पटना पुस्तक मेला-‘ज्ञान’ को ‘भवन’ में नजरबंद करने की तैयारी

शशांक मुकुट शेखर

खुला आसमान स्वछंदता का प्रतीक है और बंद दरवाजे बेशक गुलामी को दर्शाते हैं. और जब बात महिला सशक्तिकरण की करें तो आजादी के प्रतीकों का इस्तेमाल करना बेहद आवश्यक होता है. आगामी 2 दिसंबर से पटना में पुस्तक मेले का आयोजन किया जा रहा है. थीम रखा गया है ‘नारी सशक्तीकरण.’ पुस्तक मेले के सभी आयोजन में महिलाओं की भरपूर भागीदारी होने वाली है. पर महिलाओं के सशक्तिकरण पर आधारित पुस्तक मेले का गाँधी मैदान के खुले परिसर से ज्ञान भवन के बंद कमरों में शिफ्ट होना अत्यंत हास्यास्पद व दुर्भाग्यपूर्ण है.

ऐसे आयोजन खुले आसमान के नीचे ही सार्थक होते हैं. पुस्तक मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, तमाम पुस्तक व साहित्य प्रेमियों के लिए एक उत्सव भी होता है. साहित्य प्रेमियों को ऐसे आयोजन का उसी बेसब्री से इन्तजार रहता है, जैसे एक बच्चे को अपने गांव में लगने वाले दुर्गापूजा या दिवाली के मेले का. सोचिए अगर गांव के ये मेले एक चारदीवारी के भीतर लगने शुरू हो जाएँ तो क्या होगा? क्या इसकी महत्ता और उस बच्चे का रोमांच बरक़रार रह पाएगा? क्या यह उस बच्चे की अथाह भावनाओं और आत्मिक आजादी के साथ न्याय है?

शशांक पटना के संवेदनशील युवकों में से एक हैं. अच्छे फोटोग्राफर हैं. पत्रकार बनते-बनते सोशल मीडिया एक्सपर्ट बन गये हैं.

अगले वर्ष पुस्तक मेले के 25वें आयोजन को अंतर्राष्ट्रीय करने की तैयारी चल रही है. खुद माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने इसका आश्वासन दिया है. मगर इसे गाँधी मैदान से ज्ञान भवन शिफ्ट कर देना इसे और संकीर्ण बना देता है. ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय मेले की बात महज एक मखौल जैसा लगता है. दूसरी बात है कि चूँकि ज्ञान भवन का किराया ज्यादा है तो मेले में शिरकत करने वाले पुस्तक विक्रेताओं से ज्यादा भाड़ा वसूल किया जाएगा. इससे अगर पुस्तक प्रेमियों के जेब पर भी ज्यादा भार पड़े तो ताज्जुब नहीं. साथ ही इससे लोगों की रूचि भी कम होगी.

साथ ही पुस्तक मेले का एक स्वायत्त संस्था के हाथों से शिफ्ट होकर सरकार के हाथ चले जाना सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है. चूँकि आयोजन में बिहार सरकार भी मदद कर रही तो जाहिर है कि साहित्य में राजनीति का प्रवेश होगा जो अत्यंत खतरनाक है. अगली बार पुस्तक मेले को अंतर्राष्ट्रीय बनाने की बात चल रही है मगर इस बार आमंत्रित नामों में एक भी अंतर्राष्ट्रीय तो दूर राष्ट्रीय स्तर का भी नहीं है.

इस वर्ष जिस तरह से पुस्तक मेले के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है इससे इसकी क्रेडिबिलिटी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है. इस साल शायद पुस्तक प्रेमी उस उत्साह व प्रेम के साथ पुस्तक मेले में शिरकत नहीं करेंगे जिसका उन्हें इंतजार रहता है. पुस्तक मेले में सरकार की भागीदारी और ‘नारी सशक्तीकरण’ थीम की जुगलबंदी दूसरे पहलू की ओर भी इशारा करते हैं. सीधे शब्दों में कहा जाए तो हमारे लिए अभी अंतर्राष्ट्रीय स्तर तो दूर राष्ट्रीय स्तर की बात भी दिल्ली दूर है. अगर इसकी महत्ता बरकरार रखनी है तो इसे स्वतंत्र करना होगा. साथ ही कई अन्य महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनपर गंभीरता से विचार करना होगा.

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