पूस का महीना है, बगिया खाये कि नहीं

उपमा कुमारी

ठंड के मौसम में नये चावल के पकवान खाने का चलन पूरे पूर्वी भारत में है. हमारे यहां लोग पूस महीने में बगिया जरूर खाते हैं. दूसरे इलाकों में इस तरह के पकवान को अमूमन पिट्ठा कह कर पुकारा जाता है. बनाने की विधि में भी ज्यादा फर्क नहीं होता है, हां स्टफिंग यानी अंदर भरने की चीज अलग-अलग हो सकती है. हमारे तरफ इसमें तीसी, गुड़, खोआ भर कर मीठा बगिया तैयार किया जाता है और चना या मूंग दाल भर कर नकमीन बगिया. हमलोग पूस में बगिया जरूर बनाते हैं. और अगर किसी के घर में नवजात शिशु का जन्म हुआ हो तो बगिया से उसका गाल सेका जाता है. कहते हैं कि बगिया से गाल सेकने से बच्चे का गाल सॉफ्ट हो जाता है.

दिलचस्प है कि बगिया के लिए महीन, सुगंधित या लंबी वेराइटी वाले चावल की जरूरत नहीं होती है. इसके लिए हमलोग मोटे चावल को पसंद करते हैं. हां, यह अरवा होना चाहिए और इसी साल का चावल होना चाहिए. गांवों में तो नया चावल कुटाते ही उसका बगिया बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है. शहरों में यह मिलना मुश्किल होता है. मगर ढूंढने पर पटना शहर में किसी न किसी दुकान में मिल जाता है. गांधी मैदान के पास आइएमए हॉल के पीछे जो गल्ला मंडी है, वहां आसानी से मिल जाता है. हां, आपको परखना आना चाहिए कि चावल नया है या पुराना. क्योंकि कई दुकानदार नया कहके पुराना चावल भी बेच देते हैं.

बगिया को वैसे तो ठंड के किसी भी महीने में बना सकते हैं, मगर पूस महीने के साथ बगिया का नाम ऐसा जुड़ गया है कि लोग इसे पूस-बगिया भी कहने लगे हैं. इसे बनाना बहुत मुश्किल नहीं है. स्टफिंग तैयार करके चावल के आटे की बनी लोई में इसे भर देना होता है और उसे बगिया जैसा शेप देना पड़ता है. इसका आटा गर्म पानी में गूंथा जाता है. तसवीरों में शेप देख सकते हैं. फिर इसे उबलते पानी में डाल देते हैं.

पानी में जब आप बगिया को डालेंगे तो यह बरतन के नीचे चला जायेगा और जब यह पक जायेगा तो खुद-बखुद ऊपर आ जायेगा. जैसे पक कर यह ऊपर आ जाये, इसे निकाल लीजिये. बगिया खाने के लिए तैयार है. ठंड के महीने में बगिया को खाने की सलाह इसलिए दी जाती है क्योंकि इसकी तारीफ गर्म होती है. इसमें स्टफिंग के तौर पर इस्तेमाल होने वाली चीज भी गर्म होती है.

(बातचीत पर आधारित)

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