ये दाग तो वाकई अच्छे हैं, मुझे अबू फरहान छोटू की याद दिलाते हैं

पुष्यमित्र

इन दिनों सर्फ एक्सेल का नया विज्ञापन कट्टर हिंदुवादियों के निशाने पर है, क्योंकि उस विज्ञापन में दिखाया गया है कि एक मुसलिम बच्चे को उसके सफेद कपड़ों में मसजिद तक पहुंचाने के लिए एक हिंदू बच्ची अकेले मुहल्ले के बच्चों के सारे रंग झेल लेती है. होली के त्योहार के मौके पर जारी इस विज्ञापन के जरिये सर्फ एक्सेल ब्रांड को संचालित करने वाली कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर ने सांप्रदायिक सौहार्द्र वाले विज्ञापनों की सीरीज जारी की है. हालांकि उसे इस बात का बखूबी विश्वास होगा कि आज की तारीख में हिंदुस्तान में सांप्रदायिक सौहार्द्र की बातें करना कितना रिस्की है. फिर भी उन्होंने खतरा मोल लेकर अपनी बात रखी और अब गालियां खा रहे हैं.

वैसे तो किसी भी ऐड कैंपेन का असली मकसद अपने ब्रांड को प्रोमोट करना होता है. व्यापार बढ़ाना होता है. इसलिए विज्ञापन बनाने वाले और उसे जारी करने वाले अमूमन इस तरह के रिस्क से बचते हैं. इन दिनों टीवी विज्ञापनों में सामाजिक संदेशों का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है. मगर वे भी इस बात का ख्याल रखते हैं कि मामला कंट्रोवर्सियल न हो जाये. इस बार इस बंधी-बंधाई धारणा को तोड़ते हुए हिंदुस्तान यूनिलीवर ने खतरा मोल लिया है, अब देखना है इसका क्या अंजाम होता है. क्योंकि सोशल मीडिया पर हिंदूवादी तो कंपनी के दूसरे प्रोडक्टों के बॉयकॉट की भी योजना बना रहे हैं.

हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी सफल कारोबारी कंपनी ऐसा रिस्क क्यों लेती है, यह जानने की इच्छा ने मुझे कुछ रिसर्च करने पर मजबूर किया. मालूम हुआ कि इस कंपनी के मौजूदा सीइओ और चेयरमैन संजीव मेहता हैं. जो एक ऐसे माता-पिता की संतान हैं, जो बंटवारे के बाद हिंदुस्तान आये थे. ऐसे में उनके मन में हिंदू-मुसलिम और हिंदुस्तान-पाकिस्तान वाली स्वाभाविक नफरत होनी चाहिए. वे इस कंपनी को संभालते हुए पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे पड़ोसी मुल्कों का कारोबार भी देखते हैं. उन्होंने अपने कैरियर का लंबा वक्त साउदी अरब और दुबई जैसे देशों में बिताया है. बांग्लादेश में कंपनी का कारोबार खड़ा करने में उनकी महती भूमिका मानी जाती है. मतलब यह कि उन्होंने अपने कामकाज के दौरान मुसलिम मुल्कों और वहां के लोगों को समझने में काफी वक्त बिताया होगा. संभवतः इसलिए उनके मन में मुसलिम समाज के प्रति उतनी नफरत नहीं है. जितनी आजकल आम हिंदुवादियों में दिखती है. इसी वजह से उन्होंने अपने इस ऐड कैंपेन के जरिये सांप्रदायिकता पर चोट करने की कोशिश की होगी. वह भी ऐन चुनाव के वक्त, जब हर तरफ से नफरत का वातावरण तैयार करने की कोशिश की जा रही है.

अब जरा तार्किक रूप से विचार कीजिये, आखिर इस कैंपेन में क्या बुराई है?  क्या यह भारतीय समाज और यहां की परंपरा को प्रतिध्वनित नहीं करता है? बचपन से ही हम ऐसे लोगों को देखते आये हैं, जो दूसरों की धार्मिक भावनाओं का ध्यान रखते हुए अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं. ऐसे में अगर वह बच्ची चाहती है कि उसके दोस्त पर कोई नमाज से पहले रंग न डाले तो इसमें गलत क्या है?

मुझे अबू फरहान छोटू याद आ गये. महज दो दिन पुरानी बात है. हमलोग इलेक्शन रिपोर्टिंग के दौरान किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड गये हुए थे. पहुंचते-पहुंचते शाम हो गयी और रिपोर्टिंग करते-करते रात. वहां से अररिया 50 किमी ही दूर था. हम लौट सकते थे, मगर मेरी कई सनकों में एक सनक यह भी है कि जब भी मौका मिले किसी गांव में ठहरूं, वहां के माहौल को समझूं.

स्थानीय पत्रकार अबू फरहान छोटू

उस रिपोर्टिंग के दौरान वहां के खबर सीमांचल के साथी और स्थानीय पत्रकार अबू फरहान छोटू और राजा मुराद हमारे साथ थे. जो लोग उस इलाके में जाते-आते रहते हैं उन्हें मालूम है कि उस इलाके में हिंदुओं की आबादी बमुश्किल 10-15 फीसदी ही होगी. मगर जब हमने गांव में ठहरने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने हमारे लिए एक हिंदू राशन डीलर का घर ढूंढ निकाला. हालांकि मेरी और हमारे टीम के दूसरे लोगों की मंशा या इच्छा ऐसी कतई नहीं थी कि हम हिंदुओं के घर ही ठहरें या उन्हीं का खाना खायें. हमें मुसलिम परिवार में ठहरने की अधिक इच्छा थी, मगर छोटू जी ने अपने मन में ही तय कर लिया कि हमें वे किसी हिंदू परिवार में ही ठहरायेंगे. हमें तो बहुत बाद में पता चला कि हम जिस घर में ठहरे हैं वह हिंदुओं का है. जब छोटूजी ने हमारे ड्राइवर को यह कहते हुए खाने के लिए मनाया कि चिंता मत कीजिये शाकाहारियों का घर है.

अब यह समझ आता है कि छोटू जी ने अपने समाज की पारंपरिक सोच की वजह से यह फैसला लिया होगा. उन्हें लगा होगा कि हिंदुओं के घर ठहरकर हमें लगेगा कि हमारे धर्म भ्रष्ट होने का कोई खतरा नहीं है. यह हमारे समाज की सोच है. हम जितना ध्यान अपनी धार्मिक परंपराओं का करते हैं, दूसरों की मान्यताओं का भी उतना ही ख्याल रखते हैं.

चार मार्च की रात भी हमारे साथ ऐसा ही एक वाकया हो गया था. हमारी गाड़ी खराब हो गयी थी और हाइवे पर जहां यह घटना हुई वहां बगल में एक मसजिद और मदरसा था. हमें रात नौ बजे तक वहां रुकना पड़ा. साथ में उपमा और बच्चे भी थे. कई बार मदरसे से लोगों ने आकर हमसे पूछ-ताछ की, कोई दिक्कत तो नहीं. चाय-वाय भिजवायें क्या. उन्होंने भी यही ऑफर किया कि अगर हमें कोई दिक्कत हो तो वे हिंदुओं के घर की चाय और नास्ता भिजवा सकते हैं. हमें रात के वक्त दूसरी गाड़ी मिल गयी और हम लौट गये. मगर गाड़ी के साथ रुके ड्राइवर का ख्याल उन्होंने रात के बारह-एक बजे तक रखा.

यही असली हिंदुस्तानियत है, जिसे सर्फ एक्सल का विज्ञापन दिखा रहा है. मगर कुछ लोग इसे भूल जाना और मिटा देना चाहते हैं. वे धर्म को लेकर उसी तरह बर्बर हो जाना चाहते हैं जैसे तालिबानी हो गये हैं. जाहिर सी बात है उन्हें इस विज्ञापन का भाव समझ नहीं आयेगा. मुमकिन है यह विज्ञापन ऐसे लोगों के मन में गुस्सा भी पैदा करता होगा. ये लोग एक सहज परंपरा को मिटा कर मानेंगे.

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