बेल्जियम के दिल मेें धड़कती गुमला की एक गुमनाम बस्ती

आरके नीरद

वह आज करीब 25 साल की है. नौकरी करती है. बेल्जियम का एक उपनगर उसके जीवन, नाम और पहचान से ठीक वैसे ही जुड़ा है, जैसे हमारे-आपके नाम-पहचान से हमारा-आपका गांव-शहर. नानी तेरी मोरनी को मोर ले गये… और … चंदा मामा दूर के, पुए पकाये गूड़ के…. जैसे गीत उसने भी अपनी भाषा, परिवेश और संस्कार के हिसाब से गाये-गुनगुनाये होंगे. संभव है, उसमें हमारे हिस्से वाले गीत के प्रतिमान, उपमान और उपमेय नहीं भी रहे हों, किंतु संवेदना वैसी ही रही होगी.

विश्व के नक्शे पर उसने कई देशों की रैखिक भाषा, वहां के इतिहास, जीवन शैली और आदर्शों को पढ़ा-जाना, मगर उसकी निगाहें जहां हर बार ठहरती हैं, वह है भारत. झारखंड शब्द उसे बेचैन करता है और वह उसके नक्शे में गुमला की एक गुमनाम-सी बस्ती को तलाशने लगती है.
उसने अब तक भारत नहीं देखा है. कभी भारत आयी नहीं. झारखंड और गुमला के बारे में उसकी कल्पना की बुनियाद बेल्जियम में देखे गये किसी गांव के अनुभव पर टिकी होती है. वह बार-बार बेचैन होती है और गुमला आना चाहती है. गुमला से करीब सौ किलोमीटर दूर, डुमरी ब्लॉक में, जंगलों से घिरा एक गांव है. उसका मन बार-बार उसी गांव को ओर भागता है. ऊपर से सब कुछ सामान्य, शांत है, मगर भीतर घना कोलाहल आैर गहरी निराशा है. इसका पता तब चलता है, जब उससे मिलने वाला कोई व्यक्ति उसे यह बताता है कि वह इंडिया (और उसमें भी झारखंड) से है.

दरअसल, इस लड़की की मां गुमला के इसी गांव में है, जिसे उसने कभी देखा नहीं. छूआ नहीं. उसके गालों-ललाटों को कभी सहलाया नहीं. मां ने उसके साथ ऐसा किया था या नहीं, उसे नहीं पता, क्योंकि तब उसकी उम्र यह सब जानने, समझने या ठीक-ठीक महसूस करने की थी ही नहीं. जब वह इसके लायक हुई, तब वह बेल्जियम में थी. एक बेहद संपन्न और आधुनिक ईसाई परिवार में. जहां फादर, मदर, ग्रैंड मदर, ग्रैंड फादर जैसे संबोधन पाने वाले इनसानों का पूरा समूह था. उस समूह में उसके लिए वह सब कुछ था, जो एक बच्चे के जीवन में सहज रूप में होता है. वह उसे ही अपनी पूरी कायनात जान कर इंच-इंच बड़ी होती गयी. तब न तो भारत के प्रति उसका आज जैसा खिंचाव था, न गुमला शब्द से उसके भीतर बेचैनी की आंधी पैदा होती थी, मगर एक दिन उसे इस सच का ज्ञान हो गया कि उसे जन्म देने वाली मां बेल्जियम में नहीं, गुमला में है.

सांकेतिक तस्वीर

अपनी इस मां के बारे में जानने की उसमें बड़ी बेचैनी है. वह उसे एक बार देखना, उसे छूना चाहती है. इस बेचैनी में उसने कोलकाता की उस मिशनरी से उस दस्तावेज की प्रति हासिल कर ली, जो यह बताता है कि वह कोलकाता के एक बेहद महंगे अस्पताल में पैदा हुई थी और इस मिशनरी के जरिये ही पैदा होने के थोड़े ही समय बाद वह बेल्जियम के एक दंपती को गोद दे दी गयी थी. उस दस्तावेज में उसकी मां का नाम, मां के गांव, प्रखंड और जिले का नाम दर्ज है. पिता के नाम का कोई जिक्र नहीं है और यह भी दर्ज नहीं है कि वह अपनी मां की कोख में आने वाली पहली संतान थी या दूसरी या तीसरी? मां ने उसे क्यों परदेशी को सौंप दिया, यह भी वह दस्तावेज नहीं बता पा रहा. बस एक गवाह का नाम है, जो गुमला के उसी गांव का है. उसकी मां और गवाह का सनरेम एक ही है.

इस दस्तावेज में उसकी मां तक खत पहुंचने लायक पूरा ठिकाना दर्ज है. वह इस ठिकाने पर अपनी मां को पत्र भेज सकती है. इसमें गुमला में काम करने वाली संस्थाएं या मिशनरियां भी उसकी मदद कर सकती हैं, लेकिन वह ऐसा नहीं करना चाहती. उसने कुंती और कर्ण की कथा नहीं पढ़ी है, पर उसे डर है, कहीं उसकी वजह से उसकी मां की जिंदगी का कोई राज न खुल जाये, उसकी जिंदगी में तूफान न आ जाये. वह उन परिस्थितियों की प्रतिकूलता की कल्पना कर सहम जाती है, जब एक मां अपनी संतान को समाज के सामने खड़ा कर सीना ठोंक कर यह नहीं कह पाती कि यह उसकी कोख की पैदाइश है.

मेरे एक परिचित के जरिये उसकी यह कहानी मुझ तक पहुंची. उसका निवेदन भी. मैंने गुमला एक पत्रकार की मदद चाही. उसने बताया कि वह महिला अब भी जिंदा है. उसका अपना परिवार है. एक आदिवासी मजदूर परिवार.

इतनी-सी खबर ने बेल्जियम में बैठी उस लड़की को और बेचैन कर दिया. वह मां की तस्वीर चाहती है. उसे देखना, उससे मिलना चाहती है, मगर पूरी सावधानी से.

मैं उसकी इच्छा पूरी कर सकूंगा, यह पक्के तौर पर नहीं जानता, पर एक बार प्रयास जरूर करूंगा.

 

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