लाशों का कोई धर्म नहीं होता प्रधानमंत्री जी, इस देश को तालिबान बनने से बचा लीजिये

उपासना झा हिंदी के नई पीढ़ी की चुनिंदा संवेदनशील कवियों में से एक हैं. वे उन लोगों में से हैं, जो विचारधाराओं के पूर्वाग्रह के मुक्त होकर अपनी बात रखती हैं. मगर कल की राजसमंद की घटना ने उन्हें इस कदर उद्वेलित कर दिया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक खुली चिट्ठी लिख दी है. इस पत्र को सरकारी दल और उसके समर्थकों को जरूर पढ़ना चाहिए. क्योंकि यह उन लोगों की आवाज है, जो पिछली सरकार के ऊबी हुई थी और नये निजाम से बदलाव की उम्मीद रखती थी. मगर अब इस तटस्थ जमात को भी इस सरकार की अकर्मण्यता और सरकार समर्थकों की हिंसक गतिविधियां परेशान करने लगी हैं.

प्रिय प्रधानमंत्री जी,

मैं एक आम नागरिक हूँ और बहुत डरकर यह चिट्ठी लिख रही हूँ, हो सकता यह कभी आपतक पहुँचे भी नहीं, हो सकता है मुझे देशद्रोही मान लिया जाए और भी बहुत कुछ हो सकता है लेकिन अब भी नहीं बोले तो अपनी आत्मा धिक्कारती रहेगी.

मैं उस बहुसख्यंक भीड़ का हिस्सा हूँ जो आपसे पूर्ववर्ती सरकार के द्वारा लगातार किये जा रहे घोटालों से ऊब गयी थी. जिसने यह उम्मीद देखी थी कि शायद सत्ता में बदलाव से स्थितियाँ सुधरेंगी. लोकतंत्र और संसद पर पूरे विश्वास के साथ लोगों ने परिवर्तन को वोट दिया था. आप बहुमत से चुनी हुई सरकार के प्रमुख हैं. शिक्षा, महंगाई, इंफ्रास्ट्रक्टर, रोजगार तमाम क्षेत्रों में बहुत बढ़िया काम हो सकता था. लेकिन मैं बहुत निराशा के साथ यह कहना चाहती हूँ कि आपकी सरकार ने किसी क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया.

यह बहुत दुख और अचंभे की बात है कि आप अपने भाषणों में गौ रक्षा के नाम पर हत्या करने वालों, भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर देने वालो पर कठोर कार्रवाई की बात करते हैं उल्टे उनके हौसले और बढ़ते चले जाते हैं. यह बेरोजगार भीड़, हिंसा के उन्माद में पागल हो चुकी है. लव-जिहाद वाली बात तो इतनी मनोरंजक लगती है कि क्या कहा जाए, आपके सरकार के कई मंत्री और नेताओं के ऐसे विवाह-सम्बन्ध हैं जो ठीक इसी तरह के हैं.

हम पाकिस्तान से, तालिबान से, इराक और सीरिया से और दुनिया भर के कट्टरपंथी हत्यारों से इतनी घृणा करते रहे कि अब वैसे ही बन भी गये हैं! यह भी बहुत हैरत की बात है. हम जिनसे घृणा करते हैं, उनजैसे बन जाएं! राजसमंद में जो हुआ वही सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी करते थे, ठीक वही. लोगों को पकड़कर उन्हें क्रूरता से कैमरे के सामने मार देना.

प्रधानमंत्री जी, यह एक आम हत्या नहीं है. भीड़ जबसे लोगों को पीटकर मारने लगी है, देश के कानून की लाचारी और सत्ता की धूर्त चुप्पी सामने आती जा रही है. अब नीयत पर ही संदेह होने लगा है. देश का सौहार्द बिगड़ रहा है, वह तानाबाना टूट रहा है और वह बहुत घातक है.

आप इस युवा उन्मादी भीड़ को जो खून का स्वाद जानने को व्यग्र है, रोकिए, समझाइये. इन्हें यह बताया जाए कि जब सालों-साल विदेशी आक्रमण और लूटपाट से कुछ नहीं मिटाया जा सका, जब दिल्ली की एक दोपहर में बीस हज़ार लोग काट डाले गए तब कुछ नहीं बिगड़ा यो क्या कुछ प्रेम-विवाहों से हिंदु-धर्म नष्ट हो जाएगा? सुप्रीम कोर्ट ने आज ही एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि विवाह के बाद भी पत्नी का मूल धर्म नहीं छूटता. अगर आपकी सरकार सच में कुछ करना चाहती है तो यह कानून संसद से पारित करा दें कि दो धर्मों के बीच विवाहों से पत्नी का मूल धर्म बना रहेगा.

प्रधानमंत्री जी, दिन-रात नन्हें बच्चों के यौन-शोषण, बलात्कार, हत्याएँ, दहेज-हत्याएं और तमाम अपराध इसी समाज में हो रहे हैं, इस उत्सुक-व्यग्र भीड़ को गौ-तस्करों पर नज़र रखने की जगह ऐसे अपराधियों पर नज़र रखनी चाहिए कितनी जानें बच जायेंगी. लेकिन नहीं, बचाने से ज्यादा आनन्द मारने में आता होगा शायद.

शिक्षा, रोजगार, महंगाई, स्वास्थ्य में कोई सुधार मत कीजिये कम से कम ऐसी हत्याएं रोकिए, डर पनपने से रोकिए क्योंकि यह डर न जाने कितने दंगे करवा सकता है. कितने निर्दोष लोग मर सकते हैं. और लाश का कोई धर्म नहीं होता सर.

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