‘मैंने राजकमल को कभी बेहोश नहीं देखा’

आज हिंदी-मैथिली के सबसे चर्चित-विवादित-तीखे विषैले-बदनाम कवि-कथाकार राजकमल चौधरी का जन्म दिन है. इस मौके पर हम आपके लिए लेकर आये हैं उनके बारे में उनके छोटे भाई मित्रेश्वर अग्निमित्र का यह आलेख, जो झारखंड के घाटशिला कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हुए रिटायर हुए हैं और वहीं रहते हैं. वे खुद एक प्रतिष्ठित कवि हैं. अब तक राजकमल के जीवन पर कई लोगों ने लिखा, मगर उनके अपने परिवार की ओर से, एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में उनकी रचना, उनके जीवन, उनके बारे में उड़ती अफवाहों के बारे में बिल्कुल बेबाक रूप से लिखा गया यह संभवतः पहला आलेख है.

उन्हें राजकमल चौधरी के साथ उनके आखिरी तीन वर्षों में रहने और उनकी मृत्यु के बाद उन्हें मुखाग्नि देने का अवसर प्राप्त हुआ है. अपने इस आलेख में वे एक बडा ही मौजू सवाल उठाते हैं, कि महज दस साल में चार हजार से अधिक मुद्रित पन्ने लिख डालने वाला व्यक्ति क्या शराबी, औरतबाज और गैर अनुशासित हो सकता है. और भी कई दिलचस्प और अनुछुई जानकारियों से भरा है यह आलेख. और सबसे कमाल है इस आलेख की भाषा शैली जो आपको बार-बार राजकमल चौधरी की याद दिलायेगी. पढ़ें…

मित्रेश्वर अग्निमित्र

रिटायर्ड प्रोफेसर मित्रेश्वर अग्निमित्र एक प्रतिष्ठित कवि हैं

एक था राजकमल. वह नाम उसने खुद तय किया था. उसने खुद अपनी आकृति और भाषा तय की थी. राजकमल चौधरी बनने से पूर्व वह फूल बाबू था, अपनी मां का नुनू था, स्कूल में मणीन्द्र था और यह सब उसे पसंद नहीं था. तभी उसने एक-एक कर कई नाम तय किये. मणीन्द्र, मणीन्द्र मधुसूदन दास, मणीन्द्र राजकमल, राजकमल और आखीर में राजकमल चौधरी.

बात मानिये, उसने अपनी सारी हरकतें, सारी दिनचर्या, सारे लबादे और आवरण खुद तय किये. लुंगी, मफलर, बुशर्ट और ओवर साइज कमीजें. कभी दाढ़ी, कभी क्लीनशेव्ड. कभी मेटल का फ्रेम और अक्सर लाइब्रेरी फ्रेम का चश्मा. इसी तरह उसमें अपना कथ्य तलाशा, शैली तराशी, राह तय की और अपनी जुबान और कलम लिये लाम पर चले गये.

मोरचे पर ही उसने आखिरी सांस ली. 19 जून की उस रात राजेंद्र सर्जिकल वार्ड के चिकित्सक हैरान थे, कलाई में पल्स नहीं मिलता था, फेफड़े की मालिश चालू थी. लेकिन राजकमल चीख रहे थे. पीएमसीएच की लापरवाही के खिलाफ. ऐतराज कर रहे थे कि पीएमसीएच में सेलाइन टांगने का ऊंचा स्टैंड नहीं है. डॉक्टर हैरान था कि जान जा चुकी है, फिर भी कोई बेहोशी नहीं है.

विरोधाभास राजकमल का चरित्र था. धर्म औऱ परंपरा की बखिया उधेड़ता हुआ लेकिन उग्रतारा का वैसा पुजारी और कहीं नहीं दिखा. निशा पूजा की हिम्मत किस चौधरी को कब हुई थी. जड़ता और परंपराओं को चुनौती देता हुआ वह एक सौ फीसदी अनुशासित पुत्र था. एक जिम्मेदार भाइजी था. और पारिवारिक आदर्शों के लिए समर्पित एक सदस्य था. ताज्जुब यह है कि इसने खुद अपने बारे में लगातार झूठ फैलाया. भ्रांतियां बनाई और एकदम आधारहीन किस्से फैलाये. खुद के विषय में, अपने जन्मस्थान के विषय में, पारिवारिक रिश्तों के विषय में, अपनी आदतों और रुचियों के विषय में.

मैं उनके आखिरी वर्षों में उनके साथ था. 1964 से 1967 तक. इन दिनों उनकी दिनचर्या का गवाह हूं, यही वे दिन थे, जब राजकमल मुक्त हो चुके थे. अपनी राह चलने के लिए, अपनी शैली अपना कथन, अपना इरादा, सबकुछ राजकमल जैसा. राजेंद्र सर्जिकल वार्ड में लगातार और महीनों तक बेड पर लेटे भाईजी और स्टूल पर बैठा मैं. यह हर रात की तसवीर थी. उन्हें इन सारी बातों से ऐतराज था. मेरी तकलीफ से, पढ़ाई में होते डिस्टर्बेंस से. हाथ और पांव में लगातार लगी हुई सूइयों से, कमर में बंधे ट्यूब से. नाक से दिये जाने वाले लिक्विड से. उन्हें उन दिनों हर बात का ऐतराज था. अस्पताल और पूरी व्यवस्था से.

लेकिन वे कहते थे, सौ फीसदी होश में रहे बिना तुम लड़ नहीं सकते. और जब वे होश की बात करते थे, तब मैं जानता था कि वे प्रत्येक व्यक्ति की बेहोशी को समझते हैं. मान्यताओं की बेहोशी, जात-धर्म-भाषा-कुल-गोत्र-मूल की बेहोशी. वह बेहोशी जिसमें बर्दास्त होता है ऐसा लोकतंत्र, ऐसी अर्थनीति और ऐसे संस्कार. वे मानते थे कि कलम अगर बेहोश रहेगी तो वह जड़ता पैदा करेगी. जंग में लगी कलम को होश में रहना ही पड़ेगा.

कंकावती, मुक्ति प्रसंग और दास कविता के रचनाकार का मैं सहचर रहा हूं. जब वे बड़ी तेजी से लिख रहे थे. बहुत तेजी से. जब मौत दरवाजे पर खड़ी थी और लिखना उन्हें बहुत जरूरी था, इसलिए वे कभी अपनी रचना को रिवाइज नहीं कर पाये. कोई कट-कुट भी नहीं. एक और बात कहूं, यह जंग सिर्फ व्यवस्था के खिलाफ नहीं थी, लिखने की जरूरत, रोटी के लिए जरूरी थी. रोटी उनके लिए बड़ी समस्या रही. कई शामें याद हैं, जब रोटी की थाली रहती थी लेकिन दाल या सब्जी की कटोरी गैरहाजिर रहती थी. लेकिन भौजी के पास नून-तेल और लाल-मिर्च का अजस्र भंडार था. जो कभी खतम ही नहीं हुआ. कोई ऐसी रात नहीं बीती, जिसमें हम भूखे सोये हों.

कामायनी, सैदपुर पटना-4 के दो कमरे अभावों से भरे रहते थे. लेकिन एक टेबल थी, एक कुरसी थी, उस पर एक कलम और प्रेस से काट कर लाये गये, कई जिस्ते कागज होते थे. इसी टेबल पर राजकमल अपनी रोटी उपजाते थे. खाते थे, और पूरी मजबूती से, हवा-पानी-मिट्टी की बरबादी के खिलाफ लड़ते थे.
मुझे कई दिन याद हैं, जब मेरे दोस्तों से उन्होंने हरकारे का काम लिया. यह कहानी फलां जगह दे आओ, एक कविता उसे और जरा अमुक के पास चले जाना, पैसे की सख्त जरूरत है, लेकर ही लौटना. अभी चांदपुरा वाली आयेगी और चायपत्ती खत्म होने का ऐलान करेगी. जल्दी जाओ. ऐसे दृश्य अक्सर होते थे. और कई बार जब कहीं से पैसे आते थे, तो उस दिन वही भाइजी, बादशाह बन जाता था. शाह खर्च और उदार. ऐसे व्यक्ति के बारे में जब इससे विपरीत बातें सुनाई पड़ती थीं तो ताज्जुब होता था. वे किसी अमर्यादित, किसी उद्दंड, किसी शराबी, किसी बदचलन के बारे में लिखते थे और उसका नाम बताते थे राजकमल चौधरी. मुझे उस राजकमल चौधरी से कभी मुलाकात नहीं हुई.

मैंने जब देखा एक मर्यादित, अनुशासित, फौलादी चरित्र वाला राजकमल, जो बहुत केयरिंग था. बहुत लविंग था, बहुत प्रोटेक्टिव था. वह हमारा भाइजी था, उसे अपनी जिम्मेदारियां मालूम थीं. फिर भी वह खुद अपने बारे में झूठ बोलता था. प्रपंच रचता था. मुझे याद है, कि अक्सर जब मां, धीर भैया के लिए रात को आंगन का दरवाजा खोलती थी तो भाइजी मां पर गुस्सा होते थे और कहते थे, घर में कोई गलत आदत बरदास्त नहीं की जानी चाहिए. इसी प्रकार सुधीर भैया, जब द्विरागमन कर बभनगामा वाली को ले आये, जबकि मधुबनी वाली अपनी संतानों के साथ जीवित थी, उसी शाम राजकमल चौधरी ने अपना चूल्हा-चौकी अलग कर लिया. इस तरह की कोई आजादी वे अपने छोटे भाई के लिए नहीं दे सकते थे.

राजकमल चौधरी की एक दुर्लभ पांडुलिपी

परंपरा भंजक राजकमल ने हर बार परिवार के गौरव की फिक्र की. उग्रतारा मंदिर उनके परिवार की बपौती है, यह सच वे कभी भूल नहीं पाये. उनकी हिदायत रहती थी कि महानवमी के दिन पूरा परिवार मंदिर के भीतर हाजिर हो, एक सी धोती में और पूरी गरिमा के साथ. एक बार पिता ने उन पर ब्रह्मास्त्र चला दिया कि अब तुम भी पिता हो गये हो. अपने पुत्र को कैसा बनाना चाहोगे, मेरे जैसा या खुद के जैसा तो वे चुप लगा गये थे. अर्थात, राजकमल विरोधाभास का मूर्तमान रूप थे. और इस कहानीकार, कवि, समीक्षक, अनुवादक को एक नाम देना आसान नहीं.

पटना सचिवालय में एक क्लर्क के रूप में जीवन शुरू कर वे अचानक अपनी नयी राह पर चल पड़े. इस अवधि में कुछ वर्ष लापता रहे. पता नहीं कहां. शायद बर्मा में, शायद हिमालय की घाटियों में, शायद मसूरी में. इसी अज्ञातवास में उन्होंने मणिन्द्र नारायण चौधरी को राजकमल चौधरी में रूपांतरित कर दिया. कई शहरों से अनुभवों बटोरते वे पटना आ गये. कुछ अखबारों में नौकरी की, लेकिन राजकमल एक बादशाह का नाम है. वह नौकरी नहीं कर सकता था. उसने कभी किसी की नौकरी नहीं की.

राजकमल की एक आदत थी. चौंकाने की. जब औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष परवान चढ़ रहा था. तब वे आये थे. शायद सही वक्त के दो सौ वर्ष पहले. जब वयस्क हुए तब हिंदुस्तान में तिरंगा लहरा रहा था. तब वे स्कूल में थे. परंपरावादी मैथिल ब्राह्मण परिवार में पंडित मधुसूदन चौधरी के बेटे को बेस्ट पॉसिबल पढ़ाई दी गयी. टेनिस खेलते हुए फूल बाबू की तसवीर उनके पिता को बेहद पसंद थी. जयनगर राज के कोर्ट पर बैडमिंटन खेलता हुआ फूल बाबू मधुसूदन चौधरी को बहुत भाता था. उन्होंने खुद अंगरेजी पढ़ाई, संस्कृत पढ़ाई, अमरकोश को मुखस्थ कराया.

घर में बौद्धिक बहस का वातावरण था. हर शाम किसी खास मुद्दे पर बहस होती थी. पांच-सात लोग विमर्श करते थे. सामाजिक-सांस्कृति-धार्मिक अथवा समाजवाद, साम्यवाद मिक्स्ड इकॉनमी कोई भी मुद्दा. शैशव औऱ कैशोर्य की इसी अवस्था में राजकमल का आधार तैयार हुआ. भागलपुर में इंटर औऱ गया में डिग्री की पढ़ाई, नवादा में रहने का ठिकाना. इन्हीं पांच वर्षों में फूल बाबू ने लोकतंत्र के वीभत्स रूप को देखा और वह बल और साहस इकट्ठा किया जो प्रतिरोध और प्रतिकार के लिए जरूरी होता है. इसी दौरान उन्होंने आमजन का डर देखा. पाखंड और चरित्रहीनता देखी. एक हॉकी स्टिक सैकड़ों की भीड़ को किस प्रकार तितर-बितर कर देती है, यह देखकर उन्हें तकलीफ होती थी.

उन्हें यह देखकर बुरा लगता था कि चौक पर हॉकी स्टिक लिये हुए फूल बाबू अगर खड़ा हो जाये तो नवादा का बाजार बंद हो जाता था. और पाकेट में एक छुरा होने की आशंका किसी इंविजिलेटर को हिम्मत नहीं देती थी कि वह फूल बाबू को एक्सपेल कर सके. लोगों का यह डर राजकमल को आजीवन तबाह करता रहा. वे जानते थे कि कायर, बेहोश और आलसी आदमी की दुनिया नहीं बना सकते और राजकमल आदमी की दुनिया चाहते थे. इसके लिए वे जिये और मरे.

अपनी पत्नी शशिकांता चौधरी के साथ राजकमल. शशिकांता जी भी अब स्वर्गीय हो गयी हैं.

लिखना-शुरू किया जब वे इंटरमीडियेट में थे. मैथिली में लिखा. और फिर हिंदी में. अंगरेजी और बांग्ला में भी लिखा. और अलग-अलग तरीके से, लेकिन बात एक ही कही. उन्हें लोकतंत्र की तानाशाही का विकराल बोझ ढोता हुआ भारत का एक नागरिक राजकमल चौधरी की दिशा तय करनी थी. तय करना था, कि जहरीले मवाद और रक्त मिश्रित पेशाब की गंध से अर्थात लोकतंत्र से और राशन कार्डों से अपने बच्चों और विधवाओं को कैसे मुक्ति दे पाऊं. यह छटपटाहट आजन्म उनके साथ रही. अपना सफर तय करने में उन्होंने ज्यादा वक्त नहीं लगाया. शायद उन्हें विदित था, कि उनके पास वक्त कम है. और स्वीकृत कार्य करना आसान नहीं. उन्होंने 1964-65 के दिनों में ही अपनी आखिरी बातें तय कीं. और कहा, कि मैं जनता के पास चले जाने का वादा करता हूं. और कहा कि मेरी सही यात्रा वहीं से शुरू होगी.

दोस्तों के बहुत प्यारे राजकमल लगभग अकेले जिये. सबके लिए जिये. मगर रहे अकेले. अतीत को जाना, भविष्य की परवाह की. मगर रहे केवल वर्तमान में. उन्होंने खुद कहा था कि मैं अपने अतीत में राजकमल चौधरी नहीं था. और कहा था कि भविष्य में यह प्रश्नवाचक व्यक्ति और इस व्यक्ति की उत्तर क्रियाएं बने रहना मेरे लिए संभव नहीं है. क्योंकि केवल अपने वर्तमान में मैं जीवित रहता हूं. यह बात वे सच कहते थे. कभी अतीत से अभिभूत नहीं हुए और कभी भविष्य के लिए भयभीत भी नहीं. जिजीविषा और मुमुक्षा उनके लिए सचमुच समानधर्मा शब्द थे. उन्होंने वजह भी बताई थी, के जीवित ही नहीं मुक्त और स्वाधीन भी रहना होगा.

मुक्त और स्वाधीन रहने के लिए राजकमल जिये और उसी मुक्ति के लिए चले गये. चौंकाना उनकी आदत थी और किसी को चौंका देना उन्हें मजा देता था. शायद इसी लिये वे खुद अपने और अपने परिवार के लिए भ्रांतियां बनाते थे. उसे फैलाते थे. और मजा लेते थे. जबकि उनका लक्ष्य और उनके विचार कभी उनकी नजरों से ओझल नहीं हो सका. उनके चले जाने की वजह और पृष्ठभूमि उन्होंने खुद बयान की है.

मुक्ति प्रसंग में लिक्खा कि लोकतांत्रित पद्धतियां उसे झुका देती हैं, धीरे-धीरे अपहाजि, धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए, उसे शिष्ट राजभक्त, देशप्रेमी नागरिक बना लेती है. और कहा था, आदमी को इस लोकतंत्री संसार से अलग हो जाना चाहिए. और इसके तुरत बाद ऐलान किया था, कि हमलोगों को अब शामिल नहीं रहना है इस धरती से आदमी को हमेशा के लिए खत्म कर देने की साजिश में.

जब राजकमल के लिए दुर्वह हो गया चलना, तब उन्होंने देह का त्याग कर दिया. और वो चले गये. एक था राजकमल और अब वह नहीं है. राजकमल जो जन्मजात मुक्त था, उसकी अपनी लड़ाई थी. किसी शिविर से अलग, किसी खेमे से अलग, किसी मठ से अलग. वह शिष्य नहीं था, वह ध्वजाधारी और मशालची था. वह अनुयायी नहीं था, प्रवर्तक था. और अपनी लड़ाई खुद लड़ता था. इसीलिए उन दिनों के सारे मठाधीश, सारे शक्तिपीठ, सारे महंत उनके विरोधी थे. ऐसे राजकमल का छपना आसान नहीं था, लेकिन इसको रोकना भी किसी के लिए मुमकिन नहीं हुआ. यह इत्तेफाक नहीं है, के राजकमल की बहुत सारी रचनाएं उसकी मौत के बाद छप सकीं.

राजकमल एक निरंतर संघर्ष का नाम है. हिंदी साहित्य में जितनी कथाओं-अफवाहों और गॉशिप का नायक राजकमल है उतना और कोई नहीं. जितना इसकी किताबों पर लिखा गया, उससे ज्यादा बातें इस नायक के विषय में कही गयीं. और बेपरवाह लिखता गया. सहसा विश्वास नहीं होता कि 1957 से 1967 दस साल की काल अवधि इसी में बीमारी, ऑपरेशन के चक्कर, दाल रोटी का सवाल और इसी अवधि में 4000 पृष्ठों से ज्यादा मुद्रित सामग्री और लगातार सारी दुनिया की किताबें और पढ़ता हुआ राजकमल. इसमें कोई शक नहीं कि जितना वेल-रेड राजकमल था उतना बिरले ही होते हैं. लगातार किताब पढ़ता हुआ, लगातार लिखता हुआ, लगातार सबका ख्याल रखता हुआ. इस राजकमल को जब कोई बोतलों और औरतों का साथी चित्रित करता है तब उसकी नादानी और मूर्खता पर तरस आती है. मैंने, राजकमल के आखिरी तीन वर्षों को देखा है, और देखा है एक सौ फीसदी कर्मठ, एक्टिविस्ट को. इंटेलेक्चुएल को, ज्योतिर्धर को. अंधेर और अंधेरे के खिलाफ एक फौजी को.

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