प्रेम को मजबूती और मुक्ति का मार्ग बनाते हुए पीढ़ियों से स्त्री के मन में दबी इच्छा—आकांक्षा को स्वर देनेवाला पुरबियाउस्ताद

16 मार्च को महेंदर मिसिर की जयंती पर विशेष

चंदन तिवारी

आज महेंदर मिसिर की जयंती है. पुरबी इलाके के अदभुत और अपने तरीके के अनोखे रचनाकार थे वे. महेंदर मिसिर के एकाध गीतों को करीब दस—बारह सालों से छिटपुट गाती रही थी, बाद में जब पुरबियातान सीरिज की शुरुआत की तो उनके ही गीतों से की. अब तक करीब 16 अलग—अलग गीत गायी. जैसे—जैसे एक—एक कर उनके गीत गाती रही, उनके गीतों की दुनिया से गुजरती रही, उनके गीतों में और उनके व्यक्तित्व में और रुचि बढ़ती गयी. रामनाथ पांडेय ने उन पर पहला उपन्यास लिखा था— महेंदर मिसिर, उसे पढ़ी. पांडेय कपिल के कालजयी उपन्यास फुलसुंघी से गुजरी. जौहर ​शफियाबादी ने भोजपुरी में उनकी जीवनी लिखी है— पुरबी के धाह, उसे देखी. इसी तरह से और भी कई जगहों से जानकारी जुटाती रही. और एक—एक कर उनके गीत भी मिलते गये. अक्सर उनके गीतोेंं को उलटपुलट कर देखती हूं और हर बार चकित रहती हूं कि जितने बड़े फलक पर विस्तारित कर वे अपने समय में गीतोंं को रच रहे थे, उस समय में या उसके बाद भी उस तरह का रचनाकार कोई नहीं ही हुआ होगा. वे अपनी रचनाओं में प्रेम को जितने बड़े स्तर पर रखते हैं या स्त्रियों की प्रेम की आजादी के लिए जितनी रचनाएं करते हैं, वह चकित करनेवाला है. चाहे वह सीधे सहज पति—पत्नी के प्रेम के गीतों के जरिये हो, प्रेमी—प्रेमिका के गीतों के जरिये हो, राधाकृष्ण के गीतों के जरिये हो या फिर रावण मंदोदरी के ही प्रेम का गीत क्यों न हो.

वे छपरा के एक गांव मिसरवलिया में पैदा हुए एक ऐसे रचनाकार, जिन्हें कहा तो पुरबिया उस्ताद जाता है लेकिन जिनके दिवाने दुनिया के कोने—कोने में फेले हुए हैं. इसका अहसास विगत माह तब हुआ जब मुझे नीदरलैंड में बुलाया गया. नीदरलैंड का आमंत्रण विशेष तौर पर महेंदर मिसिर के ही प्रेमगीत को गाने के लिए था. राधाकृष्ण के प्रेमगीत को गाने के लिए. वह गीत राधा और कृष्ण के प्रेम का है, जिसमें कृष्ण स्त्री का रूप बनाकर, गोदनहरीन बन राधा से मिलने पहुंचते हैं.

महेंदर मिसिर के गीतों में प्रेम अपने उच्चतम स्तर पर मिलता है. सिर्फ इसी राधाकृष्ण के गीत में नहीं. वे अपूर्व रामायण में मंदोदरी का एक प्रसंग लाते हैं. जब रावण को मार दिया जाता है तो मंदोदरी विलाप करती है. उस रचना में भी प्रेम अपने उच्चतम रूप में दिखता है.जब वे बारहमसा रचते हैं तो उसकी पंक्तियों से गुजरते हुए अविश्वसनीय जैसा ही लगता है कि कोई पूरूष स्त्री के मन की इच्छा आकांक्षा को इतने सुक्ष्मतम स्तर पर जाकर कैसे अभिवयक्त कर सकता है. और हद तो यह कि महेंदर मिसिर जब निरगुण भी रचते हैं तो वे प्रेम को महत्व देते हैं. लिखते हैं— सखी हो प्रेम नगरिया छुटल जात बा… लेकिन उनके गीतों में समाहित प्रेम में महज रोमांस नहीं रहता, स्त्री का देह नहीं होता बल्कि सदियों से स्त्री की दबी इच्छा—आकांक्षा का स्वर होता है. अपने को पूरा पूरा पा लेने का स्वर. यही बात उनमें सबसे खास लगती है. वह स्त्री प्रधान रचनाकार थे. स्त्री मन के प्रेम—विरह को राग देनेवाले. सोचती हूं कि कितना कठीन रहा होगा उनके लिए. किस तरह वह स्त्री मन के अंदर की बातों को, एकदम से शब्दों में उतारते होंगे. कितनी गहराई में डूब जाते होंगे वे. स्त्री ही तो बन जाते होंगे, लिखते समय…

 

सुनिये, चंदन की आवाज में महेंदर मिसर के लिखे गीत

 

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