बुकानन से क्रिस्टोफर हिल तक, सृजनशील लोगों को क्यों अपनी तरफ खींचती है कोसी?

कोसी नदी पर महत्वपूर्ण पुस्तक ‘रिवर ऑफ सोरो’ लिखने वाले क्रिस्टोफर हिल ने कल एक पोस्ट लिख कर बताया कि पूर्णिया और कोसी नदी से संबंधित अपनी तमाम शोध सामग्रियों को यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया की लाइब्रेरी में रख छोड़ा है. अगर कोई व्यक्ति इस मसले पर शोध करे तो यहां आकर इन सामग्रियों का इस्तेमाल कर सकता है. यह प्रसंग आया तो इतिहास औऱ साहित्य के गंभीर अध्येता, सेंटर फॉर सोशल स्टडीज के एसोसियेट प्रोफेसर सदन झा के मन में सहज ही यह जिज्ञासा उठी कि आखिर कोसी नदी और कोसी अंचल में ऐसा क्या है कि वह सृजनशील लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचती है. इसी बहाने उन्होंने बुकानन से लेकर रेणु, सतीनाथ भादुरी, दिनेश मिश्र और कई देशी-विदेशी अध्येताओं को याद किया है. जरूर पढ़ें

सदन झा

पूर्णिया और कोसी अंचल ने समय समय पर बेहतरीन और सृजनशील दिमागों को आकर्षित किया है. उन्नीसवीं सदी के आरंभिक सालों में फ्रांसिस बुकानन भागलपुर होते हुए आये, मन तो उनका कोसी टप कर पच्छिम की तरफ दरभंगा-मधुबनी के रुख करने का था पर उनकी पहली प्रेमिका नेपाल ने उन्हें अपनी तरफ खींच लिया. बुकानन का पूर्णिया प्रवास का जर्नल इतिहास खा गया. लेकिन उनकी रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में हमारे सामने है. पूर्णिया से संबंधित उनका कंपेरेटिव वोकेलरी जब अचानक ही मेरे सामने ब्रिटिश लाइब्रेरी में आई तो मैं आश्चर्य चकित रह गया. मैंने इस बाबत अन्य जगह लिखा है. डब्लूजी आर्चर के नोट्स और इस अदभुत वोकेवलरी का जिक्र जब मैंने ददाजी (हेतुकर झा) से किया तो वे भी गदगद हो उठे. उन्होंने लंदन से इन दस्तावेजों को मंगा कर इन्हें भविष्य के अध्येताओं के लिये पुन:प्रकाशित करने का उद्दम तुरत ही शुरु कर दिया.

बुकानन के डेढ़ सौ साल बाद, रेणु ने कोसी अंचल को साहित्य में नये कलेबर के साथ पेश किया और लोग, पाठक खिंचे चले आये. साथ में कुछ बेहद तेज शोधार्थी भी आये. कम लोग जानते हैं कि कैथरीन हानसेन जो पारसी थियेटर पर अपने काम के लिये प्रसिद्द है, उन्होंने रेणु पर पीएचडी करते हुए अपने शोध जीवन की शुरुआत की थी. रेणु पर उनसे बेहतर किसी ने नहीं लिखा है और यह दावा करते हुए मुझे तनिक भी हिचक या बड़बोलापन नहीं लगता. रेणु से तनिक पहिले ही सतीनाथ भादूरी आये, कुछेक दशक बाद मैथिली में लिली रे आयी, जिनकी मरीचिका को मैथिली के बाहर वह प्रसिद्धि नहीं मिल पायी, उनको वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वे हकदार हैं. अस्सी के दशक में कोसी अंचल में कुछ और कदमों ने प्रवेश किया और मनसा कर्मणा वहीं के होकर रह गये.

दिनेश मिश्र, समाज शास्त्री आनंद चक्रवर्ती, क्रिस्टोफर हिल ऐसे ही तीन नाम हैं. दिनेश मिश्र पहले कोसी फिर दूसरी नदियों से बंधकर हम सबको सचेत करते रहे हैं. लगता है कि वे हैं तो हममे कुछ विवेक बचा हुआ है नदियों के प्रति. क्रिस्टोफर हील ने संथालों के उत्पीरण की तरफ और कोसी अंचल के सामाजिक और पर्यावरणीय इतिहास के एक दूसरे से गुत्थम गुत्थ होने की तरफ हमारा ध्यान खींचा. ईपीडब्लू के उनके लेखों से भारत में उन्हें पढ़ा गया. पर, उनकी किताब रिवर ऑफ सॉरो… भारतीय संस्करण के अभाव में भारतीय अध्येताओं का ध्यान नहीं खींच पाया. एशोसियेसन फॉर एशियन स्टडीज द्वारा प्रकाशित यह किताब कोसी अंचल का बेजोड़ ऐतिहासिक अध्ययन है. आज पता चला कि उन्होंने इस शोध से संबंधित सारे दस्तावेज और एकत्रित सामग्री वर्जीनिया विश्विधालय को सौप दिये है. ताकि भविष्य के शोधार्थियों क मदद मिल सके. दीप से दीप जलती रहे.

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One Thought to “बुकानन से क्रिस्टोफर हिल तक, सृजनशील लोगों को क्यों अपनी तरफ खींचती है कोसी?”

  1. सच्चिदानन्द सिंह

    पता नहीं यह कहना कितना सही है कि बुकानन, सतीनाथ भादुड़ी या रेणु कोसी नदी या कोसी अंचल से खिंच कर आये। बुकानन सर्वे कर रहे थे, कोसी अंचल गए तो गोरखपुर भी गए। मद्रास प्रेसिडेंसी में भी उन्होंने सर्वे किये। भादुड़ी और रेणु तो अंचल की संतान हैं, वहीं पैदा हुए; वे भला कहीं से खिंच कर क्यों आने लगे?