पुस्तक मेला आयोजकों ने बाल साहित्य की चर्चा से बचपन को ही ‘गायब’ कर दिया

शशांक मुकुट शेखर

10 दिवसीय पटना पुस्तक मेला का औचित्य हर बीतते दिन के साथ घटता जा रहा है. आयोजकों की लापरवाही से हर दिन कुछ न कुछ गड़बड़ियां हो रही हैं और लोग निराश होकर लौट रहे हैं. ऐसे में अगले साल अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला होने की बात बिहार के साहित्य जगत का सबसे बड़ा मजाक लगता है.

इसी बीच सोमवार को खबर मिली कि पुस्तक मेले में हिंदी के प्रसिद्द कवि श्री केदारनाथ सिंह से हिंदी के एक और प्रसिद्द कवि श्री अरुण कमल बातचीत करने वाले हैं. बातचीत का विषय था ‘बाल साहित्य वाया बचपन.’ दोपहर से ही बड़ी उत्सुकता थी अपने प्रिय कवियों की वार्तालाप सुनने का. चूँकि बातचीत का विषय बच्चों से जुड़ा हुआ था तो स्कूल को बच्चों को भी बुलाया गया था. और कार्यक्रम का उद्देश्य था स्कूली बच्चों में हिंदी साहित्य के प्रति रुझान पैदा करना.

मगर कार्यक्रम में पहुंचते ही देखा, मामला कुछ अलग ही था. बच्चों को ध्यान में रखकर हो रहे कार्यक्रम में आयोजकों का बच्चों के प्रति रवैया ही उदासीन था. आगे की सभी कुर्सियों पर शहर के बड़े साहित्यकार, कवि तथा तथाकथित साहित्य के रक्षकों तथा मठाधीशों का कब्ज़ा था. काफी नजर दौड़ाने पर कुछ कुर्सियों पर स्कूली ड्रेस पहने बच्चे दिखाई दिए. और वे कुर्सियां सबसे पीछे की कतार में लगी हुई थी. गिनने पर कुल पांच स्कूली बच्चे सबसे पिछली कतार में बैठे हुए थे. कुछ बच्चे पीछे ही दीवाल लगकर खड़े थे तथा बातचीत को सुनने का असफल प्रयास कर रहे थे. साउंड की व्यवस्था ऐसी थी कि पीछे आते-आते सिर्फ इतना समझ आ रहा था कि मंच पर कुछ बातचीत हो रही है.

साहित्य में बराबर यह चर्चा होती है कि वर्तमान पीढ़ी साहित्य में आगे क्यों नहीं आती? इस मुद्दे पर चर्चाओं का अंबार सा लग जाता है. सम्मेलनों में मंच पर बैठकर ‘साहित्य के अपर कास्ट के अल्पसंख्यक’ इसपर लम्बी-लम्बी भाषण देते ही रहते हैं. मगर उन्हें शायद यह नहीं पता होता कि नई पीढ़ी में साहित्य के प्रति उदासीनता का सबसे बड़ा कारण वे खुद हैं. वे खुद अपनी गद्दी जकड़कर बैठे हैं. गद्दी के मोह ने उन्हें साहित्य का दीमक बना दिया है. इनसे बच्चों तथा बाल साहित्य को तवज्जों देने की सोचना ही बेमानी है. साहित्य को अपनी बपौती संपत्ति समझने वाले ऐसे मठाधीशों के रहते साहित्य में बच्चो और नयी पीढ़ी का रुझान कैसे बढ़ सकता है भाई.

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One Thought to “पुस्तक मेला आयोजकों ने बाल साहित्य की चर्चा से बचपन को ही ‘गायब’ कर दिया”

  1. Prashant Kumar

    बुद्धिजीवियों से ज्यादा लहालोट होने वाले सतही लोगों ने साहित्य का माहौल खराब किया है, आयोजकों में अधिकांश इसी प्रवृति के लोग पाए जाते हैं| गरीबी पर हो रहे बहस में मज़ाल किसी भिखाड़ी को अंदर आने देंगे | यही हाल है ..अच्छा लिखे हो