वह ‘पृथ्वी थियेटर’ का छोरा और वो ‘शेक्सपियराना’ की छोरी

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तब शशि कपूर सिर्फ 18 साल के थे. तब उनके पिता की नाटक मंडली पृथ्वी थियेटर भी घुमंतू थी. वे पूरे देश में घूम-घूम कर नाटक किया करते थे. इन नाटक कंपनियों में पृथ्वीराज कपूर के बच्चे भी हुआ करते थे. पहले राज कपूर और शम्मी कपूर इस मंडली के हिस्सा हुआ करते थे. जब ये दोनों फिल्मों में आ गये तो छोटे शशि कपूर अपने पिता के साथ घूमने लगे. ऐसी ही एक ट्रिप पर वे 1956 में कलकत्ता पहुंचे, एक नाटक लेकर. वहां एक लोकल नाटक मंडली शेक्सपियराना का शो चल रहा था. शायद मैकबेथ था. उस शो में अभिनय कर रही जेनिफर केंडल को देखते ही शशि कपूर होश गंवा बैठे. और फिर पिता का थियेटर छूट गया, वे अगले दो साल तक शेक्सपियराना के साथ ही थियेटर करते रहे, जब तक जेनिफर से उनकी शादी नहीं हो गयी. यह अद्भुत प्रेमकथा थी. भले ही इस प्रेमकथा ने हमें रणवीर कपूर या करीना कपूर जैसे कलाकारों को नहीं दिया, मगर एक ऐसी चीज दी जो आज भी अनमोल है. वह है पृथ्वी थियेटर.

मुंबई का प्रतिष्ठित पृथ्वी थियेटर, जो पृथ्वीराज कपूर का सपना था, जिसे शशि और जेनिफर ने पूरा किया और संजना ने आगे बढ़ाया.

शशि कपूर के बारे में ढेर सारी बातें हुई हैं, और हो रही है. मगर तमाम बातें उनके फिल्मी सफर को लेकर. जब तक उनके रंगमंच के प्यार पर बातें नहीं होंगी उनका बायोडाटा अधूरा ही रहेगा. यह ठीक है कि दीवार, जब-जब फूल खिले, कभी-कभी, नमक हलाल, सिलसिला, काला पत्थर जैसी फिल्मों से हम उन्हें जानते हैं. मगर हम जो नहीं जानते हैं, वह है उनका थियेटर का प्रेम, जो उनके जीवन का हिस्सा रहा है. बचपन, पहली मोहब्बत, शादी, बच्चे सबके सब थियेटर से गुंथे हुए हैं. थियेटर करते हुए प्यार हुआ. जिससे शादी की वह भी थियेटर वाली थी. फिर दोनों ने मिलकर पृथ्वीराज कपूर के अधूरे सपने को पूरा किया और मुंबई में पृथ्वी थियेटर के रूप में एक स्थायी और बेहतरीन मंच की स्थापना की. और फिर उनके बच्चे भी उसी पृथ्वी थियेटर को समर्पित हो गये.

पृथ्वीराज कपूर से साथ राजकपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर और गोद में रणधीर कपूर. यह संभवतः किसी नाटक के बाद की तसवीर है. पूरा परिवार थियेटर के गेटअप में नजर आ रहा है.

पृथ्वी थियेटर ही उनका सबसे बड़ा सपना था और इस देश को उनकी सबसे बड़ी देन है. हालांकि सच यह है कि पृथ्वी थियेटर को स्थापित करने में उनसे अधिक मेहनत जेनिफर की रही है. जेनिफर जो खुद एक बड़े थियेटर कर्मी ज्योफ्ररी केंडल की पुत्री थी, जो कलकत्ता में शेक्सपियराना थियेटर ग्रुप चलाते थे. मगर शादी के बाद जेनिफर ने अपने पिता के नाम से थियेटर नहीं बनाया. अपने ससुर का सपना पूरा किया. पृथ्वीराज हमेशा से चाहते थे कि मुम्बई में थियेटर करने के लिए एक स्थायी जगह हो. 1962 में उन्होंने इसके लिए जुहू में जमीन भी लीज पर ली थी. मगर वे जीते-जी इस सपने को पूरा नहीं कर सके. 1972 में उनकी मौत हो गयी.

शशि कपूर की बचपन की तसवीर

इस अधूरे सपने को उनके सबसे छोटे बेटे बलवीर पृथ्वीराज कपूर उर्फ शशि कपूर ने पूरा किया. 1978 में पृथ्वी थियेटर शशि और जेनिफर की मेहनत से उठकर खड़ा हुआ. पृथ्वी थियेटर के पहले नाटक में नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी और बेंजामिन गिलानी ने अदाकारी की थी. उसके बाद से फिल्म अभिनेताओं द्वारा पृथ्वी थियेटर में आकर नाटक करना एक सम्मान की वजह बनने लगा. हालांकि जेनिफर भी पृथ्वी थियेटर को बहुत वक्त नहीं दे पायी. 1984 में कैंसर की वजह से उनकी मौत हो गयी. जिस रोज उनका निधन हुआ उस रोज भी पृथ्वी थियेटर में शो को जारी रखा गया. क्योंकि शो मस्ट गो ऑन का सिद्धांत उन्हें प्रिय था.

पृथ्वी थियेटर के पीछे सबसे अधिक मेहनत इन दोनों की बेटी संजना कपूर ने किया. वह 1990 में अपने भाई कुणाल कपूर के साथ मिलकर इस थियेटर को आगे बढ़ाने के काम में जुट गयी. तब तक यह जाहिर हो चुका था कि अपने यूरोपियन लुक की वजह से दोनों भाई-बहन हिंदी सिनेमा की दुनिया में चलने वाले नहीं हैं. वह वहां अलग-अलग तरह की गतिविधियां और वर्कशॉप कराने लगीं. बच्चों के लिए कराये जाने वाले थियेटर वर्कशॉप बहुत खास थे. धीरे-धीरे पृथ्वी थियेटर मुंबई के जीवन में रचने बसने लगा. 1995 में भारत सरकार ने पृथ्वी थियेटर पर डाक टिकट जारी किया. 2006 में पृथ्वीराज कपूर की जन्मशदी पर इस थियेटर में कला देश की सेवा में के नाम से एक भव्य आयोजन हुआ. 2004 में शशिकपूर ने एक किताब पृथ्वीवाला भी लिखी जो पृथ्वी थियेटर की ही कहानी है. आज भी वहां साल में 540 से अधिक शोज होते हैं. मंगलवार से लेकर रविवार तक यह चालू रहता है.

 

संजना के साथ शशि कपूर

शशि कपूर की दीवार और पृथ्वीराज कपूर की दीवार

आज भले हम नहीं जानते, मगर दिलचस्प बात है कि अपने जमाने में पृथ्वीराज कपूर की दीवार शशि कपूर की दीवार से कम मशहूर नहीं थी. दरअसल 1945 में पृथ्वीराज कपूर ने दीवार के नाम से एक नाटक तैयार किया था. विषय देश का बंटवारा था. इस नाटक की कहानी थी कि दो भाइयों के बीच एक विदेशी महिला फूट डाल देती है. फिर दोनों भाई घर के बीचो-बीच एक दीवार खड़ी कर लेते हैं. जाहिर सी बात है कि उस वक्त देश में यह बड़ा ज्वलंत सवाल था, मुसलिम लीग देश के बंटवारे की मांग कर रही थी. उनका नाटक काफी मशहूर हुआ था. हालांकि तब शशि कपूर महज सात साल के रहे होंगे, इसलिए वे इस नाटक में भाग नहीं ले पाये होंगे. मगर जब वे बड़े हुए तो यश चोपड़ा ने उन्हें दीवार फिल्म ऑफर किया. उस फिल्म में वे अमिताभ बच्चन के सामने थे. उस फिल्म में उनके द्वारा कहा गया एक संवाद ही आज उनके फिल्मी जीवन का ट्रेडमार्क डॉयलॉग है. मेरे पास मां है.

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