बिहार में किसका गठबंधन मजबूत

पुष्यमित्र

लम्बे समय से चल रहे मंथन, संवाद, विवाद और तीखे बयानों के तीर के बाद कल आखिरकार बिहार में महागठबंधन ने आखिरकार सीट शेयरिंग का फार्मूला घोषित कर दिया। हालांकि कौन कहां से लडेगा यह अभी फाइनल नहीं बताया गया है और यह भी तय नहीं है कि अब आगे इस गठबन्धन में झगड़े नहीं होंगे। सीट शेयरिंग से यह भी साफ है कि बड़े भाई राजद ने विचार के बदले जाति को महत्व दिया है, वाम दलों को किनारे कर मांझी, कुशवाहा और मुकेश साहनी जैसे जातिगत सरगनाओं को तरजीह दी है। कांग्रेस को राज्यसभा की एक एडवांस सीट देकर सम्भाला गया है।

कुल मिलाकर देखें तो बिहार का महागठबंधन मोदी और बीजेपी की ताकत को रोकने का वैचारिक प्रयास कम, एक जिताऊ जातिगत प्रयास अधिक लगता है। राजद के नेतृत्व में पकी इस खिचड़ी में यादव और मुस्लिम चावल दाल की तरह हैं और कुशवाहा को सब्जी, मल्लाह जातियां और मुशहरों को मसाले की तरह शामिल किया गया है। कांग्रेस पिछ्ली बार की तरह सवर्णों को जोड़कर घी, पापड़ और अचार के रूप में अपनी मौजूदगी दिखाएँगे।

महागठबंधन ने विचार के बदले जाति को क्यों प्रश्रय दिया इसका जवाब मुझे फील्ड में घूमते हुए मिला। वह यह कि तमाम मुददों की जुबानी जंग के बावजूद बिहार में इस चुनाव में भी जातियां ही अहम किरदार निभाना जा रही है। मुसलमान हर हाल में महागठबंधन को ही वोट करेंगे, यादवों की सहानुभूति लालू परिवार के पक्ष में है, वे मानते हैं कि सीबीआई के जरिये इस परिवार को राजनीतिक कारणों से परेशान किया जा रहा है। कुशवाहा भी कुछ हद तक रालोसपा के साथ रहेंगे। निषाद जातियों का एक वोट बैंक बना है, मुकेश साहनी की वजह से उनमें राजनीतिक सजगता भी है। मुशहरों में मांझी को लेकर एक जातिगत अभिमान तो है मगर उनमें राजनीतिक सजगता की कमी है। उन्हें शायद ही मालूम हो कि अभी मांझी किस खेमे में हैं। तब राजद का जमीनी कार्यकर्ता इतना मजबूत है कि वह उन्हें समझा सकता है। इस तरह देखें तो महागठबंधन में जातीय गणित के अनुसार 54 से 60 फीसदी वोटर कवर हो जाते हैं। यह तब अगर रालोसपा को कुशवाहा जाति का पूरा समर्थन मिल जाये और कुछ सीटों पर कांग्रेस सवर्णों का कुछ वोट बटोर ले।

अब एनडीए की बात। सवर्ण और बनिया समाज का अधिकतम वोट भाजपा को पक्का है। जो तकरीबन 25 फीसदी है। 6 फीसदी पासवान वोटर और दो फीसदी कुर्मी वोटर भी इनके पाले में हैं। इनकी नजर अति पिछड़ा वोटरों पर है, जो फिलहाल चुप है और उम्मीदवार तय होने का इन्तजार कर रहा है।

इनकी आबादी 25 फीसदी बतायी जाती है, इनमें केवट जाति भी शामिल है जिस पर मुकेश साहनी का प्रभाव है। नीतीश इन जातियों को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं। और जमीन पर इसका असर भी दिखता है। मगर ये जातियां टुकड़ों में बंटी हैं। इनका कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। ये एकजुट होकर वोटिंग करेंगीं यह कहना मुश्किल है। और अगर आखिरी वक़्त में आरक्षण कोई मुद्दा बनता है तो ये राजद की शरण में भी जा सकती हैं। जैसा 2015 के विधानसभा चुनाव में हुआ। हालांकि सामान्य स्थिति में 80 फीसदी संभावना यह है कि ये जदयू को वोट करेंगे। इस तरह देखें तो दोनों गठबंधन कागज पर बराबर दिखते हैं।

मगर जमीन पर एनडीए की एक कमजोरी जरूर दिखती है, वह है भाजपा के वोटरों में जदयू और लोजपा के उम्मीदवारों के प्रति उपेक्षा का भाव। कई सीटों पर जहां कांग्रेस सवर्ण उम्मीदवार उतारेगी वहां उसे इसका फायदा मिल सकता है, जैसे पूर्णिया की सीट पर यह साफ नजर आता है कि सवर्ण जदयू के सन्तोष कुशवाहा के बदले कांग्रेस के उदय सिंह के पक्ष में वोट करेंगे। यही बात बिहार में महागठबन्धन को अपर एज देती है। क्योंकि महागठबंधन में जातियों का गणित अमूमन एक दूसरे का विरोधी नहीं है। अगर राजद के जमीनी कार्यकर्ता इसे एकजुट रखने में सफल हो गये तो महागठबंधन में अभी भी बिहार में बड़े उलट-फेर करने की संभावना है।

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