पन प्रकार के चर्चे हैं. अब तो खैर शेफ के दिमाग के कारण हजारों तरह के डिश उपलब्ध हो गए हैं. बावजूद इसके आज भी सबसे बड़े तबके में भोजन के कुछ बुनियादी प्रकार ही उपलब्ध रहते हैं. कक्का अक्सर मुस्कुराते हुए कहते भी हैं कि भोजन के भले ही सैकड़ों प्रकार हो लेकिन जो ख्याति नमक और रोटी ने अर्जित किया है वह आज तक किसी और को कभी नसीब नहीं हो पाया है.

खेत से खोंटकर लाया गया साग और उसना चावल का भात. अभी-अभी तोड़कर लाया गया हरी मिर्च और प्याज के दो फांक से सजी दोपहर के भोजन की थाली का गर फेसबुक पर फ़ोटोज चिपका दिया जाये तो लाइक तो ढेरों मिल जाएंगे पर ज्यादातर के पास कमेंट में कहने के लिए कुछ नहीं होगा. क्योंकि संतुलित भोजन की सूची में साग-भात की थाली नहीं आती. उसके बगल में दाल और हरी-सब्जी की एक एक कटोरी भी रखनी पड़ती है.  इसी तरह रात के भोजन की थाली जिसमें चार या पांच रोटियां पड़ी हो और उसी रोटी के ऊपर बैगन-प्याज-मिर्च-आचार-तेल-लहसून का चौखा रखा हुआ हो का फ़ोटोज चिपका दिए जाए तो मुझे विश्वास है कि दिव्य स्वाद के बहुतों गुण गए जाएंगे. लेकिन अगर इसके साथ ही ‘एक बड़ी आबादी के रोज का खाना’ का स्लोगन डाल दिए जाए तो ओह-आह के कमेंट ही ज्यादा आएंगे.

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