राजकुमार शुक्ल के नाम पर उनके गांव में बने कॉलेज को बंद कराना चाहते हैं उनके नाती

वे चंपारण सत्याग्रह के सूत्रधार हैं. गांधी को चंपारण लाने और उनसे सत्याग्रह की शुरुआत करवाने का श्रेय उनके नाम है. यह चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष है. मगर शुकुलजी के नाम पर उनके ही गांव में बने और संचालित हो रहे इंटर महाविद्यालय का हाल यह है कि वहां तीन-तीन स्वघोषित प्रिंसिपल हो गये हैं. पढाई-लिखाई पिछले बीस साल से ठप है. कॉलेज जब खुलता है तो सिर्फ हंगामा होता है. हाल के वर्षों में छात्रों द्वारा दो बार कॉलेज में आग लगाने की घटना को अंजाम दिया जा चुका है. पिछले चार-पांच सालों से दो प्रिंसिपल अलग-अलग छात्रों का फार्म भरवाते हैं और किसी एक का एडमिट कार्ड पहले आ गया तो दूसरा पक्ष बवाल करता है. कॉलेज को जमीन देने वाले राजकुमार शुक्ल के नाती मणिभूषण राय कहते हैं, इस कॉलेज से इतनी बदनामी होती है कि कॉलेज बंद ही हो जाता तो अच्छा होता.

सतवरिया स्थित राजकुमार शुक्ल महाविद्यालय

कॉलेज के लिए मणिभूषण राय ने ही दी थी 3.5 एकड़ जमीन

बेतिया-नरकटिया राजमार्ग पर सतवरिया गांव में स्थित यह राजकुमार शुक्ल इंटर महाविद्यालय की कथा है. 1980 में चनपटिया के तत्कालीन विधायक बीरबल शर्मा के नेतृत्व में इस कॉलेज की स्थापना हुई थी. अपने नाना की विरासत का ख्याल करते हुए मणिभूषण राय ने लगभग 3.5 एकड़ जमीन का दान इस कॉलेज को दिया था और बेंच-कुरसियों का भी इंतजाम करवाया था. कुछ दिन तो सब ठीक चला. मगर बाद के दिनों में इस पर स्थानीय शिक्षा माफियाओं का कब्जा होने लगा. मणिभूषण कहते हैं कि पिछले बीस साल से इस कॉलेज में एक अक्षर पढाई नहीं हुई है. सिर्फ छात्रों का फार्म भरा जाता है और उन्हें परीक्षा दिलाई जाती है.

बीस साल से ठप है पढ़ाई-लिखाई सिर्फ परीक्षा होती है

आज स्थिति यह है कि यहां तीन-तीन प्रिंसिपल हैं, छात्र भ्रमित रहते हैं कि किनके जरिये एडमिशन लिया जाये. हाल के वर्षों में दो बार कॉलेज में भीषण उपद्रव हुआ और कॉलेज को आग लगाया जा चुका है. पढ़ाई-लिखाई तो पिछले 20 साल से ठप है. वहां जब भी छात्र जमा होते हैं, तो जिंदाबाद-मुर्दाबाद होता है और इसमें उनके नाना का नाम खराब होता है. वे बताते हैं कि 2012 से स्थिति और खराब हो गयी जब यहां के प्राचार्य वशिष्ठ कुंवर ने गुस्से में आकर इस्तीफा दे दिया. हालांकि उन्होंने इस्तीफा वापस भी ले लिया और समिति ने इसे मान भी लिया. मगर इस बीच बिहार इंटरमीडियेट काउंसिल से रमेश प्रसाद नामक एक स्टॉफ प्रिंसिपल बन गये. हालांकि उनकी नियुक्ति अस्वीकृत पद पर थी.

कॉलेज के आगे लगी शुकुलजी की मूर्ति

छात्र दो बार लगा चुके हैं इस कॉलेज में आग

तब से इस साल तक दोनों प्राचार्य छात्रों का अलग-अलग एडमिशन लेते हैं और फार्म भरवाते हैं. इसी की वजह से विवाद होता है. इस साल विवाद से तंग आकर जिला प्रशासन ने नामांकन लेने पर रोक लगा दी है, हालांकि इसके बावजूद दोनों एडमिशन ले रहे हैं. इसी बीच एक तीसरे सज्जन अरविंद श्रीवास्तव का नाम प्राचार्य के रूप में प्रस्तावित करके भेजा गया है. हालांकि उन्हें कौंसिल से मान्यता नहीं मिली है. इस साल फरवरी माह में छात्र कॉलेज में आग लगा चुके हैं. दो साल पहले भी आगजनी की घटना हुई थी.

मणिभूषण राय कहते हैं, इस कॉलेज के विवाद से हमलोग आजिज आ गये हैं, नाना के नाम पर कॉलेज बना था, इसलिए जमीन दे दी. अब नाम के बदले बदनामी हाथ लग रही है. हालांकि राय की कुछ और परेशानियां भी हैं.

गांव का रास्ता इतना खराब है कि पर्यटक बाहर से लौट जाते हैं

वे कहते हैं, पिछले दिनों गुजरात से पर्यटकों का एक दल चंपारण सत्याग्रह की निशानियों को देखने के लिए पश्चिमी चंपारण की यात्रा पर था. वह राजकुमार शुक्ल के घर यानी हमारे घर भी आना चाहता था. मगर इस दल को बेतिया से नरकटियागंज जाने वाले मुख्यमार्ग से ही लौट जाना पड़ा. क्योंकि मुख्यमार्ग से सतवरिया तक पहुंचने का रास्ता काफी जर्जर है. इस साल और भी कई लोगों के फोन उनके पास आये कि वे सतवरिया आना चाहते हैं, और राजकुमार शुक्ल की धरोहर को देखना चाहते हैं. मगर सड़क का हाल देखते हुए उन्हें मना करना पड़ा.

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के मौके पर जहां राज्य सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर तैयारियां की गयी हैं, वहां इस सत्याग्रह के सबसे महत्वपूर्ण किरदार के गांव की यह उपेक्षा सचमुच चिंतनीय है. गांव पहुंचने के रास्ते पर एक जर्जर तोड़ण द्वार तो बना है मगर आगे का रास्ता इतना खतरनाक है कि बाइक से भी वहां पहुंचना खतरनाक हो सकता है. पिछले दिनों बेतिया और उसके आसपास हुए कई आयोजनों में मणिभूषण राय को आमंत्रित किया गया था. उन्होंने विभिन्न अधिकारियों और राजनेताओं से इस बात की शिकायत की मगर कोई नतीजा नहीं निकला.

शुकुलजी की 1917 की डायरी को अच्छी तरह संभाल कर रखा है

बुजुर्ग हो चुके मणिभूषण राय अपने नाना की स्मृतियों को सहेजना चाहते हैं और चाहते हैं कि अगर कोई यहां आये तो बेहतर अनुभव लेकर जाये. उनके पास राजकुमार शुक्ल  की साल 1917 की डायरी है, जिसमें उस साल के रोजाना की घटनाओं को दर्ज किया गया है. इसके अलावा उनके पुराने मकान का हिस्सा भी बचा हुआ है. मगर स्थानीय प्रशासन की अवहेलना से वे काफी आहत हैं. कहते हैं, और तो और जिले के स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में भी राजकुमार शुक्ल का नाम नहीं है.

राजकुमार शुक्ल जी 1917 की डायरी

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