पीटीएम का खौफ हत्या करने के खौफ से बड़ा हो गया है, अपने बच्चों को टाइम देना शुरू कीजिये

आज बाल दिवस है. मगर मुझे न जाने क्यों लग रहा है कि अगले चार-पांच साल में 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाना बंद हो जायेगा. आप अखबारों को देखिये, ज्यादातर जगह विश्व मधुमेह दिवस मनाया जा रहा है. सोशल मीडिया में चचा नेहरू के योगदान पर जंग हो रही है. बच्चों को चर्चा तो कहीं होती नजर ही नहीं आ रही. इसी साल पता चला कि 20 नवंबर को इंटरनेशनल चिल्ड्रेन्स डे है और यूनिसेफ जैसी संस्थाएं भारत में इस तारीख को अधिक महत्व दे रही हैं. ऐसे में मुमकिन है कि देर-सवेर हम भी अपना बाल दिवस 20 नवंबर को शिफ्ट कर लें. फिर भी…

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कल प्रभात खबर के आयोजन में बच्चों के एक समूह ने यह सलाह दी.

फिर भी, आज मैं बच्चों के बारे में बात करना चाह रहा हूं. क्योंकि कल पूरे दिन मैं पटना के बाल भवन किलकारी में 50-60 बच्चों के साथ था. उनके जोश, उनकी बातें, उनके विचार सुन-सुन कर मन उत्साहित होता रहा. कई दिनों से मन में एक सवाल था, जो परेशान कर रहा था, कल उसका जवाब मिल गया. सवाल यह था- किसी भी बच्चे के लिए पीटीएम का खौफ किसी की हत्या करने के खौफ से बड़ा कैसे हो जाता है? संदर्भ गुड़गांव के प्रद्युम्न हत्याकांड का ही था. हालांकि किसी भी जांच के नतीजे को अब चुपचाप मान लेने को जी नहीं चाहता. चाहे जांच सीबीआई ने ही क्यों न की हो.

 

मगर बच्चे ने खुद कुबूल किया है. और यह बात कोई अपवाद भी नहीं है. पिछले दिनों दिल्ली गया था तो एक करीबी मित्र ने जानकारी दी थी कि उनके मोहल्ले का एक किशोर अपनी छोटी बहन के साथ भाग गया था. वहां भी वजह पीटीएम ही थी. पीटीएम के बाद घर में शायद डांट-फटकार लगी थी. मेरा सौभाग्य है कि मेरी बेटी के स्कूल वाले चेत गये हैं. उन्होंने पांचवी तक परीक्षा बंद करा दी है और पीटीएम में ज्यादातर सकारात्मक बातें करते हैं. उन्होंने स्कूल में एक मनोविज्ञान विशेषज्ञ को रख लिया है और अभिभावकों की रेगुलर काउंसिलिंग करवाते हैं. मगर हर स्कूल का यह सच नहीं है.

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पैरेंट्स टीचर मीटिंग की सांकेतिक तसवीर.

ऐसे में इस तरह की खौफनाक घटनाएं घटती हैं, कि महज पीटीएम कैंसिल करवाने के लिए बच्चा किसी की हत्या करने पर भी उतारू हो जाता है. हम भी जब छोटे थे, तब मन में कई तरह के ख्याल आते थे कि दुनिया खत्म हो जाये, फलां मर जाये. मगर वे बातें ख्यालों तक ही सीमित होती थी. अब हम इन चीजों को जीते-जागते देख रहे हैं. अमेरिका में तो बच्चों द्वारा स्कूल में शूटआउट किये जाने की घटना तो आम बात हो गयी है. ऐसा क्यों है?

इस क्यों का जवाब कल मिला. कल हमलोग प्रोग्राम शुरू होने से पहले कुछ वयस्क लोगों के साथ बतिया रहे थे. साथ में दो बच्चियां भी खड़ी थीं. वहां भी यह सवाल उठा कि आखिर क्यों पीटीएम का इतना खौफ है. तो उन बच्चियों ने कहा कि आजकल मां-बाप और बच्चों के बीच गैप काफी बढ़ गया है. लोग या तो अपने बच्चे को समय नहीं देते, या देते भी हैं तो अपनी बात बच्चों पर लादने लगते हैं. इसी वजह से बच्चे घर के बदले अपने दोस्तों के अधिक नजदीक होते जा रहे हैं. दोस्तों के बीच कई बार ऐसे प्लान बन जाते हैं, जिसका खतरा बच्चा नहीं समझता. और उस प्लान को लागू कर दिया जाता है.

इसी दौरान हमारी एक सहकर्मी ने बताया कि इन दिनों बच्चों के भागने की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं. उन्होंने कई किस्से सुनाये. कुछ ऐसे बच्चों के बारे में भी बताया जो अपने घर लौटना भी नहीं चाहते थे. इन सबके पीछे पीटीएम और परीक्षा का प्रेशर था.

Sketch3041347एक-दो महीने पर मेरी बेटी के स्कूल में मनोविश्लेषक ने पैरेंट्स की एक मीटिंग की थी. उस मीटिंग में उन्होंने बताया था कि आप बच्चों से अधिक से अधिक बात कीजिये. उनकी बातों को गौर से सुनिये और उन्हें सही सलाह दीजिये. स्मार्टफोन और सोशलमीडिया के युग में अभिभावक लगातार बच्चों से दूर होने लगे हैं और यह दूरी संभवतः सबसे अधिक है. पहले कभी इतनी दूरी नहीं हुआ करती थी. स्मार्टफोन और सोशलमीडिया ने तो हालांकि पूरे परिवार के बीच दूरी उत्पन्न कर दी है, मगर बच्चों पर इस दूरी का सबसे अधिक असर पड़ रहा है.

मां-बाप जो नौकरियों और सोशल मीडिया के चक्कर में बच्चों से दूर रहते हैं. उनकी पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, दोस्ती और दूसरी परेशानियों से अनजान रहते हैं. वे अक्सर पीटीएम में बच्चों की छोटी सी शिकायतों पर भड़क उठते हैं. क्योंकि हम अपने बच्चों को समय तो देते नहीं मगर हमारी उम्मीदें आसमान पर रहती हैं. इसके अलावा और दूसरी चीजों की तरह बच्चे भी हमारे लिए सोशल मीडिया पर सेलिब्रेशन की चीज हो गये हैं. हम उस मौके की तलाश में रहते हैं कि हमारा बच्चा कुछ अच्छा करता दिखे और हम उसकी तसवीर सोशल मीडिया पर चेप कर कुछ लाइक्स बटोर लें.

जान लीजिये, यह सिर्फ और सिर्फ हमारी गलती है और इन सब का नतीजा बहुत खतरनाक होने वाला है. यह सिर्फ बच्चों को लेकर बहुत अधिक महत्वाकांक्षाएं पाल लेने का मामला नहीं है, वह तो एक सामान्य मसला है. असली मसला है मां-बाप और बच्चों के बीच बढ़ती दूरी.

तिया के स्कूल के मनोविश्लेषक ने हमें जो सलाह दी थी, वही मैं आप लोगों के साथ साझा करना चाहूंगा.
1. बच्चों को क्वालिटी टाइम दीजिये. स्कूल से लौटने पर उसका पीठ सहलाकर उससे पूछिये कि आज दिन कैसा गुजरा, स्कूल में क्या-क्या हुआ. वह आपसे छह-सात घंटे दूर रहता है, इसलिए उसके पास आपको बताते के लिए काफी कुछ होता है.
2. कम से कम पूरे दिन में एक बार साथ खाना खाइये और उस वक्त स्मार्टफोन से दूर रहिये. खाते वक्त परिवार के लोग आपस में बातें करें.
3. कुछ खाने-पीने या कहीं आने-जाने में बच्चे की पसंद का ख्याल रखिये. हर बार अपनी पसंद उस पर मत थोपिये. हो सकता है आप शॉपिंग मॉल जाना चाहते हों और बच्चा पार्क जाना चाहता हो. उसकी बात भी मान लिया कीजिये.
4. कभी किसी से बच्चे को कंपेयर मत कीजिये. कि फलां कितना अच्छा है. यह बात तो हमेशा से कही जाती रही है. फिर भी जरूरी है.
5. बच्चे के दोस्तों के बारे में लगातार पूछताछ करते रहिये. मौका मिले तो दोस्तों के घर भी हो आइये. उनके माता-पिता से मिल आइये. खास कर जो आस पड़ोस के खेलने वाले दोस्त हों.
6. शाम के वक्त हर हाल में बच्चों को घर से बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित कीजिये. खेल शारीरिक श्रम वाले हों. टीवी और मोबाइल के लिए समय तय कीजिये.
7. सौ बातों की एक बात स्मार्टफोन के लिए समय तय कीजिये और बच्चों और परिवार वालों को अधिक समय दीजिये. उनसे जुड़िये. सोशल मीडिया पर एक घंटे भी आ जायेंगे तो संबंध कायम ही रहेगा.

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