‘भूख’ पर चुप्पी, ‘दुलार’ पर हंगामा, यह कैसी झारखंडी राजनीति है?

पाकुड़ में पिछले दिनों हुई चुंबन प्रतियोगिता की वजह से आज-कल झारखंड की राजनीति में उबाल आया हुआ है, विधानसभा तक में इससे जुड़े सवाल उठाये जा रहे हैं. जांच कमिटी तक बन गयी है. इसी झारखंड में जब पिछले दिनों एक बच्ची भात-भात कह कर मर गयी थी, तब किसी के खून में उबाल नहीं आया था. झारखंडी राजनीति की इसी विडंबना पर स्वतंत्र पत्रकार मनोरमा सिंह ने बड़ा मौजू सवाल उठाया है.

मनोरमा सिंह

17 साल का झारखंड विकास के तमाम दावों के बावजूद अपने लक्ष्य से काफी दूर है. वहां की हर सभा और सेमिनार का यह आदर्श जुमला है कि राज्य बनने का मकसद अभी भी अधूरा है और इस बात से सत्ता पक्ष-विपक्ष, एक्टिविस्ट, माओवादी, आवाम सभी समान रूप से सहमत हैं. अभी दो महीने पहले ही सिमडेगा की 11 साल की बच्ची भूख से तड़प कर मर गई, देश भर में खूब शोर हुआ, मगर झारखंडियों को यह किसी आम मसले जैसा ही लगा. मगर आज उसी झारखंड में आठ-दस विवाहित जोड़ों ने खुले में एक दूसरे को चूम क्या लिया, यह विधानसभा में बहस का मसला बन गया. संस्कृति बचाने का सवाल बन गया.

मनोरमा सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं, कई अखबारों और पोर्टलों के लिए लिखती हैं. वे बेंगलुरू में रहती हैं. उनका वास्ता बिहार के सीवान जिले से है और बेगूसराय में शुरुआती पढ़ाई की हैं. सोशल मीडिया पर वे अपने तीखे सवालों के लिए जानी जाती हैं.

दरअसल, नौ दिसंबर को झारखंड के पाकुड़ जिले के लिट्टीपारा प्रखंड के डुमरिया (तालपहाड़ी) गांव में झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक साइमन मरांडी ने सिदो-कान्हू मेले के दौरान ‘दुलार-चो’ नाम की प्रतियोगिता का आयोजन कराया था.  दुलार-चो का अर्थ होता है ‘प्यार का चुम्मा’. साइमन मरांडी के मुताबिक, आदिवासी समाज में बढ़ते तलाक़ के मामलों को रोकने और प्रेम का सार्वजनिक इजहार करके पति-पत्नी के रिश्ते को और मजबूत बनाने के इरादे से उन्होंने इस प्रतियोगिता का आयोजन कराया था. मेले से संबंधित बांटे गए पैंफलेट में इस आयोजन के बारे में विवरण था, गांव और आस-पास के इलाके के लोगों के साथ-साथ संबंधित सरकारी अधिकारियों को भी इसकी पहले से जानकारी दे दी गई थी. बावजूद इसके यह राजनीतिक मसला बन गया. जबकि स्थानीय आदिवासी समाज ने बहुत उत्साह के साथ इसमें भाग लिया,  साइमन मरांडी के अलावा झामुमो के एक और नेता स्टीफन मरांडी भी इस आयोजन में साथ थे.

देखा जाए तो ये विडबंना ही है कि आदिवासी सभ्यता, संस्कृति के जिस गौरवशाली पक्ष को बचाने व सहेजने के लिए आदिवासी समाज ने संघर्ष किया, उसी पहचान को बदलने और उसे मुख्यधारा की हिन्दु संस्कृति के रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है. आदिवासी समाज हमेशा से उन्मुक्त, स्वछंद और वर्जनाओं से मुक्त रहा है. उसे संकीर्णता के दायरों में बांधना दरअसल उसके मूलतत्वों को निकाल देने जैसा होगा. आदिवासी संस्कृति में युवक-युवतियों को अपना साथी खुद चुनने और घोटूल प्रथा के तहत लिव इन में रहने जैसे प्रगतिशील और उदार रिवाज हमेशा से रहे हैं. जो बहुत गर्व की बात है लेकिन त्रासदी ये है कि इन मूल्यों का विरोध भी आदिवासी नेता ही कर रहे हैं, जो इसी संस्कृति से आते हैं.

मामले में सबसे पहले झारखंड भाजपा के उपाध्यक्ष हेमलाल मुर्मु मुखर हुए फिर धीरे-धीरे मुख्यमंत्री समेत पूरी भाजपा, विधायकों से लेकर महिला मोर्चा तक. ताजा अपडेट के मुताबिक भाजपा विधानसभा के शीतकालीन सत्र में चुंबन प्रतियोगिता के मामले को प्रमुखता से उठाया है, दूसरी ओर झारखंड सरकार ने दो सदस्यीय पैनल का भी गठन कर दिया है, जो इस मामले की जांच सार्वजनिक स्थान पर अश्लीलता का प्रदर्शन करने के आधार पर करेगा. चिंता की बात ये भी है कि हिन्दू-मुसलमान की राजनीति के बाद इस मामले को हिन्दु-ईसाई रंग देने की भी कोशिश हो रही है.

भाजपा उपाध्य़क्ष हेमलाल मुर्मू की प्रतिक्रिया में ऐसे संकेतों को साफ पढ़ा जा सकता है, जब वे कहते हैं कि झामुमो विधायक संथाल परगना को रोम और यरुशलम बनाने पर तुले हैं. ईसाई मिशनरियों के इशारे पर आदिवासी संस्कृति के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं. गौरतलब है कि झारखंड की आदिवासी आबादी में एक बड़ी संख्या ईसाई आदिवासियों की भी है. ऐसे में सांस्कृतिक विभाजन करते आदिवासी के विरुद्ध आदिवासी को खड़ा कर देना एक खतरनाक शुरूआत हो सकती है. जबकि आदिवासी चाहे हिन्दू हो या ईसाई उनकी सांस्कृतिक पहचान एक है जो हर हाल में बरकरार रहनी चाहिए. और हिन्दू संस्कृति के नाम पर भी जो हल्ला मचा रहे हैं वो अपनी ही संस्कृति के खजुराहों और कोणार्क के मंदिरों से जुड़ती अपनी जड़ों को क्यों भूल जा रहे हैं, जो एक जोड़े के चुंबन से ध्वस्त हो जा रही है.

 

 

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One Thought to “‘भूख’ पर चुप्पी, ‘दुलार’ पर हंगामा, यह कैसी झारखंडी राजनीति है?”

  1. राकेश यादव

    मनोरमा सिंह जी आपकी लेखनी ने दिल को छू लिया