भोजपुरी की टांग खींचना छोड़कर पहले हिंदी को राष्ट्रभाषा बनायें – सौरभ पांडेय

साहित्य को प्रचार का माध्यम बनाने से सपाट रचनाएं की जाने लगी. इससे जन-मानस पर साहित्य का प्रभाव कम हुआ है- ये बात प्रभा खेतान फाउंडेशन के आखर द्वारा आयोजित बातचीत कार्यक्रम में भोजपुरी के प्रसिद्ध लेखक सौरभ पांडेय ने कही. बातचीत युवा लेखक डॉ० जितेंद्र वर्मा ने की.

एक प्रश्न के उत्तर में सौरभ पाण्डेय ने कहा कि भोजपुरी में रचनाशीलता का प्रमाण सदी में गुरु गोरखनाथ से मिलता है. संत कबीर के बाद से भोजपुरी रचना की निरंतरता है. कार्यक्रम की शुरुआत में सौरभ पाण्डेय का परिचय देते हुए संचालक डॉ जितेंद्र वर्मा ने बताया कि वे मैनेजमेंट और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में कार्यरत रहकर भोजपुरी को समृद्ध बना रहे हैं. वे भोजपुरी और हिंदी दोनों में साहित्य सृजन कर रहें हैं.

भोजपुरी में ग़ज़ल लिखने के सवाल पर सौरभ ने कहा कि भोजपुरी तो काव्य भाषा है और इसका फैलाव में गीत की अहम भूमिका रही है. तो ग़ज़ल तो सामान्य रूप से ही भोजपुरी में आएगी ही. साथ ही हिंदी और स्थानीय भाषा के आपसी खींचतान पर इन्होंने कहा कि हिंदी के लिए लड़ने वालों को पहले हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पहल करनी चाहिए. जबकि हर व्यक्ति के मूल बोली में भाषा ही होती है, वो चाहे भोजपुरी हो, मैथिली हो, वज्जिका हो या अन्य भाषा.

इस अवसर पर उषाकिरण खान, प्रोफेसर ब्रजकिशोर, ह्रषिकेश सुलभ, सुशील कुमार भारद्वाज, सत्यम कुमार झा ने सौरभ से साहित्य से जुड़े प्रश्न किए.

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