ममता दीदी के बंगाल में लॉटरी एडिक्शन क्यों नहीं बनता चुनावी मुद्दा

पुष्यमित्र

ममता दीदी के बंगाल में जिस चीज ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा, वह थी लॉटरी. जिस किसी बाजार से होकर मैं गुजर रहा था, हर दस कदम पर एक लॉटरी का स्टॉल नजर आ जाता. और किसी भी स्टॉल पर चाहे वह बेंच पर ही टिकट रख कर क्यों न बेच रहा हो, चार लोग खड़े जरूर दिख रहे थे. अब चुकि मैं जिस इलाके से हूं, वहां के लिए यह दृश्य अकल्पनीय है. बिहार में हमने न जाने कब से खुलेआम लॉटरी बिकते नहीं देखा है. ऐसे में जाहिर सी बात है कि यह नजारा मेरे लिए चौंकाने वाला था.

दरअसल, मैं बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर जिले के उस इलाके से होकर गुजर रह था, जो बिहार के किशनगंज और बांग्लादेश की सीमा के बीच 18 किमी चौड़ी पट्टी है. किशनगंज में दोस्तों ने बताया कि यहां से बांग्लादेश की सीमा महज 15-20 किमी दूर है तो मैं वहां जाने से खुद को रोक नहीं पाया. एक स्थानीय युवक की बाइक पर निकल पड़ा. मगर बंगाल की सीमा में घुसते ही मुझे लगा कि न जाने मैं कहां पहुंच गया हूं. मुझे लॉटरी के इस कारोबार को समझना, बांग्लादेश की सीमा तक जाने से अधिक रोचक लगने लगा.

उत्तरी दिनाजपुर जिले की उस 18 किमी चौड़ी पट्टी के रास्ते में करीब दस-बार छोटे-बड़े बाजार मुझे मिले. हर बाजार में दस से अधिक लॉटरी के स्टॉल थे. कुछ स्टॉल बकायदा लॉटरी बेचने के लिए ही बनाये गये थे, तो कई जगह लोग बेंच पर ही लॉटरी के टिकट बिछा कर बेच रहे थे. पूछने पर मालूम हुआ कि इनमें से ज्यादातर टिकट नगालैंड स्टेट लॉटरी के हैं. मतलब यह कि नगालैंड की राज्य सरकार अपने विकास कार्यों के लिए अतिरिक्त फंड जुटाने के मकसद से खुद लॉटरी का कारोबार करती है.

ऑनलाइन रिसर्च करने पर मालूम हुआ कि लॉटरी का संचालन करने वाली सरकारों में नगालैंड की सरकार अकेली नहीं है. सिक्किम और मणिपुर की सरकारें भी लॉटरी के टिकट बेचती हैं. यहां तक कि इस कारोबार में वामपंथी दलों के नेतृत्व में बनी केरल सरकार भी शामिल है. भूटान की लॉटरी भी बिकती है. यह भी मालूम हुआ कि देश के 13 राज्यों में आज भी लॉटरी बैन नहीं है, यह पूरा कारोबार वहां कानूनी तरीके से संचालित होता है. यह लगभग 50 हजार करोड़ का कारोबार है और इससे सरकारों को 4000 करोड़ तक की आय होती है. मगर क्या यह कारोबार इतना जरूरी है कि लोगों को बदहाल करने की कीमत पर इसका संचालन राज्य सरकार करे?

बचपन से मेरे मन में यह बात बैठी थी कि लॉटरी भले एक या दो व्यक्ति को आबाद करे, ज्यादातर लोगों को यह बरबाद ही करती है. फिर सरकारें इस कारोबार को क्यों चलाती है?

इसी दुकानदार ने मुझसे कहा था कि लॉटरी बैन होना चाहिए.

इसी उधेड़बुन में डरते-डरते मैंने एक बड़े बाजार में एक लॉटरी स्टॉल के आसपास खड़े लोगों की तसवीर ली और इरादा किया कि उनसे बातचीत की जाये. मन में यह आशंका भी थी कि बिना पूछे फोटो लेने से लोग नाराज न हो जायें. अभी पिछले ही चौराहे पर एक समूह ने हमसे वीडियो डिलीट करवा दिया था, दरअसल मैंने एक दुकान पर बैठकर चुनावी चर्चा शुरू कर दी थी, और मेरे साथी ने उसका वीडियो बनाना शुरू कर दिया था. यह देखकर वे लोग भड़क उठे, कहा बिना पूछे क्यों रिकार्ड किया. उनका सवाल जायज था, मगर हम भी क्या करें. हमारा काम ही कुछ ऐसा है.

बहरहाल, उस लॉटरी स्टॉल वाले ने भी मुझसे पूछ ही लिया. फोटो क्यों लिया, लॉटरी बंद करवाना है क्या? इस पर मैंने कहा, भाई हम तो मीडिया वाले हैं, हम कौन होते हैं, बंद कराने वाला. हम तो बस इस कारोबार को समझना चाहते हैं. हमारे स्टेट में लॉटरी पर बैन है.

तो मीडिया में हाइलाइट करो. जैसे बिहार में बंद है, यहां भी बंद कराओ.

उस दुकानदार के जवाब से मैं हैरत में पड़ गया. – लेकिन आप तो दुकानदार हैं, आप क्यों लॉटरी बंद कराना चाहते हैं.

इसका जवाब पास खड़े एक दूसरे युवक ने दिया, यही तो समझो, यह लॉटरी बेचता है, तब भी चाहता है लॉटरी बैन हो जाये. काहे कि जब तक लॉटरी चलता रहेगा, यह भी लॉटरी बेचता रहेगा. लॉटरी भी दारू और स्मैक की तरह एक नशा है. जब तक मिलेगा लोग बेचेगा और खरीदेगा, इस उम्मीद में कि किसी रोज किसी को जैकपॉट फंस जायेगा और किस्मत बदल जायेगा.

वहां खड़े कई लोग ऐसी ही बातें करने लगे.

लब्बोलुआब यह था कि यहां लोग रोज हजारों की संख्या में लॉटरी खरीदते हैं, मगर इस पूरे इलाके में किसी का पांच सौ या हजार से अधिक कमी प्राइज नहीं आया. कई-कई दिन तो गारंटी प्राइज भी नहीं निकलता. पूरा इलाका लॉटरी के चक्कर में कंगाल हो गया है, शाम के टाइम आओ. ऐसा कई आदमी मिलेगा, जो लॉटरी के चक्कर में जमीन-जायदाद बेच चुका है. मालिक से मजदूर हो गया है, फिर भी रोज लॉटरी खरीदता है कि किसी रोज किस्मत पलटेगा.

खाली खरीदने वाले को लॉटरी का नशा नहीं होता, बेचने वाला भी परेशान है. जब तक किसी को प्राइज नहीं मिलेगा, उसका फायदा नहीं होगा. कमीशन तो इतना कम होता है कि उससे चाय-पानी का खर्चा भी नहीं निकलता है. यहां लॉटरी भी बंद होना चाहिए, दारू भी. दोनों बराबर नशा है.

वे लोग लगातार बोल रहे थे, मैं उनका चेहरा देख रहा था. मुझे वे लोग ऐसे लग रहे थे कि किसी नशे की गिरफ्त में हों और चाहते हों कि कोई उन्हें इस ट्रैप से बाहर निकाले.

मैंने पूछा कि क्या इस इलेक्शन में आपलोग कैंडीडेट से कहोगे कि जो लॉटरी बंद करायेगा, उसी को वोट देंगे? तो लोगों ने कहा, ये हमारा लोकल इश्यू है, दिल्ली का इलेक्शन लोकल इश्यू पर थोड़े होता है.

तो क्या इश्यू है.

इश्यू है कि मोदी सरकार खूब दंगा-फसाद करवा रहा है. उसको रोकना है.

और ममता दीदी?

ममता दीदी भी बहुत अच्छी नहीं है,  मगर अभी ठीक है.

और सीपीएम?

सीपीएम का टाइम खत्म हो गया. अब वह बीजेपी को रोक नहीं सकता.

वह मुस्लिम बहुत इलाका था, जाहिर सी बात है यही बातें होनी थी.

लेकिन, लॉटरी का कारोबार तो ममता दीदी करवा रही है. उनसे क्यों नहीं कहते लॉटरी बंद कराये.

हां, यह पॉलिसी ठीक नहीं है. जब स्टेट का चुनाव होगा तो यह इश्यू उठेगा.

अभी क्यों नहीं…

अभी दूसरा इश्यू है. बीजेपी को रोकना है.

राजनीति के चक्कर में कैसे लोकल इश्यू का बंटाधार होता है, यह इसका सटीक उदाहरण था. हम आगे बढ़ गये.

मगर हर जगह ऐसी ही स्थिति नहीं थी. बांग्लादेश की सीमा पर बसे गांव में लोगों को इन दिनों खूब इनाम मिल रहे थे. पिछले तीन-चार महीने में किसी को 90 हजार का प्राइज मिला तो किसी को ढाई लाख का. दांगीपाड़ा के एक सुनार प्रदीप भांगी को तो 26 लाख का जैकपॉट फंसा था. हम ढूंढते-ढूंढते उस सुनार की दुकान पर पहुंचे. मालूम हुआ कि वह कई दिनों से दुकान पर नहीं आ रहा. एक पड़ोसी ने हंसते हुए कहा, पैसे का इंतजाम करने में बिजी है. उसी तरह 2.5 लाख इनाम जीतने वाले खाद दुकानदार की दुकान भी बंद थी. हां, नब्बे हजार का इनाम जीतने वाले दुकानदार शमीम अख्तर मिल गये. उसने कहा, बेटे ने टिकट कटा लिया था, नगालैंड स्टेट लॉटरी का टिकट था. टैक्स काटकर 70 हजार रुपये मिले हैं. वह शांत भाव से अपना कारोबार कर रहा था.

शमीम जिसे 90 हजार का इनाम मिला.

उस बाजार के लोगों ने कहा कि पहले यहां के लोग लॉटरी का टिकट नहीं खरीदते थे. मगर जब से यहां प्राइज मिलना शुरू हुआ है, यहां लॉटरी टिकट की बिक्री खूब बढ़ गयी है. छोटे-मोटे इनाम भी कई लोगों को मिले हैं.

लौटते वक्त मैं फिर उस बड़े बाजार के पास से गुजरा, जहां पहले राउंड में बातचीत की थी. वहां उसी दुकानदार को ढूंढकर कहा कि भाई बॉर्डर वाले इलाके में तो लोगों को खूब इनाम मिल रहा है. उसने कहा, पता है. लॉटरी वाले ऐसा ही करते हैं. जिस इलाके में बिक्री बढ़ानी होती है, वहां इनाम बांटते हैं. शुरुआत में यहां भी ऐसा ही किया था. जब बिक्री ठीक-ठाक हो जाती है तो इनाम देना बंद कर देते हैं. हम भी उसी बाजार में अपना एक स्टॉल शुरू करवा रहे हैं. यहां धंधा चलने वाला नहीं.

मैं अवाक होकर उसका मुंह देखने लगा.

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