बिहार बढ़ रहा है, बिहारी पिछड़ रहे हैं, यह कैसा ग्रोथ रेट है सुशासन बाबू?

बिहार आगे बढ़ रहा है, लेकिन बिहार पिछड़ रहे हैं. यह हम नहीं कह रहे, बिहार सरकार कह रही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल भी बिहार की वार्षिक वृद्धि दर 11.3 फीसदी रही है. कल सरकार ने इकॉनामिक सर्वे की रिपोर्ट जारी करते हुए यह जानकारी दी और अपनी पीठ थपथपाई. साथ ही यह जानकारी भी मिली कि 2004-05 से 2014-15 के बीच बिहार की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर भी 10 फीसदी से अधिक रही है. पिछले दस-बारह सालों में सिर्फ 2016-17 ही एक ऐसा साल रहा जब वृद्धि दर 9.9 फीसदी रही, यानी दस फीसदी से कम.

एक ओर सरकार के लिए जहां ये आंकड़े खुद की तारीफ में लहालोट हो जाने वाले हैं, वहीं बिहार की जनता अवाक है. आखिर यह वृद्धि हो कहां रही है, अगर पिछले दस-बारह सालों में राज्य ने इतनी शानदार वृद्धि दर हासिल की है, तो उसका असर लोगों पर क्यों नहीं दिखता. क्यों ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में बिहार आज भी देश में 36वें स्थान पर है. लोगों की माली हालत में देश के दूसरे हिस्से के मुकाबले वह बदलाव क्यों नहीं आ रहा, जिससे यहां की बड़ी आबादी रोजी-रोटी के लिए बाहर जाना छोड़ दे.

अर्थशास्त्रियों को केवल आंकड़े पेश नहीं करना चाहिए, इस बात की भी तफ्तीश करनी चाहिए कि बिहार का नियमित दस फीसदी ग्रोथ आखिर किस सेक्टर में हो रहा है और किसे लाभ पहुंचा रहा है. यहां 12-13 के कथित सुशासन के बावजूद आज तक उद्योग के लायक माहौल नहीं बन पाया. दो-चार साइकिल कंपनियों को छोड़कर कोई उद्योग विकसित नहीं हुए. खेती का हाल वैसा ही है. सर्विस सेक्टर में भी ऐसी कोई क्रांति नजर नहीं आ रही जिसे अपूर्व विकास कहा जा सके.

सरकार कहती है, मोबाइल डेन्सिटी में हम आगे बढ़ रहे हैं. देश में शायद तीसरे नंबर पर हैं. पेट्रोल-डीजल हम खूब खर्च कर रहे हैं. क्या यही ग्रोथ का कारण है? और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि बिहार में अगर ग्रोथ हो रहा है तो किनका हो रहा है. कहीं सिर्फ नेताओं और ठेकेदारों का तो नहीं. आम जनता तो आज तक पढ़ाई से लेकर कमाई तक के लिए दिल्ली-मुंबई और पंजाब के चक्कर लगाने के लिए विवश है.

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