भूतों के नाम पर लड़ रहे हैं ‘बिहार सरकार’ के पोते और गांव के लोग मजा ले रहे हैं

निराला जी बिहार-झारखंड की पत्रकारिता का ऐसा नाम हैं, जिन्हें परिचय की जरूरत नहीं है. खास कर बिहार के सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों पर उनकी गहरी पकड़ है. प्रभात खबर और तहलका जैसे मीडिया संस्थानों में छपने वाली उनकी रिपोर्ट से हम सब वाकिफ हैं. अब वे बिहार कवरेज के लिए नियमित रूप से बिदेसिया की डायरी लिखना शुरू कर रहे हैं. इस डायरी में वे उन किस्से कहानियों का जिक्र करेंगे, जो अलग-अलग इलाकों में घूमते हुए उनके संपर्क में आते हैं. उनकी मोहक भाषा का आनंद अलग से मिलेगा. आइये इस डायरी की पहली किस्त पढ़ते हैं…

बिदेसिया की डायरी

दो दिनों पहले गांव आये हैं. सब हाल ठीके-ठाक है. ठंड एकदम नहीं है तो लोग चिंतित है कि का मरजी है भगवानजी के. कुछ गड़बड़ी तो ना होलेवाला है कि सब मौसम के मिजाज बदलते जा रहा है. पिछली बार गांव आये थे तो दारू पर ज्यादा बातें हुई थी.पास के गावं में उदइया देखते-देखते दारू बेच के लखपति नहीं करोड़पति बन गया है, पहले स्कोर्पियो लिया, फिर एक और सफारी ले लिया है, इसी बात पर चर्चा होते रही थी. उसका पुलिस में कितना पकड़ है, वह कैसे सेटिंग कर के पूरे इलाके में दारू सप्लाई करता है, उसने कितने लड़कों को इसमें लगा रखा है, इसी पर सबसे ज्यादा बात चली थी. दारू पर बहस होवे तो आधे-आधे में बंट जाये लोग. कुछ कहे कि नीतीश ठीके किये हैं, 12 आना लोग तो छोड़ दिया न! कुछ कहे कि का बढ़ियां किये, हराहर तो डोर-टू-डोर मिलिये रहा है, बस माल चाहिए. बहस का नतीजा यही निकलता था कि महंगा होने के कारण पहले दो-दो बोतल में जिन्हें नशा नहीं होता था वे एकाध पैक में ही मतिया जा रहे हैं.

इस बार आने के बाद दारू पर चर्चा नहीं है. राजनीति पर भी ज्यादा बात नहीं है. गुजरात चुनाव पर थोड़ा थोड़ा बात हुआ एक बार. उ भी बहुत पेंचदार बात नहीं. सीधे-सीधे फ्लैट बातचीत कि का होगा उहां? अगर भाजपा हार गयी तो समझिये कि ओकर उलटी गिनती शुरू होगा, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस चांपे शुरू कर देगा. और अगर जीत गयी तो बिहार में अगिलका बेर नीतीशजी भूला जाये राजपाट. खेला खेलवायेगा. बस इतना ही बात. अभी खेती का सीजन पीक पर है न तो जादा से जादा बातचीत धान के रेट पर हो रहा है. कईसे बिगहा दर जा रहा है, किसका सोनम, बंगाल टाइगर, मसुरिया इस बार जलवा बिखेर रहा है, उसी पर बात हो रही है. ज्यादातर लोग दिन भर खेतों में रह रहे हैं. शाम को आ रहे हैं तो फिर थोड़े देर तक बैठकी, फिर थोड़े देर हरिकीर्तन-भजन और फिर या तो रात में खलिहार अगोरने के लिए निकल रहे हैं लोग या फिर सोने. जाड़े की रात है तो ज्यादा देर मजमा नहीं जम पा रहा. हां लेकिन जितने देर मजमा लग रहा है, उतने देर में आजकल कलिंदरा का विषय चरचे में है.

कलिंदरा बिहार सरकार का पोता है. हमारे गांव में एक यादवजी थे, उनका नाम बिहार सरकार यादव ही था. कोई 20 बरस पहले गुजर गये. रेलवे में गैंगमैन थे. उनके मरने के बाद बेटे में उनकी जगह नौकरी के लिए जंग छिड़ी, सब आपस में इस तरह से लड़ें कि किसी को नौकरी नहंी मिल सकी. बिहार सरकार के चार बेटे- करीमन, बिमल, बारूद और उमेश. करीमन के चार बेटे- कलिंदर, गोरख, बबवा,बबुआ. कलिंदर घर-घर से दूध लेने और फिर बाजार में बेचने का काम करता है. अब तो टीवीएस चैंप ले लिया है. कुछ साल से उसका कारोबार ठीक हो गया है. हर साल एकाध कठा जमीन भी खरीदता है गांव में. कलिंदर को लोग नजीर की तरह पेश करते थे कि देखो ना गाय रखा है, न भैंस, ना पूंजी लगाना पड़ा. बस गांव से दूध लेता है, बाजार में जा के खोवा मरवाता है, किलो में पांच दस कमाता है. बिना पूंजी, बिना झंझट पटपट के कमाई कर के छकछकी बनाये हुए है. लेकिन अभी कलिंदर के चर्चा दूसरा कारण से हो रहा है.

हुआ यह कि करीब एक साल पहले कलिंदर के घरवाली का तबियत खराब हुआ. अचानक बैठे-बैठे हिचकी आने लगा. फिर फरका भी मारने लगा. बेहोश होने लगी. शुरू में इलाज हुआ. आसपास के डाक्टर लोग से. कुछ सुनवाई नहीं हुआ. इसी बीच झाड़-फूंक भी हुआ. गांव में इस समय ओझई में सबसे ज्यादा टीआरपी अनिरूद्ध विश्वकर्मा का है, तो अनिरूद्ध ने ही देखा. अनिरूद्ध दस साल पहले तक पूरे इलाके के, जिलास्तरीय मिस्त्री हुआ करते थे. मिस्त्रियांव के हर काम के उस्ताद. डीजल, ट्रैक्टर, जेनरेटर से लेके, हर तरह के काम के उस्ताद. लोग एक-एक,दो-दो दिनों तक इंतजार करते थे अनिरूद्ध का, क्योंकि टाइम नहीं होता था. सुबह से गांव में मोटरसाइकिल आने लगते थे अनिरूद्ध को अपने यहां ले जाने के लिए.

लेकिन दस साल पहले अनिरूद्ध ने मिस्त्रियांव का काम छोड़ दिया. उमर भी जादा नहीं लेकिन वह बाबा बन गया. भगवा पहन लिया. भूत झारने लगा. अनिरूद्ध बाबा. भूत खेलवाता है, झारता है, ट्रांसफर भी करता है. फोन पर भी झारता है. तो अब उसके लिए लाइन लगता है. तो अनिरूद्ध ने ही सबसे पहले कलिंदर के घरवाली को देखा. सुनवाई नहीं हुई. इस बीच कलिंदर ने अपने घरवाली को बीएचयू अस्पताल में दिखाने का फैसला किया. बनारस ले गया. वहां भी मालूम चला कि कोई रोग नहीं. अब कलिंदर घर लौटा तो बड़े बाबाओं-गुणियों से संपर्क शुरू किया. झारखंड के हैदरनगर इलाका में, जो भूतों के लिए ही फेसम है, वहां से एक ओझाजी बुलाये गये. 12 हजार लिये. वे बोले कि वे सरकारी ओझा हैं, सरकार से मान्यता प्राप्त. सरकारी ओझा के कारण ही उनका जलवा भी है. उ ओझाजी से भी सुनवाई नहीं हुआ. तब तक एक ओझा के बारे में बताया गया कि 24 हजार फीस है, वह आयेगा तो बढ़ियां से बढ़ियां भूत का बोखार छोड़ा देता है.

वह आया. आते ही कहा कि तुम कहां परेशान हो. तुम्हारा भूत बिदेस का थोड़े है. तुम्हारा भाई जो है छोटावाला बाबाजीवा, उसी की घरवाली अपना वाला भेज दी है. ओझा के कहने पर बाबाजीवा और कलिंदर में लड़ाई शुरू. कलिंदर का 24 हजारवाला ओझा बाबाजीवा के यहां वापस भूत भेज देने का वादा और दावा दोनों किया. बाबाजीवा भी एक ओझा पकड़ के लाया है. वह भी महंगा ओझा ही है. अब दिन भर कलिंदर और बाबाजी में वाकयुद्ध हो रहा है और रात में दोनों की ओर से एक ही आंगनवाले घर में दोनों तरफ से ओझा लड़ रहे हैं. रोज नया नया हंड़िया-ढकना-कलशा आ रहा है.

गांव में फिलहाल यही बात है बात करने को. सुबह यही बात कि अभी किसके पास गया भूत. कौन ओझा ताकतवर निकला. ट्रांसफर किया कि नहीं. मजेदार यह है कि रात में दोनों ओझा टिडिंग-टिड़ांगवाला मंत्र पढ़ एक दूसरे से लड़ते हैं, दोनों एक दूसरे को चुनौती देते हैं, लगता है युद्ध हो रहा है और दिन होते ही दोनों गलबहियां कर साथ में खैनी ठोंकते हैं, गांजा फूंकते हैं. दोनों ओझा, दोनों भाइयों की अलग-अलग सेवा ले रहे हैं और पैसा भी. परिणाम निकलना बाकि है. गांव में जो करीब आधे दर्जन छोटे-छोटे ओझा गुणी हैं, वे भी रात को जल्दी से काम निपटाकर ओझई में स्टेफनी का काम करने वहां पहुंच जा रहे हैं.

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