‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ वाले देश में दो हजार में पा सकते हैं ‘इज्जत लुटा चुकी’ बेटी से छुटकारा

आज मानवाधिकार दिवस है, मगर यह दिवस इस देश की औरतों के लिए सिर्फ कागजी है. उनका कोई अपना मानवाधिकार नहीं है. तभी तो कोई भी बाप कथित ‘इज्जत लुटा चुकी, अपनी बेटी से महज दो हजार में छुटकारा पा सकता है. इस देश में जहां कई जरूरी मसलों पर दिन-रात बहस चलती है, बिहार की इस घटना पर कहीं कोई बहस नहीं है. नारीवादी बहस का भी यह हिस्सा नहीं बन पाया है. हम शुक्रगुजार हैं लेखक-पत्रकार अणुशक्ति सिंह का जिन्होंने इस मसले पर एक विचारोत्तेजक आलेख लिखा है. आप भी पढ़ें…

अणुशक्ति सिंह

कल-परसों न्यूज़लांड्री का एक सर्वे दिखा था. सर्वे देश के दो अग्रणी मीडिया चैनल जी न्यूज़ और आजतक पर प्रसारित हों वाले दो महत्वपूर्ण प्रोग्राम के बारे में था. इन दोनों कार्यक्रमों में एंकर ऐसे पेश आते हैं जैसे उनसे ज़रूरी मुद्दे पर बात देश भर में कोई नहीं कर रहा. रपट के अनुसार, विगत सात दिनों में इन कार्यक्रमों में मूल बहस का मुद्दा मंदिर, मस्जिद, जनेऊ और मुज़रा थे. गौर से देखें तो सिर्फ ये दो कार्यक्रम ही नहीं, लगभग तमाम ख़बरें कुछ उथले मुद्दों के आसपास ही घूमतीं हैं. कल-परसों न्यूज़लांड्री का एक सर्वे दिखा था. सर्वे देश के दो अग्रणी मीडिया चैनल जी न्यूज़ और आजतक पर प्रसारित हों वाले दो महत्वपूर्ण प्रोग्राम के बारे में था. इन दोनों कार्यक्रमों में एंकर ऐसे पेश आते हैं जैसे उनसे ज़रूरी मुद्दे पर बात देश भर में कोई नहीं कर रहा. रपट के अनुसार, विगत सात दिनों में इन कार्यक्रमों में मूल बहस का मुद्दा मंदिर, मस्जिद, जनेऊ और मुज़रा थे. गौर से देखें तो सिर्फ ये दो कार्यक्रम ही नहीं, लगभग तमाम ख़बरें कुछ उथले मुद्दों के आसपास ही घूमतीं हैं.

लेखक-पत्रकार अणुशक्ति सिंह

 

स्मृति से लगभग उतार दिया गया विपक्ष के एक नेता बोलते-बोलते बहक जाते हैं, सत्ता पक्ष इस बहकने पर भावुक हो जाता है और ख़बरिया लोगों को दो दिन का मसाला मिल जाता है. उसी समय पर सोशल मीडिया किसी और मुद्दे पर बहस कर रहा होता है. यह मुद्दा राजस्थान में एक विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे धर्म के मजदूर की वीभत्स हत्या से जुड़ा होता. बिला शक सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन रहा मुद्दा अति गंभीर था, पर इसी दौरान एक और हत्या हुई थी. बिहार के जहानाबाद जिले में पिता के द्वारा गर्भवती पुत्री की भाड़े के हत्यारों के ज़रिये हत्या करवायी गयी, मगर एक अखबार के अंदरूनी पन्नों के अलावा इस ख़बर को कहीं कोई जगह नहीं मिल पायी.स्मृति से लगभग उतार दिये गये विपक्ष के एक नेता बोलते-बोलते बहक जाते हैं, सत्ता पक्ष इस बहकने पर भावुक हो जाता है और ख़बरिया लोगों को दो दिन का मसाला मिल जाता है. उसी समय पर सोशल मीडिया किसी और मुद्दे पर बहस कर रहा होता है. यह मुद्दा राजस्थान में एक विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे धर्म के मजदूर की वीभत्स हत्या से जुड़ा था. बिला शक सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन रहा यह मुद्दा अति गंभीर था, पर इसी दौरान एक और हत्या हुई थी. बिहार के जहानाबाद जिले में पिता के द्वारा गर्भवती पुत्री की भाड़े के हत्यारों के ज़रिये हत्या करवायी गयी, मगर एक अखबार के अंदरूनी पन्नों के अलावा इस ख़बर को कहीं कोई जगह नहीं मिल पायी.

मसला यह था कि जहानाबाद जिले के कड़ौना थाने के मोकर गांव निवासी शंकर सिंह अपनी बेटी पल्लवी कुमारी के एक युवक के साथ प्यार से नाखुश थे. उन्होंने एक दिसंबर को कमलेश नामक व्यक्ति से संपर्क किया. कमलेश नामक व्यक्ति शंकर को मजदूरों की सप्लाई करता था.

शंकर ने कमलेश को बताया था कि एक लड़के से उसकी बेटी का प्रेम प्रसंग है और उसकी बेटी 8  महीने की गर्भवती भी है. इस कारण पूरे इलाके में उसकी बदनामी हो रही है. इसी वजह से उसने बेटी की हत्या की साजिश रची। उसके कहने पर रस्सी से पल्लवी का गला घोट दिया. फिर प्लास्टिक बैग में बालू भर उसे रस्सी से ही बांध कर पुनपुन नदी में फेंक दिया. इसके एवज में हत्या करने वाले दो मजदूर कमलेश और टुनू नट को एक-एक हजार रुपये दिए गए थे.

इस हत्या का कोई विडियो फुटेज उपलब्ध नहीं था पर वीभत्सता में इसे किसी भी पायदान पर कम नहीं आँका जा सकता. हुआ दरअसल यूँ था कि उन्नीस साल की पल्लवी को किसी से प्यार था. उसके प्यार का प्रतीक चिन्ह आठ मास के गर्भ के तौर पर उसके पास था. अपने प्रेमी के साथ रहने के लिए उसने दो हफ्ते पहले घर भी छोड़ दिया था पर इज्ज़त के मारे घरवालों को न उसका अपने प्रेमी के साथ जाना रास आया, न ही उसका ज़िन्दा रहना. उसके अपने पिताजी ने दो भाड़े के मारने वालों बुलाया, हज़ार-हज़ार रूपये की रक़म अदा की और बेटी की हत्या का फ़रमान ज़ारी कर दिया.इस हत्या का कोई विडियो फुटेज उपलब्ध नहीं था पर वीभत्सता में इसे किसी भी पायदान पर कम नहीं आँका जा सकता. हुआ दरअसल यूँ था कि उन्नीस साल की पल्लवी को किसी से प्यार था. उसके प्यार का प्रतीक चिन्ह आठ मास के गर्भ के तौर पर उसके पास था. अपने प्रेमी के साथ रहने के लिए उसने दो हफ्ते पहले घर भी छोड़ दिया था पर इज्ज़त के मारे घरवालों को न उसका अपने प्रेमी के साथ जाना रास आया, न ही उसका ज़िन्दा रहना. उसके अपने पिताजी ने दो भाड़े के मारने वालों बुलाया, हज़ार-हज़ार रूपये की रक़म अदा की और बेटी की हत्या का फ़रमान ज़ारी कर दिया.

इस पूरे मुआमले को नज़दीक से देखने पर अन्दर तक कुछ सिहर जाता है. ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ वाले इस देश में लड़की की जान इतनी सस्ती क्यों है? इस देवी पूजक समाज में इज्ज़त के नाम पर बस दो हज़ार फेंको और लड़की को मौत के घाट उतार दो – बात का मर्म इतना सा है बस. यहाँ एक सवाल जो मेरे दिमाग में हद से कौंध रहा है, वह यह है कि अगर शिकार कोई लड़की नहीं होती तो क्या दलित समाज से आने वाले भाड़े के दोनों हत्यारे इतनी कम रकम में अपनी जान गिरवी पर रख देते? इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है कि समाज का कोई भी वर्ग क्यों न हो, उसे स्त्री की ज़िंदगी हमेशा ही बेकार नज़र आती है. यहाँ सताये हुए भी औरत को सता जाते हैं.

पल्लवी की हत्या कि ख़बर को देखने के बाद एक नज़र इस देश में हो रहे ऑनर किलिंग के की सांख्यिकी पर डालने का दिल करता है. ठीक एक साल पहले के स्टैट्स पर गहरी नज़र डालने पर पता चलता है कि सिर्फ २०१६ में हमारे इस तरह की हत्या के यहाँ तकरीबन दो सौ इक्यावन मुआमले दर्ज किये गए थे, और यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि इस तरह के कई केस घर की चाहरदीवारी से बाहर भी नहीं निकल पाए होंगे. अन्यथा, संख्या दो सौ इक्यावन से बहुत ज़्यादा होती.

यहाँ उपलब्ध सारे तथ्य बेचैन करने वाले हैं पर जो बात सबसे ज्यादा बेचैन करती है वह ‘चुप्पी’ है. उन लोगों की चुप्पी जिनके बात करने से शायद फर्क पड़े. राजस्थान, हरियाणा, बिहार, उत्तरप्रदेश जैसे तमाम राज्यों  में ऑनर किलिंग लगभग उतना ही गंभीर मुद्दा है जितना भ्रूण हत्या फिर न जाने क्यों इन हत्याओं पर देशव्यापी सवाल नहीं उठते… क्या इसे इज्ज़त की नाक ढ़ोने वाले समाज का भगोड़ापन न माना जाए?

इस पूरे मुआमले को नज़दीक से देखने पर अन्दर तक कुछ सिहर जाता है. ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ वाले इस देश में लड़की की जान इतनी सस्ती क्यों है? इस देवी पूजक समाज में इज्ज़त के नाम पर बस दो हज़ार फेंको और लड़की को मौत के घाट उतार दो – बात का मर्म इतना सा है बस. यहाँ एक सवाल जो मेरे दिमाग में हद से ज़्यादा कौंध रहा है, वह यह है कि अगर शिकार कोई लड़की नहीं होती तो क्या दलित समाज से आने वाले भाड़े के दोनों हत्यारे इतनी कम रकम में अपनी जान गिरवी पर रख देते? इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है कि समाज का कोई भी वर्ग क्यों न हो, उसे स्त्री की ज़िंदगी हमेशा ही बेकार नज़र आती है. यहाँ सताये हुए भी औरत को सता जाते हैं.

पल्लवी की हत्या की ख़बर को देखने के बाद एक नज़र इस देश में हो रहे ऑनर किलिंग की सांख्यिकी पर डालना ज़रूरी हो जाता है. ठीक एक साल पहले के स्टैट्स को देखें तो पता चलता है कि सिर्फ २०१६ में हमारे यहाँ इस तरह की हत्या के तकरीबन दो सौ इक्यावन मुआमले दर्ज किये गए थे, और यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि इस तरह के कई केस घर की चाहरदीवारी से बाहर भी नहीं निकल पाए होंगे. अन्यथा, संख्या दो सौ इक्यावन से बहुत ज़्यादा होती.

यहाँ उपलब्ध सारे तथ्य बेचैन करने वाले हैं पर जो बात सबसे ज्यादा बेचैन करती है वह ‘चुप्पी’ है. उन लोगों की चुप्पी जिनके बात करने से शायद फर्क पड़े. राजस्थान, हरियाणा, बिहार, उत्तरप्रदेश जैसे तमाम राज्यों में ऑनर किलिंग लगभग उतना ही गंभीर मुद्दा है जितना भ्रूण हत्या फिर न जाने क्यों इन हत्याओं पर देशव्यापी सवाल नहीं उठते… क्या इसे इज्ज़त की नाक ढ़ोने वाले समाज का भगोड़ापन न माना जाए?

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