फोटो स्टोरी-यह क्या सचमुच पुस्तक मेला ही है?

इस बार के पटना पुस्तकमेला को नया और आधुनिक भले बताया जाए मगर यह कुल मिलाकर अजीब है. एक तो यह खुले मैदान से उठ कर भवन में चला गया यह तो लोगों को पहले ही अखर रहा है. मगर गौर से घूमेंगे तो पता चलेगा इसमें और भी कई गड़बड़ियां हैं. आपको किताबों की दुकानें बहुत कम नजर आएंगी. आपको आधी से अधिक दुकानें प्रचार वाली और दूसरी सामग्रियां बेचने वाली नजर आएंगी.

एक पूरी कतार बिहार सरकार के विभिन्न विभागों की है. जिसमें सबसे प्रमुख मद्यनिषेद विभाग है. फिर कौशल विकास विभाग और दूसरे ऐसे विभाग के स्टॉल हैं. एक दूसरी कतार विभिन्न कालेजों स्कूलों के स्टॉल वाली हैं. वहां जाकर लगता है कि एडमिशन फेयर में आ गए हैं. कुछ दुकानें किताबों के बदले कॉपी औऱ स्टेशनरी बेच रही है. कुछ पर सीडी बिक रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि पुस्तकमेला में इस तरह की दुकान पहले नहीं होती थी. इस बार और उस बार का फर्क यह है कि पहले ये किताबों की दुकानों के बीच खोई रहती थीं, इस बार किताबों की दुकानें ही इनके बीच खोई हैं. शुद्ध किताबों वाले स्टॉल बमुश्किल 25-30 ही होंगे. क्या यह सचमुच पुस्तकमेला ही है?

बहरहाल तसवीरें देखिये…

ज्योतिष सीखिये

स्टेशनरी और कॉपी की दुकान
यह भी तो किताबें ही हैं न?
कौशल संवारिये काम आयेगा
किताबों की क्या जरूरत, हमारे कॉलेज में आइये सब पढ़ा देंगे
यहां आइये

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