पहली पुण्यतिथि- पटना में मोबाइल की टिमटिमाती रोशनी में बोलते रहे अनुपम मिश्र

निराला बिदेसिया

कोई पांच साल हुए. अनुपम मिश्र पटना आये थे. अपने पिता और हिंदी के मशहूर कवि भवानी प्रसाद मिश्र के नाम पर हो रहे एक आयोजन में भाग लेने. पटना वे आते रहते थे. बिहार भी. थोड़ा अंतराल हो जाता था. लेकिन समय के अंतराल से सरोकार कम नहीं हुआ. बिहार से उन्होंने एकाकार होनेवाला रिश्ता रखा. बिहार पर उनका अपना स्वतंत्र चिंतन था, गहरा अध्ययन भी. इसे दो महत्वपूर्ण उदाहरणों से समझ सकते हैं. दरभंगा के तालाबों की कहानी का जिस तरह से उन्होंने दस्तावेजीकरण किया, सीता बावड़ी का इतिहास लिखा, वह अनुपम है, अद्भुत है. और फिर जब 2008 में कुसहा त्रासदी के बाद कोसी का प्रलय हुआ और हजारों जिंदगानियां काल के गाल में समाने लगी तो देश-दुनिया के पत्रकारों ने रिपोर्टिंग की, लेख लिखे लेकिन सब पर भारी पड़ा अनुपम मिश्र का लिखा हुआ एक लेख- तैरनेवाला समाज डूब रहा है. कोसी त्रासदी पर यह एक लेख जितनी आत्मीयता से, तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कसकर लिखा गया, वह लेखन में नजीर बना. हिंदी की दुनिया में उनका लिखा और कहा, दोनों नजीर ही बनता रहा. ‘ आज भी खरे हैं तालाब’ अब तक एक नजीर ही तो है.

निराला बिदेसिया

खैर! यह दूसरी बात है. बात तीन साल पहले की. पटना आये तो उनसे आग्रह किया कि दोस्तों की इच्छा है कि एक बतकही हो. दोस्तों ने मिलकर दारोगा राय स्मृति भवन में जगह तय की. हवाई अड्डे से सीधे अनुपमजी वहीं पहुंचे. आते ही पूछे कि कहीं टॉयलेट है. जवाब दिया कि नहीं. हंसते हुए बोले- कोई बात नहीं. सड़क के उस पार गये, तुरंत वापस आये. बोले, कोई बात नहीं, चलो बतकही करते हैं दोस्तों के साथ. 50 के करीब साथियों का जुटान था. श्याम बाबू राय के चैंबर में ही बैठकी लगी. बातचीत करते-करते ही बिजली चली गयी. घुप्प अंधेरा.

बिजली की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं थी. कैंडल का इंतजाम किया जाने लगा, तब तक कुछ साथी अपने अपने मोबाईल का लाइट जला चुके थे. अनुपमजी ने अपनी बात जारी रखी. सिर्फ एक बार बीच में बोले- बातचीत के लिए शब्द-संवाद की जरूरत है, रोशनी की नहीं. उस दिन उन्होंने जो पटना में कहा, वह अगले दिन अखबारों में नहीं आ सका लेकिन मोबाइल में अब तक रिकार्ड है. सब बतकही के अंदाज में.

सार कुछ यह था—

”दोस्तों, नदियों का, पहाड़ों का अपना धर्म होता है. भाई, लेकिन मुश्किल यह है कि हम सब अपने-अपने धर्म को ही महान मान बैठे हैं. यह बताओ कि कितने सालों का है हम सबका धर्म. आधुनिक कैलेंडर के पन्ने पलटो, 2013 सालों की यात्रा में ही थक जाते हो. प्राचीन कैलेंडरों में जाओ तो पांच हजार साल जाते-जाते रुक जाओगे. लेकिन जो नदियां हैं, पहाड़ हैं, उनका लाखों-करोड़ों साल से अस्तित्व है. इसलिए उनका अपना धर्म भी है. अब गंगा की ही बात करो. उसका अपना कैलेंडर है. 80 लाख साल का है और हिमालय का तो करीब दो करोड़ 30 लाख साल का. यह वैज्ञानिक कहते हैं.

अब बताओ कि इतने सालों से जिसका अस्तित्व है, उसका भी तो अपना धर्म होता होगा. गंगा का अपना धर्म है कि वह अविरल बहेगी, रास्ते में चट्टानों को काटकर रेत बनायेगी, अपने आसपास बसे लोगों को जल मुहैया करायेगी. अब हमलोग चाहते हैं कि हमारा जो कुछ हजार सालों का धर्म है, गंगा उसके अनुसार चले और उसी की रक्षा करने में अपने धर्म की परवाह न करे. गंगा वर्षों से करती रही है ऐसा, करेगी भी लेकिन अपने धर्म को दांव पर लगाकर तो नहीं न! हम गंगा के धर्म की परवाह करना छोड़ दिये हैं और चाहते हैं कि वह हमारे धर्म की परवाह करती रहे. भला ऐसा होता है क्या? वह भला क्योंकर और कब तक हमारे धर्म की एकतरफा परवाह करती रहे! अपने धर्म को बचाने के लिए अपने रूप में सामने आ गयी.

उत्तराखंड हादसा तो देखे ही न! इसी तरह हिमालय भी अगर करीब ढाई करोड़ साल से है तो उसका भी अपना धर्म है. उसे आप अपने तरीके से बढ़ने दीजिए, रहने दीजिए. हमने कुछ सालों में अपने धार्मिक यात्राओं को सुविधाजनक बनाने और उससे दोहन करने के लिए लगातार हिमालय और गंगा, दोनों के धर्म से छेड़छाड़ शुरू कर दी. और छेड़छाड़ भी अपने हिसाब से. हिमालय के इलाके में ही 600 बांध बना दिये. अच्छा भाई, बदरीनाथ की बात करो. सैकड़ों साल पहले जब वहां मंदिर बनाये गये तब धार्मिक और उस समय के वैज्ञानिक लोगों ने तय किया कि किसी भी हाल में मंदिर ढाई तल्ले से बड़ा नहीं होगा. जाहिर-सी बात है कि अपने यहां तब चलन था कि मंदिर से बड़ा ध्वज किसी का नहीं होगा यानि आसपास जो भी घर-मकान आदि बनेंगे, वे ढाई तल्ला से कम के ही रहेंगे. पुराने मंदिर दो-ढाई तल्ला के ही बनते रहे हैं.

लेकिन बाद में पाप बढ़ने की वजह से पुण्य के लिए लालायित लोगों की संख्या बढ़ने लगी तो मंदिर से बड़ा ध्वज नहीं होने की बात को हमने ताक पर रखा और दनादन कई-कई तल्लों वाले नये आशियाने बनाने लगे. यह सब किसलिए भाई, तो धर्म और पुण्य कमाने आनेवाले लोगों को सुविधा देने के नाम पर. काहे बद्रीनाथ-केदारनाथ जा रहे हो यार, जब जरा कष्ट उठाने की स्थिति में नहीं हो. तीर्थ में तो कष्ट उठाने ही चाहिए. पहले बांस के फट्टे से चट्टियां बनी होती थी. बड़े से बड़े घराने के तीर्थयात्री भी वहीं रुकते थे. भइया, क्यों नहीं अपने-अपने इलाके में ही वर्षों से बने मंदिरों में अपनी भक्ति दिखा रहे हो लेकिन अब तो ऐसे भक्त हो गये हैं कि रोज खबरें आती है कि अमरनाथ के यात्री फंसे लेकिन यात्रियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है.

धार्मिक रहो न भाई, कौन मना कर रहा है. लेकिन युद्ध करते हुए धार्मिक स्थानों पर पहुंचना जरूरी नहीं. इस भ्रम में नहीं रहो भाई कि उन स्थलों पर जाने से सीधे स्वर्ग का रास्ता खुलता है. अगर ऐसा होता है तो राजनीतिक दल वाले इस विकास युग में अपने-अपने इलाके में सीधे स्वर्ग तक रास्ता बनाकर आपको दिखा दिये होते और श्रेय लेते कि देखिए स्वर्ग का रास्ता हमने सबसे पहले बनाया. देख ही रहे हो कि पिछले कई सालों से एक मंदिर के नाम पर कैसी राजनीति चल रही है. अच्छा एक दूसरी बात बताता हूं. पिछले दिनों मैं शिप्रा नदी के इलाके में गया था. वहां एक जगह है महितपुर. मंदिर और मस्जिद, दोनों आसपास में ही थी. मस्जिद नदी के एक किनारे है, मंदिर निर्माण की दृष्टि से शायद गलत जगह पर था. नदी धार के दायरे में था.

गांधी शांति प्रतिष्ठान में अनुपम मिश्र

जैसे बद्रीनाथ में निर्माण की दृष्टि से सही जगह पर बने होने की वजह से इस तबाही में भी मंदिर बचा रह गया, वैसे ही शिप्रा के बाढ़ में मस्जिद बचा रह गया, मंदिर नहीं बच सका. अब वहां मस्जिद के पास नया मंदिर बनाये जाने की तैयारी है. मैं वहां गया तो मंदिरवालों को कहा कि कहीं और बना लो, क्या जरूरी है पास में ही बनाने की! या फिर नहीं तो यहां भी बतर्ज अयोध्या, सौगंध लो कि हम मंदिर वहीं बनायेंगे. जहां पहले था. एक जगह तो कहते ही हो कि हम मंदिर वहीं बनायेंगे, दूसरी जगह भी वही कहो. बहरहाल, यह ऐसे ही बात है. एक दूसरी बात सोचता हूं कि क्यों हमारे सामने नेतृत्व का संकट इस कदर गहरा रहा है. उस अंधेरे में, मोबाईल की टिमटिमाती रोशनी में इस असाधारण व्याख्यान को देते रहे अनुपमजी.

उन्होंने बातचीत के बीच में ही कुछ संदर्भ, कुछ उदाहरण राम और कृष्ण के दिये. एक नये रंगरूट- कामरेडी साथी ने कहा- आप तो ब्राह्मणवादी बात कर रहे हैं, राम-कृष्ण का नाम क्यों ले रहे हैं. कइयों को तेज गुस्सा आया. बिना संदर्भ-प्रसंग समझे उस कामरेडी ने बीच में रोका-टोका था. अनुपमजी ने हंसते हुए कहा, अच्छा चलो भाई, माफ कर दो, नहीं ले रहा राम का नाम. वापस तो ले नहीं सकता शब्द, माफी ही मांग सकता हूं. वह कामरेडी साथी अपने ज्ञान पर इतराने लगा. अनुपमजी वहां से निकले, मैंने कहा कि नया रंगरूट कामरेड था, उसकी बातों का बुरा नहीं मानिएगा. वह बोले-काहे का बुरा मानूंगा लेकिन मिलवाओ उससे. मिलवाया.

उन्होंने उस नौजवान को समझाया- चलो रामकृष्ण का नाम नहीं लूंगा लेकिन तुम तो पटना में रहते हो. मुझे चिरैयाटांड़, गौरैयाटोली जैसे मोहल्ले का इतिहास लिखकर भेजना, छापूंगा. भोजपुर के चरपोखरी-पंचपोखी जैसे गांवों का इतिहास लिखकर भेजना, छापूंगा. राम-कृष्ण कुछ नहीं होंगे इसमें. लोक से तो परहेज नहीं है न! वह कामरेडी साथी अनुपमजी को क्रांति, लेनिन, मार्क्स समझाने लगा. अनुपमजी बच्चे की तरह उसकी बात सुनने लगे. थकहारकर सीधे बतकही की चौपाल में पहुंचने के बाद कामरेडी बच्चे की बात सुन रहे थे. निकले तो कहा कि क्यों आप ऐसा करते हैं. अनुपमजी बोले-उसका कोई नहीं सुनता होगा, इसलिए सुना. होटल पहुंचते बोले- सुधा का पेड़ा खिला दो तो सारी थकान मिट जाए. पटना आने से पहले ही जीभ सुधा के पेड़ा के लिए तैयार है.

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