बेमौसम बरसात नहीं है राजद की पोलिटिकल घेराबंदी

p.m.

बिहार में इन दिनों अचानक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गयी हैं. कुशवाहा शिक्षा के लिए मानव श्रृंखला बनाते हैं और उसमें राजद शामिल होता है. राजद के थिंक टैंक शिवानंद तिवारी आनंद मोहन से मिलने जेल में चले जाते हैं. राजद की तरफ से कहा जाता है कि पप्पू यादव तो अपना आदमी है. जीतनराम मांझी अफसोस जताते हैं कि विधानसभा भंग नहीं करना उनकी सबसे बड़ी भूल थी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कभी प्रेस को बताते हैं कि कोई भ्रम में न रहे एनडीए ही जीतेगा. और कभी अपने कार्यकर्ताओं से कहते हैं, हड़बड़ाइये मत चुनाव समय से ही होंगे.

अमूमन जिनका पोलिटिकल मामलों से नजदीकी रिश्ता नहीं रहता, उनके लिए ये बातें बिन मौसम बरसात टाइप की है. मगर जो लोग पोलिटिकल कीड़ा हैं, वे जड़ की बात तलाश रहे हैं. लोग बताते हैं कि यह बिन मौसम बरसात नहीं है. नीतीश कुमार लाख इनकार करें, मगर यह आशंका सभी राजनीतिक दलों को है कि 2018 में ही केंद्र के साथ बिहार समेत कई राज्यों के चुनाव हो सकते हैं. जैसा कि मोदी जी और उनकी भाजपा कहती आयी है. ऐसे में कोई रिस्क नहीं लेना चाहता कि बिना तैयारी के उतरे.

मगर राजनीतिक तैयारियों की यह इकलौती वजह नहीं है. एक वजह और है. वह यह है कि अगले दो माह में बिहार में 20 सीटों पर चुनाव होंगे. एक लोकसभा सीट किशनगंज पर जो मो तसलीमुद्दीन के निधन के बाद खाली हुई है. दो विधानसभा सीट जहानाबाद और भभुआ में. इसके अलावा छह राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं. धर्मेंद्र प्रधान (भाजपा), रविशंकर प्रसाद (भाजपा), महेंद्र प्रसाद (जदयू), वशिष्ठ नारायण सिंह (जदयू), अनिल सहनी (जदयू) और अली अनवर (जदयू) की. विधान परिषद की भी ग्यारह सीटें खाली हो रही हैं, राबड़ी देवी (राजद), नीतीश कुमार (जदयू), राजकिशोर कुशवाहा (जदयू), संजय सिंह (जदयू), उपेंद्र प्रसाद (जदयू), चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी (जदयू), नरेंद्र सिंह (बर्खास्त), सुशील कुमार मोदी (भाजपा), मंगल पांडेय (भाजपा), लाल बाबू प्रसाद (भाजपा), सत्येंद्र कुशवाहा (निधन).

दिलचस्प है कि इन 20 सीटों में राजद की सीटें बहुत कम हैं और मौजूदा सत्ता संरचना के हिसाब से उनकी सीटें बढ़ने की पूरी उम्मीद है. लालू जी के जेल जाने के बाद सत्ताधारी एनडीए इस कोशिश में था कि राजद बिखरेगा और इसका लाभ उन्हें मिलेगा. मगर जो हालात हैं, उनमें राजद और मजबूत होता ही नजर आ रहा है.

राज्य सभा जाने की तैयारी में जुटे राजद के शिवानंद तिवारी इन दिनों राजद की घेराबंदी मजबूत करने में जुटे हैं. उनके अलावा दो और अनुभवी फारवर्ड नेता जगतानंद सिंह और रघुवंश प्रसाद सिंह राजद को न सिर्फ बिखरने से बचा रहे हैं, बल्कि इसका दायरा भी बढ़ा रहे हैं. कुशवाहा की रालोसपा, मांझी की हम, पप्पू यादव की जनाधिकार पार्टी और आनंद मोहन का जनाधार अगर कुछ है तो बांकी कांग्रेस की तो मजबूरी है बिहार में राजद के पीछे चलने की. अगर यह घेराबंदी मजबूत हो गयी तो बिहार में आसानी से एनडीए को चुनौती दी जा सकती है. क्योंकि एनडीए फिलहाल लुंज-पुंज और किंकर्तव्य विमूढ़ नजर आ रहा है. नीतीश के प्रवचनों से जनता उकता रही है. भाजपा नीतीश के खत्म होने की राह देख रही है.

मगर इस घेराबंदी में बिहार की आम जनता को क्या हासिल होने वाला है, यह समझ से परे है. वह सामाजिक न्याय होगा, विकास होगा या सर्वधर्म समभाव कहना मुश्किल है.

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