बंगाल को रसगुल्ला, बिहार को क्या?

हाल ही में पश्चिम बंगाल राज्य ने रसगुल्ला पर जीआई टैग हासिल किया है. इससे यह साबित हो गया है कि रसगुल्ला बंगाल की ही मिठाई है. अब कोई व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अपने लोकेशन के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता. डब्लूटीओ का सदस्य होने के कारण भारत ने ज्योग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स एक्ट को अपने देश में लागू किया है. 2003 में लागू हुए इस कानून के तहत पहला जीआई टैग बंगाल ने दार्जिलिंग टी के नाम से लिया. तब से अब तक 308 सामग्रियों को जीआई टैग मिला है. अलग-अलग राज्यों ने अपने उत्पादों का जीआई टैग लिया है. कर्नाटक जैसे राज्य ने 40-40 उत्पादों के टैग हासिल किये हैं. मगर बिहार ने कितने टैग हासिल किये हैं, आपको खबर भी है?

ज्योग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री की आधिकारिक साइट के मुताबिक बिहार राज्य को अब तक आठ जीआई टैग मिले हैं, जिनमें पांच उत्पाद ही शामिल हो पाये हैं. तीन उत्पादों का दो बार टैग लिया गया है. इन पांच उत्पादों में भी बिहार सरकार के प्रयासों से सिर्फ एक मधुबनी पेंटिंग का टैग ही मिला है. शेष चार में से तीन भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय की कोशिशों से हासिल हुआ है, एक भागलपुर बुनकर समिति के जरिये. आखिर बिहार सरकार जीआई टैग के प्रति इतनी उदासीन क्यों है. अगर खाद्य पदार्थों की ही बात की जाये तो बिहार में कई ऐसी चीजें हैं, जिनके जीआई टैग के लिए कोशिश की जा सकती है, जैसे सिलाव का खाजा, अनरसा, चंद्रकला, रामदाना की मिठाई, लिट्टी, बालूशाही, मनेर का लड्डू, चंपारण का अहुना मटन, पेड़ा वगैरह…

बिहार सरकार की तरह से मुजफ्फरपुर की शाही लीची के जीआई टैग को हासिल करने की बात भी कही गयी थी, मगर इस दिशा में कितना काम हुआ पता नहीं. इसी तरह भागलपुर का जर्दालू आम है. डल चादर है. वैशाली का मालभोग केला है. कई और चीजें हैं. मगर यह तब ही हासिल हो सकता है, जब सरकार या इससे संबंधित लोग चेते. वरना ओड़िशा जैसा हाल हो सकता है. बहरहाल, आइये जानते हैं बिहार की किन-किन चीजों को जीआई टैग मिला है.

1. मधुबनी पेंटिंग-

हालांकि इसका वास्तविक नाम मिथिला पेंटिंग है, मगर इसे टैग मधुबनी पेंटिंग के नाम से ही मिला है. मिथिलांचल की स्त्रियां विभिन्न पर्व त्योहारों आदि में विविध प्रकार के चित्र बना कर घर की दिवार तथा घर आंगन का कोना -कोना अलंकृत करती हैं. इस शैली में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है. यह सच है कि इसे टैग बिहार सरकार की कोशिशों से मिला है. इसे 36 नंबर का टैग मिला है. वैसे भी यह देश-विदेश में इतना मशहूर हो चुका है कि इसका टैग किसी और को मिल भी नहीं सकता था.

2. भागलपुर सिल्क-

भागलपुर का तसर सिल्क देश और दुनिया में मशहूर है. कई कारणों से वहां के सिल्क व्यवसाय में गड़बड़ियां आईं. चीनी तसर धागे का प्रभुत्व बढ़ा. मगर भागलपुरी सिल्क की और वहां के बुनकरों की पहचान आज भी है. इसके जीआई टैग की आवेदक भागलपुर तसर सिल्क डेवलपमेंट समिति थी. टैग 2013 में मिला.

3. एप्लीक(कटवा) वर्क ऑफ बिहार-

एप्लिक का काम मुग़ल कल से ही होता रहा है. इसके द्वारा बने सामान का उपयोग राजा महाराजाओं तथा ऊँचे दर्जे के लोगों द्वारा किया जाता था. इसके अंतर्गत एक कपड़े को दुसरे के ऊपर जोड़कर तथा काटकर नमूने तैयार किये जाते हैं. इसके द्वारा शामियाना, चंदोवा, तम्बू इत्यादि बनाये जाते हैं. वैसे तो एप्लीक वर्क ओड़िशा और गुजरात का भी मशहूर है. ओड़िशा को एप्लीक वर्क के नाम से एक जीआई मिला भी है. वह पिपली एप्लीक वर्क है. बिहार को एप्लीक(कटवा) वर्क ऑफ बिहार के नाम से जीआई टैग मिला है. जिसे 2016 में रिन्युअल भी कराया गया. इसलिए इसका दो बार जिक्र है. इसका टैग भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के आवेदन पर जारी किया गया है.

4. सिक्की ग्रास प्रोडक्ट ऑफ बिहार-

बिहार का सिक्की आर्ट भी कम मशहूर नहीं. मिथिला में शादी के समय लड़कियों की बिदाई में सिक्की के बने सामान दिए जाने की परंपरा रही है. सिक्की एक प्रकार की घास होती है जिसे रंगकर तथा लपेटकर विभिन्न प्रकार की रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुएं जैसे:-टोकरियाँ, दौरियां, बक्से, घड़े इत्यादि बनायीं जाती हैं. इसकी बनी डलिया और दूसरी चीजों को लोग खूब पसंद करते हैं. इसका टैग भी दो बार मिला है. इसका टैग भी भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के आवेदन पर जारी किया गया है.

5. सुजनी एम्ब्रायोडरी वर्क ऑफ बिहार-

सुजनी बिहार में बनने वाला गद्दा है. इसका इतिहास इसी से जाना जा सकता है की इसका उपयोग पुराने समय में राजा महाराजाओं के दरबार में गाने बजने वाले कलाकारों के द्वारा अपने वाद्ययंत्र तथा अन्य कीमती सामान, किताब, इत्यादि ढकने तथा उसमें लपेटकर रखने के लिए किया जाता था. सुजनी बनाने के लिए पुरानी साड़ियों तथा धोतियों को एक साथ परत दर परत जोड़कर सिलाई की जाती है. इसके द्वारा बने सामानों पर विभिन्न प्रकार की कढाई द्वारा औरतें लोक शैली पर आधारित भिन्न भिन्न दृश्यों का चित्रण करती हैं.

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