रीत बनकर ‘रीत’ रहा है, नये अन्न के स्वागत का यह उत्सव

पुष्यमित्र

आज लबान हैं. हमारे तरह इसे लबान ही कहते हैं मगर इसका असली नाम नवान्न है. बंगाल में इसे नबान्न कहते हैं. यह नये धान के स्वागत का त्योहार है. किसानों के लिहाज से यह पूर्वी भारत का सबसे बड़ा त्योहार है. क्योंकि इस इलाके में लगभग सभी किसान खरीफ में धान की खेती करते हैं. जब धान की पहली बाली कट कर घर आती है तो इससे निकले दाने का चूड़ा(चिवड़ा या पोहा) बना पहले पुरखों को समर्पित किया जाता है, फिर दही के साथ इसे सभी लोग खाते हैं. और नयी फसल के घर आने का उत्सव मनाते हैं. कभी पूर्वी भारत में इस पर्व की वैसी ही धूम हुआ करती थी, जैसी पंजाब-हरियाणा के इलाके में लोहड़ी की होती है. मगर अब नवान्न उत्सव नहीं रहा. धान की खेती का उत्साह खत्म होता चला गया और इसी निरुत्साह के बीच नवान्न इस इलाके के शहरों से गायब हो गया और गांवों में भी महज एक रिचुअल बन कर रह गया है.

बंगाल में नबान्न उत्सव का एक दृश्य

नवान्न को लेकर बचपन की यादें बहुत खूबसूरत हैं. नये धान के चूड़ा और ताजा दही के साथ कोई स्वादिष्ट सब्जी खाने का अपना ही आनंद होता था. इसके साथ ही धनकटनी का सीजन शुरू हो जाता था. रोज हम बच्चे उन खेतों की तरफ जाते थे, जहां धान कट रहा होता था. हर धान के बोझे से एक-एक शीष निकालते ताकि गिनती पक्की रहे. फिर उन शीषों को गूंथ कर रचनात्मक आकार देते. उसे घर में किसी कोने में टांग देते. उन दिनों धान के खेत ही रौनक का केंद्र होते थे. कभी वहां पान बेचने वाला पहुंच जाता, कभी भक्का या भप्फा बेचने वाली बुढिया आ जाती. थोड़े से धान लेकर वे सौदा करते.

मगर धीरे-धीरे किसानी एक घाटे का सौदा होने लगा. हर किसान परिवार में यह धारणा पुख्ता हो गयी कि नयी पीढ़ी को इस धंधे से दूर रखना है. हम दूर होते चले गये. अब न धनरोपणी उत्सव है, न कटनी. उस बंगाल में भी नहीं जहां साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी मिलकर नबान्न के उत्सव को एक खुशनुमा रंग देते थे. नाच-गाना, खाना-पीना सब साथ चलता. उसी बंगाल में नबान्न को लेकर कविताएं रची गयीं, नाटक रचे गये. आज बंगाल के सचिवालय दफ्तर के भवन का नाम नबान्न जरूर है, मगर नबान्न उस्तव की खबरें कम आती हैं.

दरअसल अगहन(मार्गशीष) महीने की पहली तारीख को मनाया जाने वाला यह पर्व नबान्न पुराने बंगाल का साझा पर्व है. इसका प्रभाव बंगाल-बिहार-झारखंड-ओड़िशा और छत्तीसगढ़ के कुछ इलाके तक पहुंचता है. ओड़िशा और असम के इलाके में धनकटनी का यह पर्व दूसरी तिथियों को भी मनाया जाता है. असम में इसे बोहाग बिहु कहते हैं तो ओड़िशा में नोआखाई. मगर यह सब नये अन्न के स्वागत के पर्व ही हैं, क्योंकि एक किसान के घर में नये अन्न के आने से बड़ा कोई और दिन नहीं हो सकता. यह साल भर की मेहनत के रिजल्ट आने जैसा होता था. इसलिए इस पर्व की सीमाएं धर्म और देश की सीमाएं भी लांघ जाती थी. ढाका में आज भी नबान्न मनाया जाता है.

ओडिशा का पर्व नुआखाई

बंगाल में नबान्न को वहां के तेरह प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है. दिलचस्प है कि किसानों के इस पर्व को वहां के बौद्धिक समाज ने भी अपनाया. और इसे प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया. इसी नाम से बिजॉन भट्टाचार्य का एक मशहूर नाटक है नबान्न, जो 1943 के भीषण अकाल की पृष्ठभूमि में लिखा गया था. बंगाल में नबान्न मेला लगता रहा है, वहां चूड़ा-दही के अलावा इस दिन पिट्ठा भी बनता है. झारखंड में दुमका के बासुकीनाथ मंदिर में भी नबान्न पूजा होती है. कोसी और मिचिलांचल के इलाके में तो वहां के प्रिय भोजन चूड़ा-दही का भोग तो लगता ही है. भोजपुर के इलाके में भी नवान्न मनता है. मगर अब ये सब सिर्फ ढोई जा रही परंपराओं के हिस्से हैं. उन परिवारों में मनाये जा रहे हैं, जिनके पास खेती आखिरी विकल्प के तौर पर बची है. उत्साह खत्म हो चुका है. रीत निभाई जा रही है. जो भी है…

चलिए इस मौके पर आपको सुकांत भट्टाचार्य की कविता पढ़ाते हैं…

इस नवान्न में

इस हेमन्त में धान की कटाई होगी
फिर ख़ाली खलिहान से फ़सल की बाढ़ आएगी
पौष के उत्सव में प्राणों के कोलाहल से भरेगा श्मशान-सा नीरव गाँव
फिर भी इस हाथ से हँसिया उठाते रुलाई छूटती है
हलकी हवा में बीती हुई यादों को भूलना कठिन है
पिछले हेमन्त में मर गया है भाई, छोड़ गई है बहन,
राहों-मैदानों में, मड़ई में मरे हैं इतने परिजन,
अपने हाथों से खेत में धान बोना,
व्यर्थ ही धूल में लुटाया है सोना,
किसी के भी घर धान उठाने का शुभ क्षण नहीं आया –
फ़सल के अत्यन्त घनिष्ठ हैं मेरे-तुम्हारे खेत ।
इस बार तेज़ नई हवा में
जययात्रा की ध्वनि तैरती हुई आती है,
पीछे मृत्यु की क्षति का ख़ामोश बयान –
इस हेमन्त में फ़सलें पूछती हैं : कहाँ हैं अपने जन ?
वे क्या सिर्फ़ छिपे रहेंगे,
अक्षमता की गलानि को ढँकेंगे,
प्राणों के बदले किया है जिन्होंने विरोध का उच्चारण ?

इस नवान्न में क्या वंचितों को नहीं मिलेगा निमन्त्रण?

मूल बंगला से अनुवाद : नीलाभ

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