पद्मावती भी तो सूर्पनखा के ही देश की थी

एक रानी सूए से पूछती है.
देस-देस फिरौ हो सुअटा। मोरे रूप और कहु कोई।।
(ऐ सुअटा तुम तो देश-देश घूमते फिरते रहे हो. बताओ तो मेरे जैसी रूपवाली कोई नजर आयी है?)
जवाब में सुआ यानी सुग्गा यानी तोता कहता है-
काह बखानौं सिंहल के रानी। तोरे रूप भरै सब पानी।।
( सिंहल की रानी का बखान करना मुश्किल है, उसके आगे तो तुम्हारा रूप पानी भरता है.)

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पद्मावत का एक पन्ना.

यह एक अवधी लोकगाथा का हिस्सा है, जिसका नाम है, ‘पद्मिनी रानी और हीरामन सूआ’. इस लोकगाथा में न अलाउद्दीन खिलजी का जिक्र है, न रतनसेन का. कहानी कहां की है, यह भी नहीं मालूम. यह तो एक आंख के अंधे, चेहरे चेचक के बहत्तर दाग वाले कुरूप सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी का कारनामा था कि उसने इस लोकगाथा का सिलसिला अपने जन्म से डेढ़ सौ साल पहले की कुछ ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़ लिया और पद्मावत जैसा ग्रंथ बन गया. वरना इस कथा में तो दो ही किरदारों का जिक्र था, एक सिंहल यानी श्रीलंका की रानी और एक हीरामन तोता.

आज के अखबार में जब मैंने करणी सेना वालों ने बयान दिया कि दीपिका का हाल सूर्पनखा जैसा कर देंगे, यानी नाक कान काट देंगे तो सोचा कि क्या उन राजपूत वीरों को मालूम है कि रानी पद्मावती की जन्मस्थली भी उसी देश में है, जहां की सूर्पनखा थी. वह राजपूत थी या नहीं, कथा में भी इसका कोई जिक्र नहीं है. दिलचस्प है कि एक तरफ राजस्थान के राजपूत रानी पद्मिनी की कथा पर बनी एक भव्य ग्लैमरस फिल्म को रिलीज नहीं होने देना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ कोई यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि आखिर कहानी क्या है? इसकी जड़ें कहां हैं, जायसी ने क्या और क्यों लिखा, भाव क्या थे.

अवध के लोकमानस में एक था राजा, एक थी रानी कह कर सदियों से गायी जाने वाली यह लोककथा अचानक विवादास्पद हो गयी है, क्योंकि इसमें अलाउद्दीन खिलजी का नाम जुड़ गया है. लोगों को इस बात का भय सता रहा है कि संजय लीला भंसाली ने कहीं खिलजी को ही तो नायक नहीं बना दिया है? और संजय लीला भंसाली इस अज्ञानता का आनंद उठा रहे हैं, क्योंकि मुफ्त में फिल्म का प्रचार हो रहा है. जबकि अगर इंसान थोड़ा सा भी पद्मावत में घुसे तो उसे सहज ही समझ आ जायेगा कि किसका किरदार कैसा है.

जायसी ने लिखा है, चित्तौड़ मानव का शरीर है, राजा उसका मन है, सिंहल उसका हृदय है, पदमिनी उसकी बुद्धि है, सुग्गा उसका गुरु है, नागमती उसका लौकिक जीवन है, राघव शैतान है और अलाउद्दीन माया है; इस प्रकार कथा का अर्थ समझना चाहिए. हालांकि कई लोग इस विवरण पर संदेह करते हैं, मगर यह जाहिर है कि जिसने भी यह विवरण पेश किया है, वह किरदारों की व्याख्या भी कर रहा है. क्या संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशक के लिए इन व्याख्याओं से बाहर निकलना और कोई नया प्रयोग करना मुमकिन है?

23498073_447117509017450_7470178124773195776_nसोचता तो यह भी हूं कि उस वक्त में जब शेरशाह दिल्ली की गद्दी पर आसीन था, तब मलिक मोहम्मद जायसी जैसे मुसलमान कवि ने एक ऐसी कृति की रचना की जिसका नायक एक राजपूत राजा था और खलनायक एक मुसलमान बादशाह. वह कैसा जमाना रहा होगा. क्या आज कोई इस तरह की रचना करके इस मुल्क में चैन से रह सकता है? भंसाली का ही उदाहरण लीजिये, सिर्फ इस आशंका की वजह से कि कहीं उसने अलाउद्दीन खिलजी को तो नायक नहीं बना दिया लोगों ने उसका जीना हराम कर दिया है. बिना देख, बिना जाने. संदेह के आधार पर. अगर सच में भंसाली ऐसा कर दें तो पता चला कि किसी सेना ने उसकी हत्या की सुपारी ले ही है.

banयह कैसा पागलपन है. आपको कहानियां आहत करने लगी हैं, फिल्में आपको खून-खराबा करने पर मजबूर कर रही हैं. आप बिना देखे, जाने नायिका को सूर्पनखा बनाने की धमकी देते हैं. वजह सिर्फ इतनी सी है कि आपका साहित्य, कला और संस्कृतियों से नाता टूट गया है. आपके जीवन में मनमानी भरी सफलता ही सबकुछ है. वही इस युग का आदर्श है. हम हर चीज को अपने हिसाब से कर लेना चाहते हैं. हम मानते हैं कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं और सर्वश्रेष्ठ का मतलब यह है कि हम अपने इतिहास में किसी भी वक्त कभी हारे नहीं, हमारी स्त्रियों की तरफ किसी ने देखा नहीं, अगर हुआ भी तो हम उसे मिटा देना चाहते हैं, बदल देना चाहते हैं.

माफ कीजिये, अगर अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं की परवाह है तो थोड़ा पढ़ने लिखने और शोध करने की आदत डालिये. रोड पर लफंगों की तरह हा-हू करने से आपकी परंपरा बदतर हो रही है. आने वाली पीढ़ियों को आप पर शर्म होगा, गर्व नहीं.

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